डालनी होगी पढ़ने की आदत, जोड़ना होगा किताबों से रिश्ता

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देवेंद्र गौतम

इंटरनेट की उपलब्धता बढ़ने के बाद युवा वर्ग का पुस्तकों से नाता टूटता जा रहा है। पठन-पाठन की संस्कृति खत्म होती जा रही है। यह हमारे युग की बड़ी विडंबना है। इसका घातक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ रहा है। एक मनोवैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक दो दिनों तक पढ़ने पर मनुष्य के याददाश्त में डेढ़ गुना बढ़ोत्तरी होती है और दो दिन पढ़ना छोड़ देने पर इसमें उसी अनुपात में ह्रास होता जाता है। अक्सर देख गया है कि नियमित पढ़ने वाले छात्रों के मस्तिष्क पर परीक्षा के समय ज्यादा दबाव नहीं पड़ता जबकि कम और अनियमित पढ़ने वाले छात्र बेहद तनाव में आ जाते हैं। स्वामी विवेकानंद ने नियमित पढ़ने की आदत के जरिए अपनी स्मृति क्षमता को इतना बढ़ा लिया था कि किसी पुस्तक को एक बार उलट-पुलट लेने पर उसके हर पृष्ठ को याद कर लेते थे। विदेशों में बड़े-बड़े विद्वान उनकी इस क्षमता से चकित रह जाते थे। वे स्कूली शिक्षा के दौरान औसत छात्र थे। पठन-पाठन के प्रति उनकी रुचि अध्यात्म की दुनिया की गहराइयों में उतरने के बाद जागृत हुई थी। उनकी क्षमताएं विलक्षण थीं। लेकिन इसे उन्होंने स्वयं विकसित किया था।

आज के समय में अधिकांश युवक इंटरनेट की दुनिया में व्यस्त रहते हैं। कोर्स की किताबें सरसर तौर पर पढ़ने भर ही उनका पुस्तकों से वास्ता रहता है। वह भी विषय की जानकारी रखने के लिए नहीं बल्कि परीक्षा पास करने के उद्देश्य से। गेसपेपर या संभावित प्रश्नों के आकलन के भरोसे। इंटरनेट पर ई-पुस्तकें भी मौजूद हैं लेकिन उनकी तरफ ध्यान नहीं जाता। पूरा ध्यान दूसरे विषयों में लगा रहता है। इंटरनेट वरदान भी है और अभिशाप भी। आप क्या ग्रहण करते हैं, आपपर निर्भर करता है। यह तो महासागर है जहां ज्ञानवर्धक जानकारियां भी हैं और दिल बहलाने के लिए तरह-तरह की सामग्री भी। ज्यादातर लोग सोशल मीडिया पर छोटे-छोटे चुटीले पोस्ट पढ़ते हैं। एक दूसरे को ट्रोल कर आनंदित होते हैं। इस चक्कर में किसी विषय की गहराई में उतरने के लिए जिस एकाग्रता की आवश्यक होती है वह विकसित ही नहीं हो पाती। ज्यादातर लोगों का मन चंचल रहता है और चित्त अशांत।  आमतौर पर विकृति संस्कृति से ज्यादा लुभावनी होती है। नकारात्मक प्रवृत्तियों के विकास का खतरा भी इंटरनेट की दुनिया में है। जबसे यह स्मार्ट फोन पर उपलब्ध हुआ है अकेले में उंगलियां किस-किस तरह की आइटों की तलाश में व्यस्त रहती हैं किसी को पता नहीं चलता। सपर नज़र रखना कठिन है।

समय ऐसा  चुका है कि पठन-पाठन में अरुचि को आधुनिकता का पर्याय माना जाने लगा है। आम तौर पर युवक बड़े गर्व से कहते हैं कि अब किताबें कौन पढ़ता है। पुस्तकालय की संस्कृति पहले ही नष्ट हो चुकी है। उनका संसार शैक्षणिक संस्थानों तक सिमट चुका है। आम जनता के लिए जो बचे खुचे सरकारी-गैरसरकारी पुस्तकालय हैं भी उनमें नई किताबों की खरीद के लिए कोष की कमी है। सरकारी पुस्तकालयों में नई पुस्तकों की खरीदारी के लिए कोष का आवंटन भी बंद कर दिया गया है। वहां पुस्तकों के रखरखाव पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। किताबों की दुनिया से दूरी बढ़ने का सीधा असर लोगों की मानसिक क्षमता पर पड़ रहा है। लिखने और बोलने की भाषा पर पड़ रहा है। किसी भी भाषा में आज शुद्ध लिखने या बोलने वालों की बेहद कमी होती जा रही है।

हर नई तकनीक का ईजाद व्यक्तित्व विकास की गति तेज़ करने और जीवन को बेहतर बनाने के लिए के लिए होता है। लेकिन मौजूदा समय में इंटरनेट की तकनीक का समाज को जो लाभ मिलना चाहिए था, नहीं मिल रहा है। यह नई पीढ़ी को दिशाहीनता की ओर ले जाने का माध्यम बनता जा रहा है। किसी तरह पैसे कमा लेना, व्यापार खड़ा कर लेना, अच्छी सी नौकरी हासिल कर लेना ही जीवन का उद्देश्य बनता जा रहा है। लेकिन सिर्फ जीवन यापन करने या बेशुमार पैसे कमाने की योग्यता किसी स्वस्थ और आदर्श समाज के निर्माण का माध्यम नहीं बन सकती। ज्ञान-विज्ञान से लैस व्यक्तियों का समूह ही आदर्श समाज का आधार हो सकता है। यह पुस्तकों की दुनिया में वापस लौटने के जरिए ही संभव है। चाहे वह ई-बुक हो अथवा प्रिंटेड पुस्तक। यदि हमें विश्वगुरु बनना है। विश्व के सभी देशो का सरताज बनना है तो पठन-पाठन की आदत डालनी ही होगी।

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