राजद में तोड़फोड़ के साथ बिछने लगी चुनावी बिसात

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

बिहार में विधानसभा चुनाव से पूर्व राष्ट्रीय जनता दल को एक झटका लगा है। पार्टी को पांच विधान पार्षदों ने पार्टी छोड़ दी और इसके बाद राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, अभी पार्टी की तरफ से उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है। वे समाजवादी पृष्ठभूमि के साफ सुथरी छवि के नेता रहे हैं और खासतौर पर सवर्ण वोटरों पर उनकी पकड़ मजबूत रही है। वे लालू प्रसाद के बेहद करीबी लोगों में शामिल रहे हैं।

कहते हैं कि वे वैशाली के पूर्व सांसद बाहुबली नेता रामा सिंह के राजद में शामिल होने की खबर से नाराज चल रहे हैं। रामा सिंह ने पिछले दिनों रांची के रिम्स में इलाजरत सजायाफ्ता लालू प्रसाद से मिले थे। इसके बाद  तेजस्वी यादव से भी मुलाकात की थी। इसके बाद उनका राजद में शामिल होना तय माना जा रहा था। राजनीतिक हल्कों में चर्चा है कि रामा सिंह 29 जून को राजद में शामिल हो सकते हैं। रामा सिंह रघुवंश प्रसाद सिंह के मुख्य राजनीति प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में रघुवंश प्रसाद राजद के टिकट पर वैशाली में चुनाव लड़ रहे थे वहीं लोजपा के टिकट पर रामा सिंह मैदान में थे। वैशाली रघुवंश प्रसाद का गढ़ हुआ करता था। वहां से वे चार बार सांसद रह चुके थे। लेकिन रामा सिंह की मौजूदगी के कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। दोनों नेताओं के बीच पहले से राजनीतिक दुश्मनी चल रही थी। हालांकि इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में लोजपा ने रामा सिंह को टिकट नहीं दिया था। स समय भी राजद ने रामा सिंह को अपने पाले में लाने की कोशिश की थी, लेकिन रघुवंश के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो पाया था।

बिहार विधानसभा के चुनाव इस साल अक्टूबर-नवंबर में होने हैं। ऐसे में राजद जीतने वाले उम्मीदवार की तलाश कर रही है। यही वजह है कि राजद ने रामा को पार्टी में लाने की पूरी तैयारी कर ली है। यह बात रघुवंश को अखर रही है और इसी वजह से उन्होंने पार्टी के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। रघुवंश प्रसाद राजद में बड़े सवर्ण चेहरे हैं और ऊंची जातियों के वोट को अपने पाले में लाने वाले नेता हैं। वैशाली लोकसभा क्षेत्र में इनकी मजबूत पकड़ है। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पार्टी के सभी फैसलों में उनकी राय को महत्व देते हैं। शुरुआती दौर में जब लालू प्रसाद सवर्ण जातियों का विरोध कर रहे थे और पिछड़ी जातियों का मनोबल बढ़ा रहे थे तब भी रघुवंश प्रसाद लालू के साथ थे और जब राजद ने सवर्ण आरक्षण का विरोध किया था तब भी वे पार्टी के साथ थे। अपने क्षेत्र में वे सवर्ण आरक्षण के खिलाफ धरने पर भी बैठे थे। बिहार भाजपा विधान मंडल दल के नेता सुशील कुमार मोदी काफी समय पहले ही उन्हें एनडीए में आने का निमंत्रण दे चुके हैं। अब उनके प्रमुख पद से इस्तीफे के बाद उन्हें अपने खेमे में लाने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि रघुवंश नारायण सिंह कट्टर समाजवादी नेता हैं। वे एनडीए में जाएंगे इसकी संभावना कम दिखती है।

इससे पहले राजद छोड़ने वाले पांच पार्षदों में संजय प्रसाद, कमरे आलम, राधाचरण सेठ, रणविजय सिंह और दिलीप राय पहले से ही तेजस्वी यादव और पार्टी के खिलाफ बयानबाजी करते रहे हैं। कुछ दिन पहले ही बिहार सरकार के भवन निर्माण मंत्री और जदयू नेता अशोक चौधरी ने दावा किया था कि राजद के कई विधायक पाला बदलने को तैयार बैठे हैं।

राजद छोड़ने वाले पांचो विधान पार्षद के जदयू का दामन थाम चुके हैं।संभव है कुछ और राजद विधायक पाला बदल दें। जदयू और भाजपा के नेता ऐसा दावा कर भी रहे हैं। उनका मानना है कि तेजस्वी यादव का नेतृत्व उन्हें स्वीकार नहीं है। लालू प्रसाद पार्टी के किसी और नेता को नेतृत्वकारी भूमिका में लाने को तैयार नहीं हैं। वे पार्टी पर अपने परिवार की पकड़ बनाए रखने के पक्ष में हैं।

कोरोनाकाल में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की निष्क्रियता को लेकर बिहार के मतदाताओं में नाराजगी है। खास तौर पर प्रवासी मजदूरों की और कोटा से छात्रों की वापसी को लेकर उनके टाल मटोल के रवैये से एनडीए के खिलाफ माहौल बना हुआ है। गृहमंत्री अमित शाह की वर्चुअल रैली की भी तीखी प्रतिक्रिया हुई है। ऐसे में वोटरों को रिझाने के लिए तरह-तरह के उपाय किए जा रहे हैं। राजद अभी बिहार में सबसे बड़ी पार्टी है। इसमें तोड़फोड़ की हर संभव कोशिश में एनडीए खेमे को राजनीतिक लाभ की उम्मीद है। हालांकि कोरोना काल में तेजस्वी यादव पूरी तरह जनता के पक्ष में खड़े रहे हैं। इसलिए महागठबंधन के प्रति लोगों का झुकाव बढ़ा है। महागठबंधन की एकमात्र कमजोरी यह है कि लालू प्रसाद जेल में हैं और वे तेजस्वी को ही महागठबंधन का नेता बनाने के पक्ष में हैं। तेजस्वी में तेज़ है लेकिन राजनीति का अनुभव अपेक्षाकृत कम है। नीतीश कुमार माहौल को समझ रहे हैं। इसलिए वे चाणक्य नीति के तहत हवा का रुख अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहे हैं। इस रस्साकशी का नतीजा क्या निकलेगा चुनाव परिणाम ही बताएंगे।

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