अब बिहार  में चुनावी चक्रव्यूह रच रहे हैं पीके

0 110

देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

प्रशांत कुमार ने दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी के चुनावी रणनीतिकार के रूप में भाजपा के चाणक्य अमित शाह को जबर्दस्त पटकनी दी। उनका सिक्का जम गया। अब वे बिहार चुनाव में अपनी भूमिका की तैयारी में लगे हैं। बिहार में जाहिर तौर पर उनहें किसी राजनीतिक दल ने अनुबंधित नहीं किया है। लेकिन संकेत बताते हैं कि वे बिहार में सबसे खतरनाक चक्रव्यूह रचने जा रहे हैं। अभी तक मिले संकेत के मुताबिक वे स्वयं को नीतीश के विकल्प के रूप में पेश करेंगे। उनका दावा है कि उनसे जुड़ने के लिए बिहार के एक लाख नवयुवक तैयार बैठे हैं। वे बिहार के चुनाव को नई दिशा देने के प्रयास करेंगे। उनका मानना है कि लोग जातिवाद और सांप्रदायिकता की राजनीति से ऊब चुके हैं और विकास की राजनीति के पक्ष में हैं। हालांकि वे नीतीश कुमार पर सीधा प्रहार करने से बच रहे हैं। नीतीश एक ऐसे नेता हैं जिनकी चाल को समझना मुश्किल होता है। प्रशांत किशोर का कहना है कि वे उन्हें पुत्रवत स्नेह देते हैं। थोड़े वैचारिक मतभेद के कारण वे नीतीश से अलग हुए।

क्या यह विश्वास करने योग्य है कि नीतीश जैसे धुरंधर नेता प्रशांत किशोर जैसै रणनीतिकार को ऐन चुनाव के पहले थोड़े से वैचारिक मतभेद के कारण पार्टी से बाहर निकाल देंगे। निश्चित रूप से यह उनकी चाणक्य नीति का एक हिस्सा है। राजनीति में कभी-कभी दूर रहकर मदद करना ज्यादा फलदायी होता है।

प्रशांत किशोर ने चुनावी रणनीति तैयार करने के लिए अपनी कंपनी बनाई है। उनकी कंपनी किसी भी राजनीतिक दल को सेवा प्रदान करने को तैयार रहती है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के बाद उनकी कंपनी प.बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को अपनी सेवा प्रदान कर रही है। यह दोनों अनुबंध उनके जदयू का उपाध्यक्ष रहते हुए मिले हैं। इसपर जदयू के कुछ लोगों को एतराज था लेकिन नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर का खुला पक्ष लिया था। किसी पार्टी से जुड़े रहना प्रशांत किशोर के व्यावसायिक हित में नहीं है। लेकिन नीतीश कुमार ने उस समय उनको सहारा दिया था जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के रणनीतिकार के रूप में पूरी तरह विफल हो गए थे और उनके बाजार पर नकारात्मक असर पड़ा था। ऐसे में वे नीतीश कुमार के विरोध में खड़े होंगे विश्वास नहीं किया जा सकता। संभवतः वे नीतीश जी की मदद के लिए एकदम नई रणनीति पर काम कर रहे हैं।

नीतीश कुमार कोई साधारण हस्ती नहीं हैं। वे लालू के बाद बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। उनका अपना जातीय आधार है। साफ सुथरी छवि है। अपनी अलग पहचान है। पिछला चुनाव वे लालू के साथ तालमेल करके लड़े थे। बाद में गठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ सरकार बनी थी। इसबार लालू प्रसाद जैसे धुरंधर रणनीतिकार से उनकी सीधी टक्कर है। एनडीए में उनकी स्थिति ढुलमुल थी। सदन में सीएए का समर्थन कर उन्होंने भाजपा से अपनी दूरी कम कर ली। भाजपा के पास बिहार में कोई चेहरा नहीं है। नीतीश उसकी जरूरत भी हैं और मजबूरी भी। भाजपा की कमान अब पूरी तरह जेपी नड्डा के हाथ में है। दिल्ली चुनाव के नतीजे आने के बाद उन्होंने यह जाहिर कर दिया था कि उग्र हिंदुत्व और अमर्यादित बयानबाजी उन्हें पसंद नहीं है। वे पार्टी को नए सांचे में ढालना चाहते हैं। उनकी लाइन नीतीश से मेल खा सकती है। चुनावी बिसात बिछाने का जिम्मा नीतीश का ही होगा। पीएम मोदी ने दिल्ली चुनाव में अमित शाह को अपना हुनर दिखाने का लगभग खुला मौका दे दिया था लेकिन वे विफल हुए। अब बिहार में वे अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे।

प्रशांत किशोर को पता है कि वे पर्दे के पीछे के कलाकार हैं। वे एनडीए तथा महागठबंधन से अलग तीसरा मोर्चा बनाकर नीतीश कुमार को परोक्ष रूप से लाभ पहुंचाने का प्रयास कर सकते हैं। दिल्ली चुनाव से सबक लेते हुए भाजपा बिहार में संभवतः विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़े। अपने उग्र हिंदुत्व के एजेंडे से परहेज़ करे। लेकिन सोशल मीडिया पर मोदीभक्तों की भाषा और सोच नहीं बदलेगी। प्रशांत किशोर पूरे उतार चढ़ाव पर नज़र रखेंगे और नीतीश का हित साधेंगे।

लालू प्रसाद ने जेल में रहते हुए झारखंड चुवाव में महागठबंधन की पूरी रणनीति बनाई और जीत दिलाई। बिहार में भी वे अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। चाहे जेल में रहें या जमानत पर बाहर आ जाएं। वे तेजस्वी यादव को बिहार की राजनीति में स्थापित करने का प्रयास करेंगे। प्रशांत किशोर यदि अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतारेंगे तो धर्म निरपेक्ष वोटों में ही हिस्सेदारी करेंगे। इन वोटों के विभाजित होने का सीधा लाभ एनडीए को मिलेगा।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

%d bloggers like this: