बिहार में गेम चेंजर बन सकते हैं शत्रुघ्न सिन्हा

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-देवेंद्र गौतम
बिहार में विपक्षी दलों के महागठबंधन में शामिल कांग्रेस स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख अविनाश पांडेय ने बिहार चुनाव की तिथियों की घोषणा के बाद कहा कि कांग्रेस बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि गठबंधन में सम्मानजनक सीटें मिलती हैं, तो साथ में चुनाव लड़ेंगे। उनके बयान को सिर्फ दबाव की राजनीति का हिस्सा नहीं समझा जाना चाहिए। कांग्रेस के लिए एक वैकल्पिक प्लेटफार्म तैयार है। वह है पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा का यूनाइटेड डेमोक्रेटिक अलायंस।
दरअसल बिहार विधानसभा चुनाव की तिथियों को घोषणा के बाद भी एनडीए और महागठबंधन के सहयोगी दलों की तसवीर साफ नहीं हो पा रही है। कांग्रेस ने अभी तक अपने पत्ते खोले नहीं है। कांग्रेस और राजद के बीच सीटों के बंटवारे का पेंच फंसा हुआ है। साथ ही महागठबंधन के चेहरे को लेकर भी असमंजस की स्थिति है। राजद के जन्मदाता लालू प्रसाद तेजस्वी यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना चाहते हैं। यह कांग्रेस को स्वीकार नहीं है। तेजस्वी यादव ने युवा वर्ग के बीच पैठ जरूर बनाई है। कोरोनाकाल में उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। लेकिन अभी भी वे नीतीश कुमार के मुकाबले भरोसेमंद चेहरा नहीं बन सके हैं। कांग्रेस के पास एक चेहरा है जो गेमचेंजर हो सकता है। वह चेहरा है सिने अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा का। वे बालीवुड में बिहार का नाम रौशन करने वाले सबसे बड़े कलाकार रहे हैं। अभी भी उनकी बेटी सोनाक्षी स्टार अभिनेत्री है। शत्रुघ्न सिन्हा पर बिहार के लोग नाज करते हैं। भाजपा उनका महत्व नहीं समझ पाई। सिर्फ आडवाणी खेमे का होने के कारण उनकी उपेक्षा की। वे कांग्रेस में आ गए। अभी बिहार में वे कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा हैं।
पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा के यूनाइटेड डेमोक्रेटिव अलायंस में डेढ़ दर्जन से अधिक दल शामिल हो चुके हैं। उसका प्रधान कार्यालय शत्रुध्न सिन्हा के लव-कुश अपार्टमेंट में है। कांग्रेस यदि शत्रुघ्न सिन्हा को सीएम का चेहरा बनाकर राजद नीत महागठबंधन में शामिल होती है तो एनडीए को कड़ी चुनौती दे सकती है। दूसरी सूरत में वह यशवंत सिन्हा के गठबंधन में शामिल होकर शत्रुघ्न सिन्हा के चेहरे को आगे कर मैदान में उतरती है तो सारे समीकरण बदल सकते हैं। लेकिन इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व को जोखिम उठाना होगा।
नीतीश कुमार निःसंदेह लालू प्रसाद के बाद दूसरे सबसे लोकप्रिय नेता हैं। लालू की छवि जितनी दागदार है उनकी छवि उतनी ही साफ सुथरी है। लेकिन कोरोना काल में अपने ढुलमुल रवैये के कारण वे बिहारवासियों के एक बड़े हिस्से को नाराज कर चुके हैं। प्रवासी मजदूरों की वापसी के समय उनका रवैया अन्यंत निष्ठुरता भरा रहा था। कोटा से बिहारी छात्रों की वापसी के मामले में उनका रवैया भेदभाव भरा था। उन्होंने भाजपा विधायकों के बच्चों की निजी वाहन से वापसी के लिए विशेष अनुमति दी लेकिन आम लोगों के बच्चों के मामले में निष्ठुर बने रहे। जो मजदूर कोरोनाकाल में पैदल चलकर घर वापस लौटे उन्हें घर के पास काम देने का वादा किया लेकिन उसे पूरा नहीं किया। इसका बिहार के हर पंचायत पर असर पड़ेगा। लेकिन लोग लालू प्रसाद के मुख्यमंत्रित्व काल के कटु अनुभवों को भूले नहीं हैं। लालू जी का जनाधार जातीय आधार पर टिका था। उनपर विरोध का खास असर नहीं पड़ता था। पिछले विधानसभा चुनाव में राजद ही सबसे बड़ा दल बनकर उभरा था। लेकिन यह जरूरी नहीं कि लालू का जनाधार तेजस्वी के नेतृत्व को स्वीकार कर ले। तेजस्वी की अभी भी लालूपुत्र के रूप में पहचान है। वे अखिलेश यादव की तरह पिता से अलग अपनी पहचान अभी नहीं बना सके हैं। वे अभी भी लालू की छत्रछाया में चलते हैं। तेजस्वी यादव ने लालू के कार्यकाल में हुई ज्यादतियों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है। राजद के पोस्टरों से लालू की तसवीर हटा दी है। लालू प्रसाद से अलग कार्यशैली का दावा किया है। उनकी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ा है लेकिन इतना नहीं कि लोग उन्हें नीतीश के विकल्प के रूप में स्वीकार कर लें। नीतीश के विकल्प के रूप में कोई भारी-भरकम, अनुभवी और प्रभावशाली चेहरा चाहिए। लालू प्रसाद पुत्रमोह में फंसे हैं। वे तेजस्वी को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। लेकिन यदि वे तेजस्वी को विधानसभा के एक और कार्यकाल तक उपमुख्यमंत्री के रूप में अपना कौशल दिखाने का मौका दें तो 2015 के चुनाव तक शायद वे मुख्यमंत्री के रूप में बेहतर प्रदर्शन का भरोसा दिला सकें। अब लालू प्रसाद के जल्द ही जेल से बाहर आने की उम्मीद है। उनके बाहर निकलने के बाद का परिदृश्य क्या होगा अभी कहना कठिन है लेकिन एक जरा सी गलती चुनाव परिणामों पर खासा असर डाल सकती है।

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

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