कानून से और असुरक्षित हो गईं महिलाएं

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

दिल्ली के निर्भया कांड को लेकर कड़े कानून तो बने लेकिन उनका क्रियान्वयन कड़ाई से नहीं किया गया। इसके कारण महिलाएं पहले से कहीं ज्यादा असुरक्षित हो गईं। बलात्कारियों के अंदर कानून का भय व्याप्त नहीं हो पाया। निर्भया कांड के मुजरिम कई वर्षों तक लंबी अदालती कार्यवाही के कारण जीवित बचे रहे। फांसी की सज़ा होने के बाद भी उनके गले में फंदा पड़ने का समय कार्यपालिका की कच्छप चाल के कारण टलता ही जा रहा है। कड़ा कानून बनने से पूर्व बलात्कार के बाद अधिकांश पीड़िताओं को कम से कम जीवित छोड़ दिया जाता था। अब साक्ष्य मिटाने के लिए उन्हे जिंदा जलाया जाने लगा है। हैदराबाद की पीड़िता को दुष्कर्मियों ने जलाकर मार डाला। उन्नाव की पीड़िता 90 फीसद जल चुकी है। उसे एयर लिफ्ट के जरिए दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में ले जाया गया है। वह बच भी गई तो उसका जीवन बोझ बनकर रह जाएगा। आखिर इसके लिए कौन दोषी है।

अब बलात्कार की मानसिकता के कारणों की इंटरनेट में तलाश की जा रही है। पोर्न साइटों की भरमार। टीवी सिरियल, एडल्ट फिल्मों आदि को मानसिक विकृति का कारण बताया जा रहा है। लेकिन सच पूछ जाए तो सबसे बड़ा कारण समाज का बिखराव, लोकलाज की समाप्ति, जनजीवन में राजनीति व अपराधकर्म का बढ़ता दखल और न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता है। इसी जटिलता के कारण ही नक्सलियों की जन अदालतों को लोकप्रियता मिली थी। उनकी अदालतों में क्रूर और अमानवीय सज़ाएं दी जाती थीं लेकिन पीड़ित को त्वरित न्याय जरूर मिल जाता था। अपराधियों के मन में भी भय व्याप्त हो गया था। आज देश की आबादी 130 करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है और पूरा सामाजिक ताना-बाना वोटों की राजनीति की भेंट चढ़ चुका है। लोगों को धर्म, जाति और क्षेत्र के नाम पर बांट दिया गया है। ऐसे में विकृत और हिंसक मानसिकता के लोगों को नियंत्रित करने के लिए कार्यपालिका और न्यायपालिका की कार्यसंस्कृति में बदलाव लाना होगा। सरकारी संस्थाओं को चुस्त-दुरुस्त बनाना होगा। सिर्फ कानून बना देने से चीजें नियंत्रित नहीं होतीं। अदालतों पर मुकदमों का बोझ कम करने के लिए अदालतों और न्यायधीशों की संख्या में बढ़ोत्तरी करनी होगी। सत्ता में बैठे लोग सिर्फ सरकार बनाने और गिराने में अपनी ऊर्जा लगाए रहते हैं। लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को अनुकूलित करने में व्यस्त रहते हैं। उसमें सुधार लाने की जरूरत नहीं महसूस करते। राजनीतिक दलों की सत्ता लोलुपता के कारण राष्ट्रीय जीवन असुरक्षित होता चला जा रहा है।

अगर कानून के प्रभावी ढंग से लागू करने पर ध्यान नहीं दिया दया तो स्थिति और बदतर होती चली जाएगी। सत्ता के पीछे भागने वाले राजनेता अपने वोटबैंक के चक्कर में समाज को तोड़ने से बाज आएं तो भी समाज अपने तरीके से चीजों को नियंत्रित कर लेगा। लेकिन यह वोटों की राजनीति अगर इसी तरह चलती रही तो यह देश कभी संभल नहीं पाएगा। महिलाएं इसी तरह जिंदा जलाई जाती रहेंगी। सत्ताधारी नेता तमाशबीन बने रहेंगे।

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