यूज एंड थ्रो की नीति पर चलता उपभोक्ता बाजार

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

चीन की यूज एंड थ्रो की उत्पादन नीति आज उपभोक्ता बाजार की प्रचलित नीति बन चुकी है। इसके कारण उपभोक्ता वस्तुओं के पुनर्विक्रय (रीसेल) मूल्यों पर खासा प्रभाव पड़ा है। कबाड़ी बाजार में पुरानी चीजें मिट्टी के भाव बिकती हैं जबकि उपभोक्ता बाजार में नए उत्पाद सोने के भाव मिलते हैं। आज की तारीख में यदि आप दो वर्ष पुरानी 12 लाख की कार बेचना चाहें तो डेढ़ लाख से ज्यादा कीमत नहीं मिलेगी। लकड़ी का पलंग खरीदने जाएं तो कम से कम 50-60 हजार ढीले करने पड़ेंगे लेकिन यदि सखुआ और सागवान जैसी कीमती लकड़ियों का पुराना बढ़िया से बढ़िया पलंग बेचने जाएं तो चार-पांच हजार से ज्यादा नहीं मिलेंगे। फर्निचर बाजार में कीमतें आसमान छू रही हैं जबकि उनकी गुणवत्ता की कोई गारंटी नहीं है।

आज का नव धनाढ्य वर्ग यूज एंड थ्रो नीति का सबसे बड़ा वाहक है। वह पूरी तरह दिखावे में विश्वास करता है। वह पुनर्विक्रय मूल्य की जरा भी चिंता नहीं करता। उसे समाज में अपना रुत्बा बनाए रखने के लिए बाजार में आनेवाला नया से नया उत्पाद चाहिए। चाहे इसके लिए जो भी खर्च करना पड़े। कार चाहे छह महीने की हो लेकिन जरा सा स्क्रैच आ गया तो उसकी शान में बट्टा लग जाता है। वह उसे पेंट कराकर छुपाएगा नहीं बल्कि उसे बेचकर नए मॉडल की कार ले आएगा। पुरानी वस्तुओं की कीमत मिले न मिले लेकिन यदि फैशन की दुनिया में  आउटडेटेड मान लिया गया तो उसे तत्काल उसकी नज़रों के सामने से हट जाना चाहिए।

निम्न वर्ग अपनी जरूरत की न्यूनतम चीजों में खुश रहता है। वह बुनियादी जरूरतों का जुगाड़ करने में इतना परेशान रहता है कि उसके पास न आकांक्षाएं शेष रहती हैं न महत्वाकांक्षाएं। फैशन की दुनिया और उपभोक्ता बाजार की हलचलों से उसका ज्यादा सरोकार नहीं रहता। कबाड़ी बाजार का वह सबसे आदर्श ग्राहक होता है। वहां उसे सस्ते भाव में काम की चीजें मिल जाती हैं।

चीन की नीति से सबसे ज्यादा फर्क मध्यम वर्ग को पड़ता है। उसे अपने घरेलू बजट का भी ध्यान रखना होता है और सामाजिक प्रतिष्ठा भी बचाए रखनी होती है। वह पुरानी चीजों से काम चला लेता है। लेकिन जब पुरानी वस्तु काम की नहीं रहती और उसके बदले नई वस्तु लाना जरूरी हो जाता है तो वह सोच में पड़ जाता है कि अतिरिक्त राशि कहां से लाए। मासिक बजट के किसी न किसी मद में उसे कटौती करनी पड़ जाती है। खासतौर पर नौकरीपेशा वर्ग के लोगों का जब एक शहर से दूसरे शहर में तबादला होता है और नियोजक कंपनी अथवा विभाग शिफ्टिंग का समुचित खर्च नहीं देता तो वह और संकट में पड़ जाते हैं। गृहस्थी के जरूरी सामान और रोजमर्रे के जीवन की जरूरी चीजें अपने साथ ले जाना चाहें तो ट्रांस्पोर्टिंग में अच्छा-खासा खर्च पड़ जाता है और उन्हें बेचकर निकलना चाहें तो उनकी इतनी कीमत नहीं मिलती कि नई जगह में थोड़ा-बहुत पैसा लगाकर नया सामान खरीद सके।

वास्तव में तमाम उपभोक्ता वस्तुओं के साथ पुनर्विक्रय मूल्य की समस्या है। सिर्फ सोने, प्लेटिनम और चांदी जैसे नकदी धातुओं के बने सामान ऐसे हैं जिनका पुनर्विक्रय मूल्य बाजार मूल्य के अनुरूप मिलता है हालांकि उसमें भी बट्टा कट ही जाता है। फिर भी खरीद मूल्य से ज्यादा राशि मिल जाती है।

यूज एंड थ्रो नीति का सबसे ज्यादा लाभ कबाड़ी बाजार को मिलता है। वे वास्तव में कूड़ा कर्कट से सोना निकालने की कहावत को चरितार्थ करते हैं। वे कम से कम कीमत पर चीजें खरीदते हैं और अच्छे मूल्य पर बेचकर अच्छी खासी कमाई करते हैं। दरअसल य़ूज के बाद थ्रो की जाने वाली सारी वस्तुएं व्यर्थ नहीं हो जातीं। जिन वस्तुओं की रीसाइक्लिंग संभव है वह रीसाइक्लिंग इकाइयों के लिए कच्चे माल का काम करती हैं। फिर संबंधित उद्योग में जाकर तरो-ताज़ा हो जाती हैं और नया आकार ग्रहण कर बाजार की शोभा बढ़ाने चली आती हैं। कबाड़ियों की लगभग सभी वस्तुएं खप जाती हैं। चाहे उद्योग जगत में खपें या निम्न मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं के बीच। उन्हें सबसे ज्यादा लाभ लोहा, पीतल, तांबा जैसी धातुओं के कबाड़ से होता है।

लेकिन सिंगल यूज प्लास्टिक जैसी जिन चीजों की रीसाइक्लिंग संभव नहीं होती इस्तेमाल के बाद वह हमेशा के लिए कचरे में बदल जाती हैं और सिर्फ प्रदूषण का वाहक बनकर रह जाती हैं। उनकी खपत कबाड़ी बाजार में भी नहीं होती।

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