गृह राज्यों की सरकारें भी करें प्रवासी मजदूरों की चिंता

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

आज लॉकडाउन-1 के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश के नाम संदेश में 3 मई तक लॉकडाउन के विस्तार की घोषणा की। इसके बाद भी कई महानगरों में प्रवासी मजदूरों की भीड़ रेलवे स्टेशनों की ओर उमड़ पड़ी। रेलवे के चालू होने की कोई घोषणा नहीं हुई थी फिर भी पता नहीं किस उम्मीद में वे लॉकडाइन को तोड़कर स्टेशन की ओर चल पड़े। संभवतः चार-पांच दिन पहले रेलवे ने कुछेक शर्तों के साथ रेल सेवा चालू करने का विचार रखा था यह उसी का नतीजा था या फिर किसी अफवाह के कारण ऐसा हुआ था।

लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही प्रवासी मजदूरों की वापसी की बेचैनी अचानक क्यों बढ़ी इसे समझने और समझाने की जरूरत है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने जब जो जहां हैं वहीं रुकने का अनुरोध किया है तो उन्हें सरकार के वायदे पर क्यों भरोसा नहीं हो पा रहा है पता लगाने की जरूरत है। केंद्र व राज्य सरकारों ने जगह-जगह उनके रहने खाने की व्यवस्था की है। सामाजिक,राजनीतिक संगठनों से लेकर व्यवसायी वर्ग तक मदद के लिए आगे आया है। मजदूरों का बड़ा हिस्सा रुक भी गया है। आज मजदूरों की जो भीड़ उमड़ी है वह 20 दिनों से रुकी ही हुई थी। आखिर उसके सब्र का पैमान छलक क्यों पड़ा। यह सच है कि जब इनसान परेशान होता है तो उसे घर की याद आती है। घर पहुंचने की यह बेचैनी और उनकी मनःस्थिति को कोई समझ नहीं पाया।

लॉकडाउन की घोषणा के पहले अगर प्रवासी मजदूरों की समस्या पर गौर किया गया होता तो जिस तरह विदेशों में फंसे भारतीयों को एयर लिफ्ट कराकर स्वदेश लाया गया उसी तरह विमान से न सही कम से कम रेल के जरिए प्रवासी मजदूरों को उनके घर भिजवाने की व्यवस्था की जा सकती थी। केंद्र सरकार यदि इस समस्या को समझने में चूक भी गई तो कम से कम बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे प्रवासी मजदूरों के गृह प्रदेशों की सरकारों को उनकी चिंता करनी चाहिए थी और केंद्र सरकार से बातचीत करके उनकी वापसी की व्यवस्था करनी चाहिए थी। आखिर वे उनके प्रदेश के वे लोग थे जिन्हें गृह राज्यों में आजीविका के साधन नहीं उपलब्ध कराए जा सके हैं। उन्हें ट्रेन से घर पहुंचाने का काम ज्यादा से ज्यादा दो-तीन दिन में संपन्न हो जाता और लॉकडाउन पूरी तरह सफल रहता। फिर ल़ॉकडाउन की अवधि में दो सप्ताह तक राष्ट्रीय उच्च मार्गों पर पदयात्रियों का रेला नहीं लगा रहता। विदेशों में फंसे अपने भारतीयों को वापस लाने की चिंता आखिर भारत ने ही तो की थी। फिर राज्य सरकारें अपने राज्यो के नागरिकों के फंसे होने की जानकारी मिलने के बाद हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी रहीं…इसलिए कि वे गरीब मजदूर थे। अपने ही नागरिकों के प्रति यह भेदभाव सत्तापक्ष की चूक नहीं तो क्या है..लॉकडाउन-2 की घोषणा के बाद स्टेशनों की ओर उमड़ती भीड़ के लिए सरकार प्रवासी मजदूरों को ही दोषी ठहरा रही है। उनकी विवशता और अपनी बदइंतजामी पर गौर करने का प्रयास नहीं कर रही है। निश्चित रूप से कोरोना के खिलाफ लड़ाई एक कठिन लड़ाई है। यह अचानक हमारे गले आ पड़ी है। हमारी प्राथमिकताएं कुछ और थीं। हम इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। लेकिन अब जब यह गले आ ही पड़ी है हमें हर मोर्चे पर चौकसी बरतनी होगी। हमारे लिए सड़क पर पैदल चलता हुआ मजदूर भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना लक्जरी बंगलों में बैठकर महाभारत और रामायण देखते लोग। प्रवासी मजदूरों को समझने और उन्हें समझाने की जरूरत है। वे समझ नहीं पा रहे कि उनके गावों के लोग इतने डरे हुए हैं कि उनका स्वागत नहीं करेंगे। घर तो दूर उन्हें गांव के अंदर भी अभी के माहौल में प्रवेश की इजाजत नहीं मिलेगी। उन्हें इस आपदा के गुजर जाने तक इंतजार करना चाहिए। कोई माने न माने मजदूर वर्ग और सरकार के बीच परस्पर विश्वास और भरोसे का रिश्ता कायम करने का यही बेहतरीन मौका है। स्थितियों पर गंभीरता से विचार कर धैर्य को बनाए रखने का प्रयास किया जाना चाहिए। यह कठिन परीक्षा का समय है और हमें इसमें सफल होना है। यह जज़्बा मन में पैदा करना चाहिए।

 

 

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