सुशील भारती की दो कविताएं

two poems of sushil bharti

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दो कविताएं

1

विद्रुपताओं का दंश

– सुशील भारती , प्रभात खबर , रांची

दोस्त ! तुम्हारे व्हाट्सएप मैसेज में / बस , निराशा – हताशा –

क्यूं होता है ?

मैं समझ नहीं पाता /

और –

हर बार / मेरा यही सवाल होता है /

क्यों दोस्त क्यों ?

अरे ! यहां पूरी प्रकृति ही विपरीतताओं से –

भरी है / बचपन में कभी आंत /

तो कभी सांस /

अब –

आंख / दांत / गुर्दे –

कभी चीनी तो कभी घुटने /

ओह !

मोहल्ले का कुत्ता /

तो खुद – पड़ोसी /

घर में भाइयों की लुगाई /

दफ्तर में जतपुछवा हाकिम /

हर टेबुल पर /

प्रायः विचारों के बंटे /

सड़े लोग /

हर आदमी के ज़ेहन में –

पलता बघनखा /

एक – दूसरे के प्रति /

कानों में फुफुसाहट का तूफान /

आदमी को मशीन बनाने की साजिश /

हवाओं में चेतावनी /

जीने की / बेशुमार –

शर्ते /

मेरे हताश दोस्त /

जीने के लिए /

जरूरी है – मुठभेड़ /

मेरे निराश दोस्त /

क्या तुम जमाने की इस दौर को –

दिखाना चाहते हो –

अंगूठा /

हां , तुम्हें –

दिखाना ही होगा – अंगूठा /

मुठ्ठियां बांधकर –

उठो – बढ़ो /

तमाम शत्रुओं के –

नाजायज़ प्रहार को –

रोकना ही होगा /

अस्त्र तुम्हारे पास है /

बस मुस्कुराते रहो /

सबके साथ /

आहिस्ता – आहिस्ता /

खुद ही खोने लगेंगे /

अस्तित्व /

उनकी विकृतियों पर –

ठहाके लगाओ /

तुम्हारे खिले चेहरे /

और –

ओठों की मुस्कान /

सहज ही –

उनके लिए /

तेजाब बन जायेंगे /

एक बार आजमाना जरूर /

विद्रुपताओं का दंश /

तुम्हें चारपाई पर /

सदा के लिए /

निढ़ाल कर दे /

उसके पहले /

मुस्कुराने का –

प्रत्यंचा खींच लेना /

बरना –

बेदर्द दुनिया –

तुम्हें मारे /

उससे पहले –

तुम खोल दो –

बगापत का मोर्चा /

तुम्हें –

जीतना होगा /

जीतना ही होगा /

ऐ मेरे ! दोस्त ।

 

2.

 

रोटी का इन्द्रजाल

* सुशील भारती

जल तू / जलाल तू –

आई बला को टाल तू /

बकते – बकते /

जीवन के साठवें –

सांप सीढ़ी पर /

चढ़े लोग /

खुद से करते हैं –

सवाल /

क्या मिला / नहीं मिला तो –

क्यों नहीं मिला /

फकत एक रोटी –

की ओर /

मां की गोद से –

दादी की ओर /

पहली बार बढ़े थे /

कदम /

जो बढ़ते ही गए /

रुके तो साठवें –

पड़ाव की नाभि पार थी /

एक हांफते / किसी कुत्ते की –

मानिंद /

सब कुछ ठहर गया /

न काबा /

न काशी /

न वादियों का खुलापन /

न शकुन के सरगम /

मुठ्ठियों में पतझर की –

सड़ी – गली पत्तियां /

शेष योगांक बताती /

पूछती है –

कई – कई सवाल /

कितने – कितने सवाल /

सब के सब –

हृदयाघात के /

प्रयाप्त समिधा हैं /

दीवाल पर टंगी –

बाबूजी के ज़माने की –

घड़ी /

अपनी टिकटिकाहट से –

मौन तोड़तीं है /

माथे के पसीने /

महाप्रयाण की ओर –

इशारा करते प्रतीत –

होते हैं /

अकेले रोटी की ओर –

बढ़े पांव /

परिवार की व्याख्या –

के लब्बोलुआब के साथ /

पूरा कुनबा गढ़ लेता है /

पर थका –

थका /

मेरा कदम /

शक्तिहीन होने लगा है /

सोंचता हूं –

आगे फिर होड़ में –

सब आगे बढ़ जाएंगे /

फकत अकेला – मैं ?

रोटी के इन्द्रजाल का /

शिकार बनूंगा /

तय नहीं कर पाता /

रोटी को कोसूं ,/

या फिर –

राम का नाम लूं /

सच –

तय नहीं कर पाता /

क्या करूं /

क्योंकि –

अवसर /

कब का अंगूठा दिखाकर –

जा चुका है /

अब तो बस –

राम – राम / राम – राम ।।।।।

 

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