व्यंग्यःभक्तों और निंदकों की डिजिटल जंग

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-देवेंद्र गौतम

एक आदर्श भक्त हमेशा अंधा होता है। जो अंधा न हों वह भक्त हो ही नहीं सकता। आंखवाले तो सिर्फ नकारात्मकता देखते हैं। वे पौराणिक काल के देवताओं के की भी गलतियां ढूढ लेते हैं और उनपर टीका-टिप्पणी कर बैठते हैं लेकिन अंधभक्तों को सिर्फ उजाला ही उजाला दिखाई देता है। उसके मन की बगिया में कभ पतझड़ नहीं आता। हमेशा सावन की घटाएं छाई रहती हैं। आमतौर पर भक्तों की हाजरी हमेशा अपने आराध्य की दहलीज़ पर उसकी मूर्ति या उसकी तस्वीर पर बनती है। उसकी आरती उतारी जाती है। उसकी पसंद के भोग लगाए जाते हैं। उसके नाम का जाप लगाया किया जाता है। उसे भांति-भांति से प्रसन्न करने की कोशिश की जाती है। लेकिन जीवित भगवान भी तो होते हैं और भारत में तो थोकभाव में हैं।

हाल के वर्षों में देश के अंदर देवताओं और भक्तों की एक ऐसी जमात सामने आई है जिसकी दहलीज़, जिसकी मूर्ति, जिसका मंदिर इंटरनेट पर है और उसके भक्तों की दैनिक हाजरी सोशल मीडिया पर बनती है। वे सुबह आंख मलते हुए उठते हैं और सबसे पहले फेसबुक और ट्वीटर जेसे प्लेटफार्मों पर नज़र डालते हैं। इसके बाद थोड़ा यू-ट्यूब की ओर झांक लेते हैं। वे देख लेते हैं कि उनके प्रभु की किस-किस ने निंदा की है। उसे किस-किस गाली से नवाज़ना है। पहले इसका चयन और आकलन कर लेते हैं। इसके बाद मोबाइल पर उनकी उंगलियां रेंगने लगती हैं।

दरअसल जिसे वे वंदनीय समझते हैं बहुत से लोगों के लिए वह निंदनीय प्राणी हो जाता है। यह कोई नई बात नहीं है। हर युग में भक्तों और निंदकों के बीच निंदा और वंदना का संग्राम होता रहा है। इस युग में भी हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि प्राचीन काल में दो मतावलंबियों के बीच शास्त्रार्थ होता था और ज्ञान के आधार पर विजय पराजय का फैसला होता था। आज के समय न शास्त्र पढ़े जाते हैं न उनकी चर्चा की जाती है। अधिकांश लोग तो अपने शास्त्रों का नाम तक नहीं जानते। साफ बात है कि यह आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र का युग नहीं है। शब्दकोश हो तो शब्दों का चयन होता है लेकिन न हो तो अपशब्दों का आदान-प्रदान होता है। शास्त्रविहीन शास्त्रार्थ में तर्क की कोई गुंजाइश नहीं होती। मर्यादा की कोई निर्धारित सीमा नहीं होती। इस जंग में एक दूसरे की मां बहनों के साथ धड़ल्ले से संबंध बनाए जाते हैं। देशद्रोह और देशभक्ति के प्रमाणपत्र बांटे जाते हैं। हर पोस्ट के साथ लाइक, डिसलाइक और कीचड़ फेंका-फेंकी का खेल चलता रहता है। भक्तों के आराध्य अपने भक्तों की डिजिटल हाजरी की समय-समय पर जांच करते रहते हैं। भक्ति की गहराई और समर्पण के आधार पर उनतक अपनी कृपा पहुंचाने का प्रयास करते रहते हैं। आराध्य की नज़र निंदकों पर भी लगी रहती है और वे उन्हें सबक सिखाने का मौका देखते रहते हैं। भक्त के लिए उसका आराध्य ईश्वर समान होता है। राजा धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। ईश्वर कभी गलती नहीं करता। उसकी गलती किसी खास मकसद से की जाने वाली लीला होती है। नास्तिक लोग उसके गूढ़ अर्थ को नहीं समझ सकते।

बहरहाल भक्तों और निंदकों की इस डिजिटल जंग में और कुछ नहीं होता तो कम से कम सोशल मीडिया के प्लेटफार्मों की लोकप्रियता बढ़ती जाती है। उनका बाजार बना रहता है।

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