अंतरिक्ष में नहीं, हमारी धरती पर हैं एलियन!

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

एलियन हमेशा हमारी जिज्ञाशा के केंद्र में रहे हैं। हमारे खगोलशास्त्री वर्षों से अंतरिक्ष में उनकी तलाश कर रहे हैं। लेकिन कभी धरती पर उनकी तलाश का कोई अभियान नहीं चलाया गया। संभव है वे आकाशगंगा के किसी तारे पर नहोकर हमारे ग्रह पर ही मौजूद हों।

रॉयटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में रेडियो टेलिस्कोप के जरिए वैज्ञानिक एलियन की खोज के लिए अंतरिक्ष की खाक छानते रहे। एक करोड़ तारों की निगहबानी की गई लेकिन कहीं जीवन का कोई लक्षण नहीं मिला। हमारे सौरमंडल के बाहर भी जीवन के चिन्ह खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने आधुनिक तकनीक का सहारा लिया। किसी तेज दिमाग वाले विकसित एलियन के आधुनिक संचार के संकेतों को भी ढूंढने की बड़ी कोशिश की गई लेकिन कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के मर्चिसन वाइडफील्ड आरे यानी एमडब्ल्यूए टटेलिस्कोप का इस्तेमाल कर रिसर्चरों ने वेला तारमंडल के तारों से निकलने वाली कम फ्रीक्वेंसी वाले रेडियो उत्सर्जन को खंगाल कर रख दिया। उनकी खोज के बारे में रिसर्च रिपोर्ट एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी ऑफ ऑस्ट्रेलिया ने छापी है।

खगोल भौतिकविज्ञानी चेनोआ ट्रेंबले का कहना है कि यह हैरानी की बात नहीं है कि हमें कुछ नहीं मिला, अभी भी बहुत सी चीजें अज्ञात हैं जो लगातार बदल रही हैं। ट्रेंबले ऑस्ट्रेलिया की नेशनल साइंस एजेंसी के एस्ट्रोनॉमी एंड स्पेस साइंस विभाग से जुड़ी हैं साथ ही कॉमनवेल्थ साइंटिफिक इंडस्ट्रील रिसर्च ऑर्गनाइजेशन से भी। ट्रेंबले ने बताया, “हमारे सौरमंडल के बाहर जीवन की तलाश एक बड़ी चुनौती है। हम नहीं जानते कि कब, कैसे, कहां और किस तरह के संकेत हमें मिल सकते हैं जिससे हमें पता चलेगा कि गैलेक्सी में हम अकेले नहीं हैं।”

खगोल भौतिकविज्ञानी स्टीवन टिंगे ऑस्ट्रेलिया की कर्टिन यूनिवर्सिटी और इंटरनेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोनॉमी रिसर्च से जुड़े हैं। उनका कहना है कि पूर्व की तुलना में इस बार की खोज 100 गुना ज्यादा गहरी और विस्तृत थी। हालांकि ब्रह्मांड के लिहाज से देखें तो रिसर्च में बहुत कम ही तारों को शामिल किया गया। टिंगे ने कहा, “एक करोड़ तारे बड़ी संख्या मालूम होते हैं लेकिन हमारा आकलन है कि आकाशगंगा में करीब 100 अरब तारे हैं। हमने अपनी आकाशगंगा के केवल 0.001 प्रतिशत तारों को ही देखा है।”

डब्ल्यूए स्क्वेयर किलोमीटर आरे का पूर्ववर्ती है। भविष्य की खोज स्क्वेयर किलोमीटर आरे की मदद से होगी जो और ज्यादा उन्नत है। टिंगे का कहना है, “सबसे जरूरी है कि तकनीकों को बेहतर करना साथ ही हर बार और ज्यादा गहराई और विस्तार में जाना। हमेशा इस बात के मौके होंगे कि अगली रिसर्च कुछ ऐसा सामने ले कर आएगी। तब भी जब आप इसकी बिल्कुल भी उम्मीद नहीं कर रहे हों।”

एलियन या परग्रही जीवों के अस्तित्व की बात हमेशा से होती रही है लेकिन अब तक ऐसा कोई पक्का प्रमाण नहीं मिला है जिसके आधार पर इसे सच माना जा सके। ये और बात है कि इंसान का दिमाग इसकी खोज के लिए लगातार प्रयास करता रहा है।

हमारे खगोलशास्त्री आकाशगंगा में एलियन तलाश रहे हैं। जबकि धरती पर ही कई ऐसी रहस्यमय जगहें हैं जिनके बारे में हमारी जानकारी सीमित है। समुद्र में बरमुडा ट्रैंगल है। वहां आकाश में उड़ते विमान और समुद्र में चलते जलपोत अचानक गायब हो जाते हैं। उनका कुछ भी पता नहीं चलता। हिमालय पर संगरीला घाटी है जो अदृश्य है। ज्ञानगंज हैं जहां हमारी पहुंच नहीं है लेकिन कहते हैं कि योग और अध्यात्म की गहराइयों में उतरे हुए साधक वहां रहते हैं। वे जब चाहते हैं हमारे बीच आकर लौट जाते हैं। कंचनजंगा चोटी के पास एक अत्यंत उन्नत और रहस्यमय संस्कृति के संदर्भ में रूसी यात्रियों के यात्रा वृतांत में उल्लेख मिलता है। कहीं उड़न तस्तरी और एलियन का संबंध इन रहस्यमय स्थलों से तो नहीं। इस संबंध में शोध किया जाना चाहिए। इस बात को वैज्ञानिक भी मानते हैं कि एक समय धरती आग के गोले के समान थी और एक समय पूरी तरह जलमग्न थी। दोनों ध्रुवों के ग्लेशियर पिघल जाएं तो आज भी धरती जलमग्न हो जाएगी। यह भी पता चलता है कि धरती पर कई बार जल प्रलय आ चुका है और जब दोनों ध्रुवों के ग्लेशियर पिघल जाते हैं तो सबकुछ डूब जाता है लेकिन हिमालय और आल्प्स का कुछ हिस्सा नहीं डूबता। खासतौर पर एवरेस्ट और कंचनजंघा चोटी। इस बात का कोई प्रमाण नहीं लेकिन धर्मशास्त्रों में ऐसा उल्लेख है कि पिछले जल प्रलय के समय कुछ लोग नाव में सवार होकर जीवित बच गए थे। जाहिर है कि उनके पास एक विकसित सभ्यता का ज्ञान-विज्ञान मौदूद था। उन्होंने जहां भी शरण लिया वहां उनका ज्ञान विज्ञान विकास के उस बिंदु से आगे बढ़ा जहां तक अभी हमारी सभ्यता पहुंची नहीं है। रूसी पर्यटकों ने कंचनजंघा के पास जिस भूमिगत सभ्यता के बारे में लिखा था उसमें बताया था कि उनका विज्ञान हमारे विज्ञान से हजारों गुना आगे है। वे किसी मौसम में कुछ भी उगा सकते हैं। उनके पास गुफाओं और कंदराओं में तेजी से चलने वाले वाहन हैं। वे हमारी दुनिया से संपर्क नहीं रखना चाहते। सवाल है कि कहीं कंचनजंघा, ज्ञानगंज, संगरीला घाटी या बरमुडा ट्रैंगल में तो वे नहीं रहते जिन्हें हम एलियन का नाम देते हैं। आकाशगंगा के साथ इन स्थलों में भी एलियन की तलाश करनी चाहिए। संभव है प्रकृति के रहस्य की कुछ और परतें खुल जाएं।

 

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