…तो क्या तालिबानी रास्ते पर चल पड़े निहंग!

0 134

-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

सिंघु बार्डर पर लखबीर सिंह की हत्या के बाद संयुक्त किसान मोर्चा और निहंगों के बीच दरार पड़ गई है। किसान जहां तीन कृषि कानूनों के विरोध के आंदोलन को शांतिपूर्ण और अहिंसक बनाए रखने पर जोर दे रहे हैं वहीं निहंगों ने हिंसा और आक्रामकता का रास्ता अपना लिया है। किसान लखबीर सिंह की हत्या का किसान आंदोलन से की संबंध नहीं होने का दावा कर रहे हैं वहीं निहंग इस कार्रवाई को सही ठहरा रहे हैं। उन्होंने कानून व्यवस्था को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि वे चार निहंगों का आत्मसमर्पण करा चुके हैं। यदि पुलिस और गिरफ्तारी करेगी तो उन चारों को भी छुड़ा ले जाएंगे। अर्थात वे कानून व्यवस्था का सम्मान अवश्य करते हैं लेकिन उसकी परवाह नहीं करते। वे पुलिस हिरासत से अथवा जेल से अपने लोगों को जबरन निकाल ले जाने की ताकत रखते हैं। पुलिस प्रशासन और सरकारी तंत्र उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

यह संयुक्त किसान समिति के नेता राकेश टिकैत से अलग भाषा का संवाद है। टिकैत निहंगों को आंदोलन में शामिल करना नीतिगत भूल मानते हैं। वे कानून को अपना काम करने देने की बात करते हैं। उनका कहना है कि यह हत्याकांड सरकार की साज़िश का नतीजा है। सवाल है कि किसान आंदोलन में मुख्य भूमिका पंजाब के सिखों की है। उनकी मुख्य शक्ति निहंग हैं। तो क्या सरकार निहंगों के साथ मिलकर किसान आंदोलन के खिलाफ साज़िश रच सकती है? यदि हां, तो अबतक वह चुप क्यों बैठी रही? निहंगों के हटने के बाद उसके लिए दमनचक्र चलाना और आसान हो जाता। जो भी हो, लखबीर सिंह की  नृशंस हत्या के मामले से टिकैत साहब किनारा कर चुके हैं। उनके अनुसार किसान आंदोलन से इस घटना का कुछ लेना-देना नहीं है। वे कहीं न कहीं निहंगों के प्रति नाराजगी का प्रदर्शन भी कर रहे हैं। जबकि निहंग इस कार्रवाई को गलत नहीं मानते। वे कानून को उसकी सीमाओं में रहकर काम करने की सलाह दे रहे हैं। अब निहंगों ने सिखों की महापंचायत बुलाई है। उसमें फैसला होगा कि सिख समाज निहंगों के रास्ते चलेगा या किसानों के रास्ते।

किसान नेता इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि यदि उनके आंदोलन की रक्षा में निहंग शुरू से खड़े नहीं रहते तो उनके साथ धरनास्थल पर बल प्रयोग हो सकता था। निहंगों से भिड़ने का मतलब पूरे सिख समुदाय को नाराज करना होता और कोई भी सरकार यह खतरा नहीं मोल ले सकती। केंद्र सरकार, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश की सरकारों की कार्यशैली जगजाहिर है। हरियाणा सरकार ने किसानों को शुरू में ही दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए जो इंतजाम किए थे, वह सर्वविदित हैं। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी समय-समय पर दमनकारी नीति का प्रदर्शन किया है। केंद्र सरकार तीन कृषि कानूनों को वापस लेने को एकदम राजी नहीं है। संशोधन के लिए अवश्य तैयार है।

जहां तक निहंगों का सवाल है वे धर्म की रक्षा के लिए किसी हद तक जा सकते हैं। वे कट्टरपंथी हैं। उनके हाथों मारा गया लखबीर एक साधारण मजदूर था। उसने गुरुग्रंथ साहब की क्या बेअदबी की कि उसे मौत की सज़ा भुगतनी पड़ी, पता नहीं है। भारतीय संविधान में कट्टरपंथ के प्रश्रय का कोई प्रावधान नहीं है। कोई सरकार यदि इस तरह के तत्वों को प्रश्रय देती हैं तो संविधान को ताक पर रखकर ऐसा करती है। कट्टरपंथ की लहर जब उठती है तो एक धर्म या एक पंथ तक सीमित नहीं रहती। पिछले छह-सात वर्षों के अंदर धर्म के नाम पर हिंसा की घटनाएं लगातार होती रही हैं। हालांकि इनका मकसद सिर्फ वोट बैंक को मजबूत करना रहा है। लेकिन धर्म के आधार पर मत विभाजन की राजनीति अगर चलती रही तो लखवीर सिंह जैसे लोगों की हत्याएं होती ही रहेंगी। कभी मुस्लिम समुदाय की कट्टरता का उभार होगा कभी हिंदू कट्टरता का। सिख कट्टरता के उभार का संकेत सामने आ ही चुका है। धीरे-धीरे सभी समुदाय कट्टरता की ओर बढ़ने लगेंगे तो भारतीय संस्कृति कौन सा स्वरूप धारण करेगी यह राजनीतिक दलों के लिए तो नहीं लेकिन आम लोगों के लिए अवश्य चिंता का विषय होना चाहिए।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

%d bloggers like this: