अमित शाह ने लांच किया चुनाव प्रचार का हाइटेक तरीका

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-देवेंद्र गौतम

चुनाव प्रचार के नए-नए तरीकों का अनुसंधान करने में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का जवाब नहीं है। अभी उनके उर्वर मस्तिष्क में एक नया आइडिया आया है जिसे वर्चुअल रैली कहते हैं। इसे बिहार में लांच कर दिया गया है। बंगाल में किया जाना है। इसका बजट बड़ा है। छोटी-मोटी पार्टियां इसका इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। शाह का कहना है कि उनकी वर्चुएल रैली का बिहार के चुनाव से कोई संबंध नहीं है। यह जनता से संवाद का एक जरिया है। यह अलग बात है कि अपने भाषण में उन्होंने चुनाव के अलावा किसी अन्य मुद्दे पर कोई बात ही नहीं की। मोदी सरकार ने देश का कितना कल्याण कर दिया कितना करना बाकी है, इसका ब्योरा जरूर  दिया। साथ ही बिहार की तीन चौथाई सीटों पर जीत हासिल करने का दावा किया और इसके अलावा कुछ नहीं कहा। अपने बड़बोलेपन की शैली को बरकरार रखा। अमित शाह की विशेषता यह है कि वे हमेशा चुनाव और हिंदुवाद के मूड में रहते हैं। हार जीत अलग विषय है लेकिन हमेशा पूरी तरह सुसज्जित होकर मैदान में उतरते हैं। कोरोनाकाल में वे चुप्पी साधकर बैठे रहे क्योंकि वे कोरोना का रोना पसंद नहीं करते। महामारियां तो सदी में एकाध बार आती हैं, जबकि चुनाव हर पांच साल पर आता है।

यह अलग बाक है कि वर्चुअल रैली से देशवासियों के समक्ष यह संदेश गया कि भाजपा के पास प्रवासी मजदूरों के लिए धन की कमी हो सकती है लेकिन चुनाव लड़ने और सत्ता के दांव-पेंच के लिए पर्याप्त धन है। वर्चुअल रैली के लिए भाजपा ने बिहार के 72 हजार बूथों पर एलइडी लगवा दिए गए थे। ताकि उनका ओजस्वी भाषण सुनने में बिहार के लोगों को खासतौर पर उन मजदूरों को परेशानी न हो जो जिन्दा घर वापस लौटने से सफल रहे हैं। उनका ध्यान अब कोरोना से हटकर चुनाव की तरफ चला जाए। एलइडी के लिए 144 करोड़ खर्च हुए तो जन-संवाद का एक जरिया तो बना। मजदूरों की घर वापसी के लिए भाजपा इस धन का एक हिस्सा भी खर्च कर देती तो चुनाव कैसे लड़ती। जरूरत पड़ने पर विधायकों की मंडी में साहूकारी कैसे करती। संसदीय राजनीति में एक राजनीतिक दल को हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए। सत्ता प्राप्ति के लिए उसे कुछ भी करने से परहेज़ नहीं करना चाहिए। आम लोगों का क्या है। मरें या जीवित रहें। खाली पेट रहें चाहें भरे पेट। भाजपा को सिर्फ सत्ता चाहिए। लोग भगवा धारण करें और विपक्षी दलों से दूरी बनाए रखें।

जब पूरा देश कोरोना के कहर से विलख रहा है। करोड़ों लोग नौकरी से हाथ धो बैठे हैं। पूरा बिहार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को उनके निकम्मेपन के लिए कोस रहा है। ऐसे में अमित शाह बताते हैं कि चुनाव नीतीश के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। लोग इत्मिनान रखें। अगला मुख्यमंत्री नीतीश ही बनेंगे। दरअसल वे चुनाव की तैयारी के लिए नहीं बल्कि उसका परिणाम बताने आए थे। जनता चाहे न चाहे वे तीन चौथाई सीट लेकर रहेंगे। लोग पसंद करें न करें उनके सिर पर सुशासन बाबू ही विराजमान रहेंगे।

अमित शाह ने पिछले साल अपनी शेखी बघारने में झारखंड में और इसके बाद दिल्ली में भाजपा की लुटिया डुबो दी थी। अब बिहार इसके एक साल बाद पश्चिम बंगाल और इसके एक साल बाद उत्तर प्रदेश में एनडीए का कल्याण करना बाकी है। अमित शाह एक तेज़ तर्रार नेता हैं। राजनीति का चाणक्य कहलाते हैं। उनकी किस बात की जनता में क्या प्रतिक्रिया होगी, इसे वे निश्चित रूप से समझ रहे होंगे। अगर नहीं समझ रहे तो इसका मतलब है कि उनके अहंकार ने हवा के रुख को भांपने की उनकी समझ को कुंद कर दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी खास रणनीति के तहत भाजपा को राज्यों की सत्ता से दूर रखना चाहते हैं। वे केंद्र में दूसरे नंबर के नेता हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे ज्यादा विश्वासपात्र। कुछ वर्ष पहले वे नरेंद्र मोदी के विजय रथ के सारथी थे अब उनके पराजय रथ को उसी गति से हांक रहे हैं। इसके पीछे उनकी क्या रणनीति है, समझ से परे है।

जो राजनीति के चाणक्य के रूप में चर्चित रहा है यदि कोई कहे कि झारखंड को नक्सल मुक्त करार देने या शाहीनबाग के जरिए दिल्ली चुनाव जीतने की मंशा व्यक्त करने का क्या मतलब होता है, अमित शाह नहीं जानते तो इसे कत्तई नहीं माना जा सकता। उन्हें सब पता होता है। बहरहाल अब अब यह वर्चुअल रैली बंगाल में होनी है। वहां चुनाव में 2021 में होना है। फिलहाल वहां 80 प्रतिशत बूथों पर एलइडी लगाया जाएगा। शेष 20 प्रतिशत दूसरे चरण में लगेंगे। ममता बनर्जी का कहना है कि वे चुनाव में इतना खर्च करने में सक्षम नहीं है।

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