भाजपा के रडार पर नीतीश कुमार

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

भारतीय जनता पार्टी का मकसद बिहार में चुनाव जीतना और सरकार बनाना प्रतीत नहीं होता। नीतीश कुमार को मार्गदर्शक मंडल में भेजना उसका लक्ष्य है। बिहार में भाजपा का कभी कोई बड़ा आधार नहीं रहा है। वह किसी क्षेत्रीय दल के कंधे पर बंदूक रखकर चलती रही है। पिछले तीन दशकों से बिहार की राजनीति लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के ईर्द गिर्द घूमती रही है। इन्हें निपटाए बिना किसी तीसरी ताकत का अभ्युदय संभव नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने लोजपा जैसे दल के कंधे पर बंदूक रखा था और अपने एजेंडे पर चुनाव लड़ा था। जनादेश सके खिलाफ गया था। उस समय नीतीश ने लालू का अनुज बनकर उनके परिवार के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। उन्हें जनादेश प्राप्त हुआ था। अचानक उन्होंने पाला बदलकर भाजपा का हाथ क्यों थामा और पल्टूराम का खिताब क्यों हासिल किया यह अंदरखाने की बातें हैं। लेकिन एनडीए में शामिल होने के बाद धीरे-धीरे उनके समाजवादी चरित्र का भी क्षरण होने लगा और उनपर भगवा रंग की परतें चढ़ने लगीं। भाजपा को बिहार की एक शक्ति को निपटाने का अवसर मिल गया।

यही कारण है कि इसबार के चुनाव में लोजपा ने एनडीए से बाहर निकलकर नीतीश के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया। नीतीश की लोकप्रियता का ग्राफ पहले से ही गिरा हुआ है। ऐसे में लोजपा ने भी उनके जदयू प्रत्याशियों के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतार दिए। अब नीतीश जी को राजद और लोजपा दोनों से टक्कर लेना है और भाजपा कार्यकर्ता उनका सहयोग नहीं कर रहे हैं। एनडीए के पोस्टरों से भी उन्हें किनारे कर दिया गया है। स्थितियां ऐसी हैं कि यदि नीतीश के जदयू को सत्ता नहीं मिली तो उनका राजनीतिक जीवन समाप्त हो जाएगा। ऐसे में भाजपा को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा प्राप्त हो जाएगा। महागठबंधन की सरकार बनने से फिलहाल भाजपा को कोई समस्या नहीं है क्योंकि उसका एक कांटा निकल चुका होगा। विपक्ष की राजनीति उसके अनुकूल हो जाएगी इसके बाद वह दूसरा कांटा निकालने की रणनीति बनाएगी।

फिलहाल भाजपा को महागठबंधन की सरकार बनने या तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने से कोई समस्या नहीं है। उसकी लड़ाई राजद से नहीं जदयू से है। इसीलिए राजद के मीडिया कवरेज को रोकने का वह कोई प्रयास नहीं कर रही है। देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि कम से कम टीवी मीडिया का बड़ा हिस्सा गोदी मीडिया बन चुका है और वह भाजपा के इशारे पर काम करता है। यदि भाजपा इशारा भर कर दे तो तेजस्वी टीवी पर दिखाई नहीं देंगे। लेकिन उसका लक्ष्य साधने के लिए तेजस्वी का दिखना जरूरी है। नीतीश दिखते भी हैं तो अपनी बौखलाहट का प्रदर्शन करते हुए। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि भाजपा राजद की शुभचिंतक बन गई है। राजद अभी नहीं 2025 में उसके रडार पर होगा। तबतक सुशासन बाबू की हवा निकल चुकी होगी।

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