क्या कर पाएगा बिहार के चुनावी दंगल में यशवंत सिन्हा का मोर्चा

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पटना। पूर्व केंद्रीय वित्तमंत्री और विश्वविख्यात अर्थशास्त्री यशवंत सिन्हा ने बिहार चुनाव में हस्तक्षेप करने के लिए 16 दलों का यूनाइटेड डेमोक्रेटिक एलायंस बनाया है अभी तक बिहार के तीन चौथाई जिलों में जनसभाएं कर चुके हैं। इस गठबंधन में मुख्य रूप से डॉ अरूण कुमार के नेतृत्व वाली भारतीय सबलोक पार्टी, डा. देवेंद्र प्रसाद यादव के नेतृत्व वाला समाजवादी जनता दल (डी), मो. अशफाक आलम के नेतृत्व वाला जनता दल राष्ट्रवादी, डा सत्यानंद शर्मा की लोजपा (सेक्यूलर), प्रो. रतन मंडल की वंचित समाज पार्टी, एडवोकेट सुनील सिन्हा की बीपीएल पार्टी, अशोक झा की गरीब जनशक्ति पार्टी, नौशाद खान के प्रदेश नेतृत्व वाली जनता पार्टी, संजीव सिंह के नेतृत्व वाली भारतीय संपूर्ण क्रांति पार्टी, समीउल्लाह अहमद के नेतृत्व वाली भारतीय इंसान पार्टी, विद्या सागर मंडल के नेतृत्व वाली जागो हिन्दुस्तान पार्टी, हरिभाई पटेल के नेतृत्व वाली आम जनता पार्टी इंडिया, ब्रह्मदेव पटेल के नेतृत्व वाला संपूर्ण क्रांति मोर्चा,  निषाद उमेश मंडल के नेतृत्व वाला आम अधिकार मोर्चा, गणेश कुमार चौधरी के नेतृत्व वाली युवा क्रांतिकारी पार्टी और सुधीर कुमार झा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोक अधिकार पार्टी शामिल है। बालीवुड अभिनेता और पूर्व मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा का भी उन्हें सानिध्य प्राप्त है। यूडीए की सभाओं में भीड़ भी उमड़ रही है। वे देश की आर्थिक स्थिति और बिहार की बदहाली के संदर्भ में महत्वपूर्ण बातें कह रहे हैं लेकिन बिहार का मीडिया उनकी बातों पर उतना ध्यान नहीं दे रहा है जितना देना चाहिए।

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

दरअसल राष्ट्रीय मीडिया की तरह बिहार का मीडिया भी सत्ताधारी एनडीए अर्थात नीतीश सरकार को बचाने में लगा हुआ है। तेजस्वी यादव और राजद को तो मीडिया नज़र-अंदाज़ नहीं कर सकता क्योंकि उन्हें इसका खमियाज़ा तुरंत भुगतना पड़ सकता है। क्योंकि राजद के पास क्रयशक्ति भी है और बाहुबल भी। यशवंत सिन्हा के पास ज्ञान का भंडार है, साफ सुथरी छवि है। वे लोकनायक जय प्रकाश नारायण के करीबी रहे हैं। लेकिन उस पीढ़ी के अधिकांश पत्रकार या तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं या गुजर चुके हैं जिन्होंने 1974 के आंदोलन को देखा था। वे मीडिया मालिक भी नहीं रहे जो लाभ-हानि से ज्यादा उसूलों को प्राथमिकता देते थे। अभी जो पीढ़ी पत्रकारिता में है वह पूरी तरह व्यावसायिक है। इसमें अधिकांश लोगों को देस-समाज से कुछ भी लेना देना नहीं है। उन्हें मोटा वेतन चाहिए और लाइजेनिंग से कमाई के अवसर। चुनाव के समय मीडिया संस्थानों के साथ पैकेज डील का प्रचलन है। हर दल और हर गठबंधन चुनाव के दौरान इस तरह के डील करता है। मीडिया संस्थानों के मालिक से लेकर संपादक तक चुनावों के समय का इंतजार करते रहते हैं। उन्हें जीत हार से मतलब नहीं होता है। प्रेस काउंसिल के कड़े नियमों के बावजूद मीडिया में पेड न्यूज का प्रचलन है। आज का पत्रकार सिर्फ गांधी छाप नोटों की भाषा समझता है। उसे देस के हालात के सही विश्लेषण और ज्ञानवर्धक बातों से कोई मतलब नहीं है।

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