ग़ज़लः बादलों की ओट से बाहर निकलता क्यों नहीं

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बादलों की ओट से बाहर निकलता क्यों नहीं.

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

वो अगर सूरज है तो करवट बदलता क्यों नहीं.

 

रास्ता फिसलन भरा है तो बदलता क्यों नहीं

ठोकरें खाता है तो खाकर संभलता क्यों नहीं.

 

क्यों हवा में बेसबब तलवारबाजी कर रहा है

युग बदलना चाहता है तो बदलता क्यों नहीं

 

हर तरफ अंधेरगर्दी और हम सब चुप खड़े

खून बाकी है रगों में तो उबलता क्यों नहीं.

 

जाने किस-किस दौर की बातें सुनाता है हमें

वो हमारे वक़्त के सांचे में ढलता क्यों नही.

 

क्या कोई आसेब है बाहर कहीं बैठा हुआ

आजकल घर से कोई बाहर निकलता क्यों नहीं.

 

एक सपना ज़िंदगी में टूट जाता है अगर

दूसरा सपना कोई आंखों में पलता क्यों नहीं.

 

-देवेंद्र गौतम

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