गूगल सर्च की दिलचस्प दुनिया

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देवेंद्र गौतम

गूगल ज्ञान का विश्वकोश अवश्य है लेकिन इसकी दुनिया अजीबो-गरीब है। हाल में मैं झारखंड विधानसभा चुनाव के कुछ प्रत्याशियों की तसवीरें तलाश रहा था। रिजल्ट तो तुरंत मिल रहे थे लेकिन नेताओं की जगह कभी फिल्मी सितारों की तसवीरें निकल रही थीं तो कभी खेल जगत के महारथियों की। जिनकी तसवीरों की दरकार थी वह निकल ही नहीं रही थी। निकल भी रही थीं तो उनके साथ दूसरे लोग भी निकल आ रहे थे। मैंने इंटक के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्वमंत्री राजेंद्र प्रसाद सिंह की तसवीर सर्च की तो पीएम मोदी निकल आए। दोनों एक दूसरे के विरोधी ध्रुवों के नेता।

रघुवर दास की तसवीर ढूंढी तो उनके साथ चिन्मयानंद भी निकल आए। जो रघुवर दास को पहचानता है वह उनकी तसवीर अलग कर लेगा लेकिन किसी दूसरे देश या प्रदेश का की व्यक्ति यदि झारखंड की राजनीति पर लिख रहा हो और वह नेताओं को पहचानता नहीं हो तो वह रघुवर की जगह चिन्मयानंद की तसवीर लगा ही देगा न। सरयू राय की तसवीर ढूंढने पर एश्वर्या राय निकल आती हैं। भला सरयू राय का एश्वर्या राय से क्या लेना –देना। लेकिन यह जो गूगल है किसका संबंध किससे जोड़ दे कोई नहीं जानता। भला झारखंड के नेताओं का बॉलीवुड सितारों से क्या लेना देना।

फर्ज कीजिए कि मैं गूगल का अंधभक्त बन जाऊं। उसकी हर बात को ब्रह्मवाक्य मान लूं और सीएम रघुवर दास पर आलेख हो और उसमें अमिताभ बच्चन की तसवीर लग जाए तो पाठकों पर क्या असर पड़ेगा। से फेसबुक और ट्विटर पर शेयर पर भी कर दें तो क्या होगा। पागल गूगल को तो नहीं करार दिया जाएगा। वह सम्मान तो मुझे ही मिलेगा। ट्रोल गूगल नहीं होगा। मैं होउंगा। देवता तो नास्तिकों के लिए भी सम्मानित होते हैं। मजाक देवता का नहीं हमेशा उसके भक्तों का उड़ता है। इसलिए अंधभक्ति पूरी तरह मूर्खता का परिचायक है। किसी को पसंद करना अलग बात है और किसी की अच्छी-बुरी हर बात में हामी भरना अलग बात। रघुवर दास, हेमंत सोरेन, सुबोधकांत सहाय और सलमान खान, आमिर खान, साहरुख कान के बीच के अंतर को समझने के लिए तो अपने विवेक का इस्तेमाल करना होगा न। अंधभक्त विवेकहीन होता है। विवेक को ताक़ पर रखकर भक्ति के नतीजे भयावह हो सकते हैं। लेकिन लोग समझें तब न।

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