संसदीय राजनीति के पलटूराम

कब क्या करेंगे खुद भी नहीं जानते

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व्यंग्य

राजनीति के पलटूराम

देवेंद्र गौतम

दक्षिणपंथ के साथ गंठजोड़ कर वामपंथी आचरण को अपनाने में, दो नावों की संतुलन कायम रखते हुए सवारी करने में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कोई जवाब नहीं है। उन्हें राजनीति का चाणक्य कहते हैं। कब कौन सी करवट बैठेंगे दूसरे लोग क्या, वे स्वयं नहीं जानते। लालू प्रसाद ने उनका नाम पल्टूराम रखा है। कई बार वे पल्टी मार भी चुके हैं। वे आरएसएस और भाजपा की हिन्दूवादी नीति का विरोध करते हैं और जरूरत पड़ने पर बड़ी होशियारी से समर्थन भी कर देते हैं। तीन तलाक और धारा-370 के मामले में उन्होंने रिंद के रिंद रहे हाथ से ज़न्नत न गई का बेहतरीन उदाहरण पेश किया था।

इसमें संदेह नहीं कि आज की तारीख में बिहार में उनके कद-काठी का कोई नेता नहीं है। लालू प्रसाद के बाद वही बिहार के सर्वमान्य जननेता रहे हैं। लोग उन्हें सुशासन बाबू कहते हैं। उनके साथ विडंबना यह है कि वे जब अकेले मैदान में उतरते हैं तो ढाक के तीन पात हो जाते हैं लेकिन जब लालू के साथ मिल जाते हैं तो मोदी का जादू भी बेअसर हो जाता है। उन्होंने बिहार में नशाबंदी कर रखी है। शुरू में इसे बहुत कड़ाई के साथ लागू किया गया था। डर था कि कहीं बिहार के पियक्कड़ उनकी सरकार के खिलाफ विद्रोह न कर दें। लेकिन नीतीश जी ने माहौल भांप लिया। अब दारू पीने वालों को कोई खास परेशानी नहीं है। उन्हें काले बाजार से मनपसंद बोतल मिल जाती है। बस ध्यान देना पड़ता है कि नशे की हालत में सड़क पर नौटंकी न करें। पिछले दरवाजे की व्यवस्था लागू होने के कारण नीतीश जी को बिहार के शराबियों की हाय नहीं लगी है। उनका वोट बैंक बरकरार है। प्रतिबंध के बावजूद सूबे में पीना-पिलाना कम नहीं हुआ है। हां, इतना जरूर हुआ है कि अब कोई माइकल दारू पीकर सड़कों पर दंगा करने का साहस नहीं करता। ऐसा करने पर उसका जेल जाना तय हो जाता है। घर में पीकर तबतक हल्ला-गुल्ला कर सकते हैं जबतक पत्नी पुलिस में शिकायत न करे। लेकिन सड़कों पर ऐसा करना महंगा पड़ता है।

बिहार में नीतीश जी के शासनकाल में पुराने बाहुबलियों पर लगाम तो लगा है लेकिन अपराध कम नहीं हुआ है। अब अपराध की दुनिया को कायम रखने के लिए नए-नए नक्षत्रों को उदीयमान होना पड़ा है। उनमें से कई नामजद नहीं हैं। लिहाजा उन्हें पकड़ना भी मुश्किल है। अपराध के राजनीतिक संरक्षण में भी कमी आई है। अनंत सिंह नीतीश के करीबी बाहुबली थे। अब एके-47 और हैंड ग्रेनेट की बरामदगी के बाद उनके ऊपर भी राहु-केतु सवार हो चुके हैं। नीतीश जी उनकी कोई मदद कर अपने पांवों पर कुल्हाड़ी नहीं मार सकते।

उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद जेल में हैं। वे नीतीश जी को चुनौती नहीं दे सकते। नीतीश जी एनडीए में हैं लेकिन भाजपा के नियंत्रम में नहीं हैं। मोदी जी के गुड बुक में भी नहीं हैं। भाजपा और संघ के साथ उनका चूहे बिल्ली का खेल चल रहा है। भाजपा उनके विकल्प की तलाश में हैं और वे स्वयं को मोदी के विकल्प के रूप में तैयार करने के प्रयास में लगे हैं। समस्या यह है कि विपक्षी खेमा उन्हें नेता नहीं मानेगा और उनकी पार्टी जदयू क्षेत्रीय पार्टी है। उसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिलने के बाद ही वे राष्ट्रीय स्तर पर कोई चुनौती पेश कर सकते हैं। इसके लिए वोटों का प्रतिशत जुटाना होगा। सिर्फ बिहार के वोटों से बात नहीं बनेगी। उन्होंने साफ कर दिया है कि बिहार के बाहर वे एनडीए में नहीं हैं। वे यूपीए में भी नहीं जा सकते। बिहार के बाहर अकेले उम्मीदवार खड़े करेंगे। जीतें या हारें वोटों के प्रतिशत में इजाफा तो होगा ही। नीतीश जी बिहार में अगला विधानसभा चुनाव एनडीए के साथ मिलकर जरूर लड़ेंगे लेकिन दूसरे राज्यों में वोट जुटाएंगे। पिछली बार वे कांग्रेस और राजद के साथ मिलकर चुनाव जीते। सरकार बनाई। उसके मुख्यमंत्री बने। फिर अचानक पलटी मारकर भाजपा के साथ गंठजोड़ कर लिया और मुख्यमंत्री बने रहे। अभी तो नीम पर करैले की डाल की कहावत सिद्ध करते हुए उनके साथ प्रशांत किशोर जैसे धुरंधर रणनीतिकार जुड़ चुके हैं। दोनों मिलकर आने वाले समय में कौन सा चक्रव्यूह रचेंगे अनुमान लगाना मुश्किल है। नीतीश जी शांत बैठने वाले नेता नहीं हैं। वे समझ चुके हैं कि कांग्रेस मोदी के सामने खड़ी नहीं हो पाएगी और क्षेत्रीय दल मेढ़क की तरह एक तराजू पर तुल नहीं पाएंगे। कोई उधर छलांग लगाएगा कोई उधर। मुलायम सिंह, मायावती और अरविंद केजरीवाल में कोई दम नहीं है। वामपंथी अपने खोल में ही सिमटे रहेंगे। लिहाजा विकल्प के रूप में उनसे विश्वसनीय चेहरा देश में दूर-दूर तक नज़र नहीं आता। उन्हें विश्वास है कि वे एकबार देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जरूर बैठेंगे।

ईश्वर नीतीश जी को सुबुद्धि दे। बाकी आने वाले समय में क्या होगा कौन जानता है।

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