बिहार को कितना शर्मसार करेंगे नीतीश कुमार

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पूरी तरह सठिया चुके हैं। प्रवासी मजदूरों और कोटा में फंसे छात्रों की परेशानी उन्हें महसूस नहीं हो रही है। वे दूसरे राज्यों में फंसे अपने राज्य के लोगों को उनके घर वापस पहुंचाने का जिम्मेवारी से भाग रहे हैं। अब स्थिति यह है कि महाराष्ट्र और गुजरात ने बिहार के श्रमिकों को राज्य की सीमा के बाहर छोड़ आने का फैसला कर लिया है। यह कितनी जिल्लत की बात है…लेकिन नीतीश जी को इसका अहसास नहीं हो रहा। वे तमाम हर्यो-हया को घोलकर पी चुके हैं। लाखों लोग मुसीबत मे हैं और नीतीश कुमार पीएम मोदी के पास अपना नंबर बनाने में लगे हैं। कोटा में बिहार के होनहार छात्र एक शाम का भोजन करके समय काट रहे हैं और उन्हें केंद्र सरकार की हरी झंडी का इंतजार है। प्रवासी मजदूर तो भोले-भाले हैं। आवाज़ नहीं उठा रहे हैं लेकिन कोटा में पंसे बच्चे सोशल मीडिया पर गुहार लगा रहे हैं। फिर भी नीतीश के कानों में जू तक नहीं रेंग रहा है। नीतीश जी इतने मरियल, इतने अमानवीय, इतने नाकारा, इतने निष्ठुर निकलेंगे किसी ने सोचा नहीं था। अभी अगर लालू प्रसाद जेल में नहीं होते तो सत्ता में होते या नहीं लेकिन लड़-भिड़कर अपने राज्य के लोगों को वापस लाते। उनके समय में बिहार के लोग दुनिया के सामने कम से कम सीना ठोककर चलते थे। नीतीश जैसे दब्बू नेता के कारण उन्हें सर झुकाकर चलना होगा। अन्य राज्यों की सरकारों ने बसें भेजकर अपने नागरिकों को बुलवा लिया लेकिन नीतीश जी बिहार प्रदेश की पूरी फजीहत करा कराने पर तुले हुए हैं। जिन राज्यों ने बसे भेजीं। उनपर किसी ने आपत्ति नहीं उठाई तो सुशासन बाबू पर क्यों आपत्ति होगी। वे राजनीति के अछूत तो नहीं हैं। समझ में नहीं आता कि जेपी आंदोलन से निकले नीतीश जी आखिर इतना डर क्यों रहे हैं।

आपातकाल के दौरान नियम और कानून नहीं देखे जाते। उस समय त्वरित निर्णय लेने होते हैं। नीतीश जी के बंगले में यदि आग लग जाए या गंगा नदी में उनकी नाव डूबने लगे तो वे उसे तत्काल बचाव का प्रयास करेंगे या केंद्र सरकार के निर्देश का इंतजार करेंगे? प्रधानमंत्री के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के दौरान भी उन्होंने अंतर्राज्यीय परिवहन के संबंध में नीति बनाने की मांग की। पीएम मोदी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। बहुत सी बातें मौन की भाषा में कही जाती हैं। उन्हें समझना होता है। लगता है कि नीतीश जी मानसिक रूप से अपंग हो चले हैं। उनके अंदर निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो चुकी है। सरकार चलाना अब उनके वश की बात नहीं रह गई है। प्रधानमंत्री का आज्ञाकारी बनने के चक्कर में नीतीश जी कहीं अपना जनाधार भी न खो बैठें। जो मजदूर या जो छात्र किसी तरह मुसीबतें झेलते हुए पैदल घर पहुंचे हैं या जो बाद में लॉकडाउन टूटने के बाद पहुंचेंगे उनके परिजन कम से कम नीतीश जी को तो कभी भूलकर भी वोट नहीं देंगे।

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