हार्स ट्रेडिंगः यहां आर्थिक मंदी का कोई असर नहीं

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देवेंद्र गौतम

जानकार लोग महाराष्ट्र में हार्स ट्रेडिंग का आरोप लगा रहे हैं। ट्वीटर  पर हार्स ट्रेडिग एक्सपर्ट का हैश टैग चल रहा है। हार्स ट्रेडिंग यानी घोड़ों का व्यापार। सौदागर थैलियां लेकर घूम रहे हैं, लेकिन मंडी सज नहीं पा रही है। एक अश्वपालक ने पूरे अस्तबल को ही बेच दिया। बाद में पता चला कि वह एक फर्जी व्यक्ति है। उसके पास एक भी अश्व नहीं है। उसे अश्वों का सरदार बनाया गया था। सौदागरों के डर से अश्वपालकों ने अपने तमाम घोड़े अलग-अलग अस्तबलों में सौदागरों की नज़रों से बचाकर रखे हैं। सौदागरों को लंबी यात्रा पर जाना है। उन्हें घोड़ों की सख्त जरूरत है। इसके लिए वे कोई भी कीमत अदा करने को तैयार हैं। आम लोगों के लिए भले मंदी हो लेकिन राजनीतिक घोड़ों के व्यापारियों के पास पैसों की कोई कमी नहीं हैं। उनके पास कई रास्तों से लक्ष्मी का आगमन हो रहा है। उन्हें माल चाहिए कीमत जो लगे। आमतौर पर बाजार मांग और पूर्ति के नियमों से संचालित होता है। मांग हो और माल की कमी हो तो खरीदार मुंहमांगी कीमत देने को तैयार हो जाते हैं। जहां तक राजनीतिक घोड़ों की मंडी का सवाल है वह रोज-रोज नहीं सजती। जब सजती है तो या तो पूरे अस्तबल की थोक बोली लगती है अथवा कुछेक घोड़े खुदरा भाव में मिल जाते हैं। लेकिन आसानी से नहीं। इसके लिए हमेशा मंडी में पिछले दरवाजे में सेंध लगाकर गुपचुप प्रवेश करना पड़ता है।

वैसे यह दुनिया की एकमात्र मंडी है जहां कोई मूल्य तालिका लागू नहीं होती। जिस कीमत पर सौदा पट जाए वही मूल्य होता है। यह एकमात्र मंडी है जहां दुकानदार नहीं बल्कि माल स्वयं अपनी कीमत तय करता है। इसका थोक बाजार भी सजता है लेकिन कभी-कभार। अभी थोक बाजार बंद है और खुदरा बाजार पर कड़ा पहरा है। व्यापारियों को किसी कीमत पर घोड़ों की जरूरत है। उन्हें लंबी यात्रा पर जाना है। घोड़े नहीं मिले तो उन्हें अपनी यात्रा स्थगित करनी पड़ जाएगी और उनकी साख पर भी असर पड़ेगा। उनके दलाल अस्तबल के चारो ओर सेंध लगाने लायक जगह तलाश रहे हैं। सेंध लगा सके तो अच्छा-खासा कमीशन मिल जाएगा।

अर्थशास्त्रियों को इस बात से खुश होना चाहिए कि अर्थिक जगत के हर सेक्टर में मंदी है लेकिन हार्स ट्रेडिंग के धंधे में मंदी का कहीं नामो-निशान तक नहीं है। बिकने वालों को मुंहमांगी कीमत का ऑफर मिल रहा है। घोड़ों के पालक अपने घोड़े बचाने के लिए महंगे से महंगे अस्तबलों का इस्तेमाल कर रहे हैं। एक-एक घोड़े पर प्रतिदिन लाख-लाख रुपये खर्च किए जा रहे हैं जबकि सौदागरों के दलाल उन्हें करोड़ों का ऑफर दे रहे हैं। वे नोटों की गड्डियां दिखाकर अस्तबल के बाहर आने का इशारा कर रहे हैं।  यह बाजार तो इतना तप रहा है कि हाथ लगाते ही जल जाने का खतरा है। घोड़ों को खरीदने और उन्हें बिकने से बचाने पर पानी की तरह पैसे बहाए जा रहे हैं। सारी मर्यादाएं ताक़ पर रख दी गई हैं। व्यापारियों और अश्व पालकों के बीच रस्साकशी चल रही है। परिणाम क्या होगा पता लग जाएगा। पता नहीं वित्त मंत्रालय की इस मंडी पर नज़र है या नहीं। इसका उदाहरण देकर वह आर्थिक मंदी को सिरे से नकार सकता है। कम से कम फिल्मों की कमाई और ओला-उबर के इस्तेमाल यह बेहतर उदाहरण होगा।

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