झारखंडः हिंदुत्व की नहीं अहंकार की हार

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

झारखंड में भाजपा की चुनावी हार मोदी-शाह की जोड़ी के लिए बहुत बड़ा झटका है। इस खनिज बहुल राज्य में मोदी जी के कार्पोरेट मित्रों को देने के लिए उपहार भरे हुए थे। इसीलिए अन्य किसी भी राज्य की तुलना में उन्हें झारखंड प्रिय था। थोड़े-थोड़े अंचराल पर उनका आवागमन होता था। अपनी कई महत्वकांक्षी योजनाओं की उन्होंने इसी धरती से लॉंचिग की थी। चुनाव के समय प्रधानमंत्री होते हुए भी उन्होंने पांच रैलियां और कई जनसभाएं कीं। अपने तमाम स्टार प्रचारकों को लगा दिया। अमित शाह के हिंदुत्व के एजेंडे के लिए भी झारखंड एक आदर्श राज्य था। मॉब लिंचिंग की घटनाओं के मामले में इसने राष्ट्रीय रिकार्ड कायम किया था। ऐसे हिंदुत्ववादी राज्य में इतनी शर्मनाक पराजय की भाजपा ने कत्तई कल्पना नहीं की थी। अब वे पराजय के कारणों की तलाश करेंगे। हालांकि अपनी गल्ती स्वीकार करना उनकी फितरत में नहीं है। अब झारखंड की सत्ता हाथ से निकलने के बाद भाजपा के लोग इसे हिंदुत्व की हार बता रहे हैं। सवाल है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे सत्तावादी लोग हिंदुत्व के स्वघोषित ठेकेदार कैसे बन गए। किसने बना दिया। नफरत की पाठशाला से निकला हुआ हिंदूत्व एक कभी हिंदुत्व नहीं हो सकता। हिदू शब्द ही फारसी का है। हिन्दुत्व के आदर्श स्वामी विवेकानंद हो सकते हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती हो सकते हैं, मोदी और शाह जैसे लोग नहीं हो सकते। क्या हेमंत सोरेन, लालू प्रसाद, सरयू राय हिंदू नहीं है। जो शाह का समर्थक वही हिंदू, बाकी मुसलमान। आपको देश चलाने की जिम्मेदारी मिली है मठ चलाने की नहीं। देश चला सकते हैं तो चलाइए। वर्ना अपना बोरिया बिस्तर समेटिए।

सच्चाई यह है कि न भाजपा ने इतनी शर्मनाक हार की कल्पना की थी न महागठबंधन के लोगोंने इतनी बड़ी जीत की उम्मीद की थी। विपक्ष को जरा भी यकींन नहीं था कि उनका गठबंधन बहुमत का आंकड़ा पार कर 52 सीटों तक पहुंच जाएगा और सत्ताधारी भाजपा मात्र 25 सीटों पर सिमट जाएगी। सबसे बड़ी बात कि मुख्यमंत्री स्वयं चुनाव हार जाएंगे। असल में सत्ता के अहंकार में डूबे होने के कारण रघुवर दास अपने मंत्री सरयू राय की छवि और लोकप्रियता को भांप नहीं पाए और उनका टिकट कटवा दिया। यह उनकी सरकार के लिए आत्मघाती कदम साबित हुआ। महागठबंधन को अपनी सीटों में बढ़ोत्तरी का आभास जरूर था लेकिन ज्यादा से ज्यादा त्रिशंकु विधानसभा तक की स्थिति की कल्पना कर रहे थे। इसीलिए महागठबंधन के स्टार प्रचारक भी झारखंड आने से हिचक रहे थे। महागठबंधन के नेता हेमंत सोरेन कांग्रेस और राजद के स्थानीय नेताओं को साथ लेकर मोर्चा संभाले हुए थे जबकि भाजपा की ओर से दिग्गज नेताओं का जमावड़ा था। हेमंत सोरेन ने अपने अच्छे संस्कार का परिचय देते हुए राजद के संस्थापक लालू प्रसाद से रिम्स में जाकर मिले। उनका आशीर्वाद लिया और उन्हें महागठबंधन की चुनावी रणनीति तय करने का अनुरोध किया। रणनीति सफल रही और भाजपा को सत्ता के बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब इतना तय है कि अब हिंदुत्व की आड़ में झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों की लूट की साजिश सफल नहीं हो सकेगी। आदिवासियों को उनका हक मिलेगा। हेमंत सोरेन सभी सामाजिक तबकों को साथ लेकर चलेंगे और भय का माहौल खत्म होगा।

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