कोरोना कालःसामाजिक दूरी ने बढ़ा दी भावनात्मक दूरी

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-देवेंद्र गौतम

कोरोना वायरससे लड़ाई में लॉकडाउन के साथ सामाजिक दूरी का विशेष महत्व है। इसका भरसक पालन भी किया जा रहा है। लेकिन देखा यह जा रहा कि सामाजिक दूरी से कहीं अधिक भावनात्मक दूरी बढ़ती जा रही है। वाराणसी का एक युवक मुंबई के एक ढाबे में काम करता था। लॉकडाउन में ढाबा बंद हो गया। उधर शहर में कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ने लगी। ऐसे में वह अपने तीन-चार दोस्तों के साथ पैदल ही घर के लिए चल पड़ा। कभी रेल की पटरियों पर कभी सड़क के रास्ते 14 दिनों बाद घर पहुंचा। बनारस पहुंचने के बाद वह सबसे पहले अस्पताल गया। अपनी जांच कराई। जब रिपोर्ट निगेटिव आई तो अपने घर पहुंचा लेकिन लाख समझाने और रिपोर्ट दिखाने पर भी कोरोना के डर से घर वालों ने उसे अंदर नहीं आने दिया। बाद में प्रशासन ने उसे अस्पताल में क्वारंटाइन में डाल दिया।

मध्य प्रदेश का एक व्यक्ति कोरोना से संक्रमित हुआ। इलाज के बाद ठीक हो गया। लेकिन उसके मुहल्ले वालों का उसपर संदेह बना रहा। उसका पूरी तरह सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। उसके दोस्त और पड़ोसी उसे देखते ही भागने लगते। यहां वे दूध और सब्जीवालों को भी उसके घर जाने से रोकने लगे। वह परेशान हो गया। कोरोना से लड़ाई तो उसने जीत ली लेकिन सामाजिक लड़ाई में पूरी तरह पराजित हो गया। अंततः उसने घर बेचकर कहीं और चले जाने का निर्णय लिया और अपने घर पर टूलेट का बोर्ड टांग दिया।

इस तरह की कितनी ही घटनाएं मीडिया की सुर्खियां बन रही हैं। भारत एक धर्मभीरू और अंधविश्वासी देश है। यहां के लोगों के मन में जब एकबार संदेह का कीड़ा समा जाता है तो वह आसानी से नहीं निकलता। कोरोना की लड़ाई तो देर-सबेर मानव जाति जीत जाएगी। जब चिकित्सा विज्ञान बेहद पिछड़ा हुआ था तब मानव समाज ने प्लेग, हैजा, चेचक, टीबी जैसे संक्रामक रोगों पर जीत हासिल की। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का भी निदान ढूंढ ली। कोरोना उनसे ज्यादा घातक नहीं है। इसका टीका बनाने में दुनिया भर के वैज्ञानिक लगे हुए हैं। इसका तोड़ भी निकल आएगा। लेकिन मावनाओं में भय और संदेह का जो संक्रमण समा रहा है उसकी न कोई दवा बन पाएगी न कोई इलाज हो सकेगा। लोग धर्मभीरू जरूर हैं लेकिन उनकी जितनी गहरी आस्था भगवान में है उससे कहीं ज्यादा गहरी आस्था भूत, प्रेत, डायन, विसाही जैसी भ्रमजनित नकारात्मक अवधारणाओं पर है। लिहाजा कोरोना के खात्मे के बाद भी लंबे समय तक यह भावनात्मक रुग्णता बनी रहेगी। छुआछूत की जिस भावना पर लंबे संघर्ष के बाद हमने एक हद तक विजय पाई कोरोना वायरस ने उसे नए सिरे से जन्म दे दिया है। इससे छुटकारा पाने में फिर कई पीढ़ियां लग जाएंगी। जब तक लोगों के सोचने समझने का ढंग वैज्ञानिक नहीं होगा भय और संदेह का यह किटाणु मस्तिष्क को संक्रमित करता रहेगा।

1 Comment
  1. अरुण सिन्हा says

    बिल्कुल सही आकलन है।यह सच है कि, इन दिनों अगर कोई किसी के घर आता है तो उसे बैठाना नही चाहते और न ही कोई किसी के घर जाना चाहता है। यहाँ तक कि, किसी नजदीकी की परेशानियों में भी साथ देना बही चाहता कोई।

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