धीरे-धीरे टूट रहा है भाजपा का तिलस्म

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों के सबक

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पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

देवेंद्र गौतम

हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव नतीजों ने भाजपा की खुले दरवाजे की नीति को बड़ा झटका दिया है। भाजपा विपक्षी दलों के जनप्रतिनिधियों को पार्टी में शामिल करके अपने टिकट पर चुनाव लड़ाती रही है। लगभग हर चुनाव में वह ऐसा करती रही है। दल बदलने वाले सांसदों, विधायकों को टिकट मिलने की पूरी गारंटी दी जाती थी। भाजपा को लगता था कि वह इस तरीके से वह सभी विपक्षी दलों का खात्मा कर देगी। दलबदलू विपक्षी नेताओं को भी यह लगता था कि सत्तासुख की कुंजी फिलहाल भाजपा के हाथ में है। मोदी के नाम पर वे जीत हासिल कर लेंगे और उन्हें मंत्री बनने का मौका मिल जाएगा। दल-बदल को बढ़ावा देने के इस रवैये के कारण भाजपा कार्यकर्ताओं में नाराजगी थी। उन्हें लग रहा था कि पार्टी आयातित प्रत्याशियों को मैदान में उतारती रहेगी और उन्हें चुनाव लड़ने का कभी मौका नहीं मिल पाएगा। हाल के दिनों में झारखंड के विपक्षी दलों के पांच विधायक भाजपा में शामिल हुए थे। झाविमो सुप्रीमो इस बात का इंतजार कर रहे थे कि दल-बदल के कारण जो विक्षुब्ध होंगे उन्हें अपनी पार्टी में शामिल कर चुनाव लड़ाएंगे।

लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में दूसरे दलों से आए भाजपा के अधिकांश प्रत्याशी हार गए। इससे यह बात स्पष्ट हो गई कि दूसरे दलों के नेताओं को टिकट देने के आश्वासन पर शामिल करना मुनाफे का सौदा नहीं है। जनता उन्हें स्वीकार नहीं करती है। मोदी का जादू भी ऐसे मामलों में बेअसर हो जाता है। अब झारखंड और दिल्ली के चुनाव होने हैं। झारखंड में दल-बदल की शुरुआत ही हुई थी कि दो राज्यों के नतीजों ने खेल बदल दिया। अब जो विधायक भाजपा का दामन थामने की तैयारी में हैं उन्हें शामिल करने से पहले भाजपा को सोचना पड़ जाएगा। दूसरी बात यह कि जो शामिल हो चुके हैं उन्हें टिकट देने के वादे पर भी ग्रहण लग सकता है। बाबूलाल मरांडी को भी अब अपनी चुनावी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ जाएगा। कांग्रेस और झामुमो को भी अपने नेताओं के भगवाकरण की चिंता से मुक्ति मिलेगी।

यह बात साबित हो चुकी है कि संसदीय राजनीति में सत्ता के लिए कुछ भी करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। जनता से किसी का कुछ भी लेना-देना नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बार-बार यह भ्रम हो जाता है कि जनता उनके नाम पर किसी को भी वोट दे देगी। उन्हें यह बात समझ में नहीं आ रही कि सैन्य राष्ट्रवाद का उन्माद कभी स्थाई भाव नही ग्रहण कर सकता। लोगों को रोजगार चाहिए, शांत और सुरक्षित जीवन चाहिए। अर्थ व्यवस्था को उनकी नीतियों के कारण जो झटका लगा है उसे दुरुस्त करना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए। अनुच्छेद 370 या 35 ए हटने से कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा बन गया या पाकिस्तान के खिलाफ सौनिक कार्रवाइयां हुईं या राम मंदिर बनने का रास्ता साफ होनेवाला है या मुसलमानों के होश ठिकाने आ रहे हैं। इन सबसे कुछ उन्मादी किस्म के लोग उत्साहित हो सकते हैं लेकिन बुनियादी सवालों से निजात नहीं पाया जा सकता। कांग्रेस की कार्यशैली से नाराज लोगों ने 2014 में भाजपा को यह सब काम करने के लिए वोट नहीं दिया था। मोदी बार-बार कहते रहे कि पांच साल बदलाव के ले कम हैं तो दूसरी पाली भी खेलने को दे दी। पहली पाली में बिना किसी तैयारी के नोटबंदी की, जीएसटी लागू किया। यह दोनों ही प्रयोग घातक सिद्ध हुए। उस समय जो भी इनके दुष्परिणाम की बात करता था से देशद्रोही घोषित कर दिया जाता था। सरकार कहती थी कि इनका परिणाम भविष्य में सुखद होगा। लेकिन यह दुःखद हुआ। अब मोदी जी नोटबंदी और जीएसटी की बात नहीं करते। लेकिन उनके मन में अभी बहुत से प्रयोग हैं जिन्हें धीरे-धीरे लागू करेंगे। उनका अगला निशाना सोने पर है। आर्थिक प्रयोग करने का इस सरकार के पास न अनुभव है न ज्ञान। फिर भी अगर अब भी देश को अर्थ व्यवस्था का प्रयोगशाला बनाने की जिद से बाज नहीं आए तो इतिहास में उन्हें मुहम्मद बिन तुग़लक की अगली कड़ी के रूप में याद किया जाएगा।

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