बिहारः लोक के खिलाफ तंत्र का षडयंत्र

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

बिहार में फर्जी राष्ट्रवाद के नाम पर लोक का जनादेश तंत्र में समाहित कर दिया गया। वहां असली जंगलराज का खुला प्रदर्शन किया गया। राजद ने बिहार में 119 सीटों पर धांधली का आरोप लगाया है। मतगणना के दौरान नीतीश कुमार और सुशील मोदी चुनाव अधिकारियों को फोन कर महागठबंधन के कम अंतर से जीते प्रत्याशियों

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर महागठबंधन के 119 प्रत्याशियों की जीत की सूची जो ऊपर के आदेश से हरा दिए गए

के वोट कम दिखाकर जीत का सर्टिफिकेट देने से रोक रहे थे लोकिन चुनाव आयोग के वोबसाइट पर उन्हें जीता हुआ दिखाया जा चुका था रिटर्निंग ऑफिसर उन्हें जीत की बधाई दे चुके थे इसके बाद उन्हें हारा हुआ बता दिया गया। प्रधानमंत्री मोदी को भी अचानक पटना आना पड़ा था। लेकिन मोदी है तो लोकतंत्र की हत्या बिल्कुल मुमकिन है। महागठबंधन के नेताओं ने चुनाव आयोग में इसकी शिकायत की है। यह सीधे तौर पर जनादेश पर डाका डालने का कृत्य है। अब लोकतंत्र की जंग के ले सड़क के अलावा कोई जगह नहीं है। यह सवाल बेमानी है कि बिहार का जनादेश जनता का आदेश है या ईवीएम का। चुनाव आयोग की भूमिका की समीक्षा की भी जरूरत नहीं है। भाजपा जो चाहती थी उसे केंद्र की सत्ता के बल पर पूरा कर लिया। चुनाव आयोग ने उनका पूरा साथ दिया। वहां महागठबंधन की शिकायत पर कोई सुनवाई होने की उम्मीद नहीं है।

भाजपा ने नीतीश कुमार को उनकी औकात भी बता दी और उन्हें कम सीटों के बावजूद फिर से मुख्यमंत्री बनाने के वादे पर भी कायम रही। भाजपा की अघोषित शर्त यह है कि उन्हें अपने अंदर के समाजवादी चरित्र को पूरी तरह दफ्न कर देना होगा और भाजपा तथा आरएसएस के एजेंडे पर काम करना होगा। सत्ता लोलुपता के तहत वे इस चुनाव में अपनी छवि को दागदार कर चुके हैं। फिलहाल उनकी महत्वाकांक्षा पूरी हो जाएगी लेकिन उनकी आंख में पानी नहीं बचेगा। वे जनता से आंख नहीं मिला सकेंगे। उनका स्वाभिमान कायम नहीं रह सकेगा। उन्हे कठपुतली बनकर भाजपा के रिमोट से संचालित होना होगा। अब भाजपा जो भी देगी स्वीकार करना होगा। जो मांगेगी हाजिर करना होगा। वे सत्ता के बगैर नहीं रह सकते लेकिन उनका स्वभाव बहुत ज्यादा समझौतावादी नहीं है। चाहे जिस दबाव के कारण वे एनडीए में हों लेकिन उनका चरित्र अभी तक कहीं से भी सांप्रदायिक नहीं है। वे समाजवादी पृष्ठभूमि के हैं और किसी की अधीनता स्वीकार नहीं करते। उनकी छवि साफ-सुथरी रही है और वे अपनी शर्तों पर राजनीति करते रहे हैं। अब नहीं कर सकेंगे।

2015 में वे यूपीए के साथ थे। उस समय राजद के पास ज्यादा सीटें थीं फिर भी उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था। 2017 में जब उन्हें राजद के साथ दिक्कत हुई तो वे पल्टी मार कर भाजपा के साथ चले गए थे। भाजपा से ज्यादा सीटें होने के कारण वे बड़े भाई की भूमिका में रहे। लेकिन अब एक बार फिर एनडीए में उन्हें भाजपा के साथ छोटा भाई बनकर काम करना होगा। जाहिर तौर पर भाजपा बिहार में अपने हिंदुत्व के एजेंडे पर काम करना चाहेगी। संघ के लोग और कट्टर हिन्दुत्ववादी संगठनों के लोग मुस्लिम विरोधी अभियान चलाएंगे। नीतीश कुमार को उन्हें संरक्षण प्रदान करना होगा। छोटे भाई बनकर काम करना नीतीश जी के लिए मुश्किल है। यदि वे मुख्यमंत्री बनने से इनकार कर केंद्र में अपने लिए जगह तलाश लेते हैं तो शायद उनके जमीर का कुछ हिस्सा शेष रह जाए। लेकिन यदि वे बिहार के सीएम की कुर्सी पर बने रहना चाहेंगे तो उनके अंदर की समाजवादी आत्मा बार-बार आहत होती रहेगी और जिस दिन उनकी आत्मा जागेगी उस दिन उन्हें या तो दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका जाएगा या एकबार फिर पाला बदलने को विवश हो जाना पड़ेगा। एनडीए की सरकार गिराने भर सीटें तो उनके पास है ही। दूसरी सूरत यह है कि वे स्वयं कट्टर हिंदूवादी सांचे में ढल जाएं और अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर दें। जदयू के अंदर जो समाजवादी बचे हैं वे राजद, कांग्रेस या वामपंथी दलों में चले जाएंगे। जो हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करना पसंद करेंगे वे उनके साथ भाजपा में शामिल हो जाएंगे। सत्तालोलुपता विचारधारा को बदल देती है।

जहां तक तेजस्वी और महागठबंधन का सवाल है जिन मुद्दों को लेकर वे चुनाव मैदान में उतरे थे वह जनता के मुद्दे थे। पोस्टल बैलेट में महागठबंधन की बढ़त का सीधा अर्थ है कि अगड़ों की बहुलता वाले मध्यम वर्ग ने भी महागठबंधन के पक्ष में मतदान किया था। आखिर पिछड़े, अल्पसंख्यक और दलित वोट क्यों नहीं देते। 119 सीटों पर अगर ईमानदारी के साथ जीत-हार की घोषणा होती तो एनडीए तीन अंकों तक भी नहीं पहुंचता। महागठबंधन ने जिन मुद्दों को उठाया था उन मुद्दों को लेकर अब सड़क पर उतरना होगा। वाम दलों का महागठबंधन में शामिल होना फासिज्म के खिलाफ निर्णायक जन-संघर्ष की गोलबंदी का सूचक है। महागठबंधन के पास लोक है तो एनडीए के पास सत्ता। तंत्र को लोक के पास लाना होगा। तभी लोकतंत्र बच सकेगा। जनता ने बदलाव की आकांक्षा के तहत वोट दिया और एनडीए ने सत्ता के बल पर उसे जबरन अपनी झोली में डाल लिया। सीधा संदेश है कि संसदीय राजनीति के तहत कोई बदलाव नहीं लाया जा सकता। चुनाव अधिकारियों की धांधली के खिलाफ आवाज़ तो उठी लेकिन उसे दबा दिया गया। बदलाव का बयार बिहार से उठता है और पूरे देश में फैलता है। बिहार इस स्थिति के लिए पहले से तैयार नहीं था। अब इस धांधली का जवाब देने के लिए से तैयार होना होगा।

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