देवेंद्र गौतम की दो ग़ज़लें

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1

हर घड़ी ग़म से आशनाई है.

ज़िंदगी फिर भी रास आई है.

 

आस्मां तक पहुंच नहीं लेकिन

कुछ सितारों से आशनाई है.

 

अपने दुख-दर्द बांटता कैसे

उम्रभर की यही कमाई है.

 

ख्वाब में भी नज़र नहीं आता

नींद जिसने मेरी चुराई है.

 

अब बुझाने भी वही आएगा

आग जिस शख्स ने लगाई है.

 

काफिले सब भटक रहे हैं अब

रहनुमाओं की रहनुमाई है.

 

झूठ बोला है जब कभी मैंने

मेरी आवाज़ लड़खड़ाई है

 

कोई बंदा समझ नहीं पाया

क्या ख़ुदा और क्या खुदाई है.

 

2

 

घड़ी भर के लिए भी धूप के पाले नहीं पड़ते.

कई चेहरे हैं ऐसे जो कभी काले नहीं पड़ते.

 

लुटेरों में कहां दम था कि तिनका भी उठा पाते

अगर इस घर के पीछे घर के रखवाले नहीं पड़ते.

 

जो ज़रवाले हैं, लुटने का उन्हीं को खौफ होता है

फकीरों के घरों में आज भी ताले नहीं पड़ते.

 

न जाने कौन सा जादू है आखिर उनके तलवों में

दहकती आग पे चलते हैं और छाले नहीं पड़ते.

 

अक़ीदत और करम के बीच कुछ दूरी रही होगी

तेरे बंदों को वर्ना जान के लाले नहीं पड़ते.

 

कई फ़नकार गुमनामी की चादर ओढ़ लेते हैं

सभी के नाम पे शोहरत के दोशाले नहीं पड़ते.

बहुत आराम से कटनी थी अपनी ज़िंदगी गौतम

मेरे पीछे अगर आफत के परकाले नहीं पड़ते.

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