माफिया गिरोहों के चक्रव्यूह में फंसा लोकतंत्र

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

आर्यन खान सहित क्रूज ड्रग्स मामले के लगभग सभी आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। मामला महज़ 6 ग्राम ड्ग की बरामदगी का था जो पार्टी में मौजूद सैकड़ों लोगों में से एक के जूते में छुपाकर रखा हुआ था। यह मामला मीडिया में तीन सप्ताह तक सुर्खियों में बना रहा। चूंकि मामला बालीवुड के मशहूर अभिनेता शाहरुख खान के बेटे का था। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अडाणी के कुद्रा बंदरगाह से पार हो चुके 25 हजार किलोग्राम हेरोइन और बरामद किए गए तीन हजार किलोग्राम हेरोइन को मीडियो में तवज्जोह क्यों नहीं मिली। क्या एनसीबी छोटी मछलियों का शिकार करने में दिलचस्पी लेता है और मगरमच्छों को खुला छोड़ देना पसंद करता है? कहने का अर्थ यह नहीं कि कुद्रा बंदरगाह मामले में एनसीबी ने कोई कार्रवाई नहीं की होगी। अवश्य की होगी। लेकिन उसे देशवासियों को बताया नहीं गया। मीडिया को वह कोई बड़ा मामला नहीं लगा। कुछ ही माह पहले जब मुकेश अंबानी के बंगले के पास विस्फोटकों से भरी गाड़ी बरामद हुई थी तो देश में हंगामा मच गया था। बाद में यह बात सामने आई कि मुंबई पुलिस के एक अधिकारी को 100 करोड़ प्रतिमाह वसूली का टारगेट दिया गया था और यह भयादोहन की पृष्ठभूमि बनाने का हिस्सा था।

कुछ दशक पहले धनवानों से वसूली का काम अंडरवर्ल्ड के गिरोह किया करते थे। अब उन गिरोहों के सरगना इंटेलिजेंस ऐजेंसियों का हिस्सा बन चुके हैं। अब वसूली का काम पुलिस और जांच एजेंसियों के चुनींदा अधिकारी कर रहे हैं। छह ग्राम ड्रग इसलिए तीन हजार और पच्चीस हजार किलोग्राम हेरोइन पर भारी पड़ा कि छह ग्राम वाले मामले में शाहरूख खान के बेटे आर्यन को घसीटना संभव था और उनके पिता से वसूली की गुंजाइश थी। अब जांच अधिकारी समीर वानखेड़े अपने बिछे जाल में खुद फंस गए हैं। उनके पास इस बात का की जवाब नहीं है कि आर्यन ने ड्रग का सेवन किया था तो उसकी मेडिकल जांच क्यों नहीं कराई? वे रिश्वतखोरी के आरोपों के घेरे में हैं। उनपर लगे आरोपों की विभागीय जांच शुरू हो चुकी है लेकिन वे पद पर बने रहेंगे और क्रूज ड्रग मामले के जांच अधिकारी भी बने रहेंगे। उनके बचाव में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है। कारण क्या है पता नहीं। सरकार भी मेहरबान है। अब उनकी गिरफ्तारी तो होगी लेकिन इसके तीन दिन पहले नोटिस दिया जाएगा। इधर मुंबई पुलिस ने भी वानखेड़े मामले की जांच शुरू कर दी है। सवाल है कि क्या यह दो सत्ताधारी दलों या गठबंधनों के बीच कानून के दायरे के बाहर की जंग का हिस्सा है या दो माफिया गिरोहों के बीच का गैंगवार।

सवाल लोकतंत्र की व्यवस्था का है। वर्ष 2022 के 15 अगस्त को आजादी की 75 वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी। इसके लिए अमृत महोत्सव की बड़े पैमाने पर तैयारी चल रही है। 26 जनवरी 2022 हमारा लोकतंत्र भी 72 वें वर्ष में प्रवेश कर जाएगा। आजाद भारत की इतनी लंबी यात्रा के क्रम में एक दौर राजनीति के अपराधीकरण का आया, फिर अपराध के राजनीतिकरण का और अब राजनीति के माफियाकरण का दौर दस्तक दे रहा है। अब चुनाव भी सत्ता पर कब्जे की होड़ में तब्दील हो चले हैं जिसमें प्रेम और युद्ध में सबकुछ जायज है की तर्ज पर वैध-अवैध सभी साधनों का इस्तेमाल किया जाता है।

पिछले दिनों जब भारत के जाने-माने उद्योगपति मुकेश अंबानी के बंगले के पास लावारिश स्कार्पियो में बरामद जिलेटिन की छड़ों ने बगैर डेटोनेटर इतना बड़ा विस्फोट कर दिया था कि इसकी आंच महाआघाड़ी सरकार तक पहुंच गई थी। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमवीर सिंह, पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख से होती हुई इसकी लपटें राकापां प्रमुख शरद पवार तक पहुंच चुकी थी। वानखेड़े मामले में भी दो खेमे साफ दिखाई दे रहे हैं। तो यह मान लेना चाहिए कि अब सत्ता की राजनीति काले धन का खेल बन चुकी है और लोकतंत्र का माफियातंत्र में रूपांतरण हो चुका है। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि सत्ता की आड़ में खूंखार माफिया गैंग काम कर रहे हैं। यह गैंग अंडरवर्ल्ड के गिरोहों की तर्ज पर कार्पोरेट घरानों से भारी भरकम वसूली की जाल बिछा रहे हैं। धीरे-धीरे इस बात का खुलासा होगा कि इसमें प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कौन-कौन से सफेदपोश नेता और नौकरशाह शामिल हैं। इन गैंगों के मुख्य किरदार पर्दे के पीछे हैं। पर्दे पर कुछ विभाग और उनके चंद अधिकारी हैं। वही बलि का बकरा बनेंगे। इन अधिकारियों का जीवन शाही अंदाज़ से कट रहा है।

मायानगरी मुंबई में धन उगाही कोई नी बात नहीं है। क्यासवाल है कि क्या यह आम देशवासियों के लिए चिंता का विषय नहीं होना चाहिए? औपनिवेशिक सत्ता से आजादी के लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने क्या इसीलिए संघर्ष किया। कुर्बानियां दीं। वे जिस तरह का भारत निर्मित करना चाहते थे वह यह तो नहीं है। निश्चित रूप से किसी नई व्यवस्था को स्थापित होने में समय लगता है। फ्रांस की क्रांति 1779 में हुई थी। इसका लक्ष्य लोकतंत्र की स्थापना था। लेकिन इस क्रांति ने नेपोलियन बोनापार्ट को पैदा किया जिन्होंने सत्ता हाथ में आने के बाद स्वयं को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया और राजशाही की वापसी हो गई। फिर राजा बदलता रहा। राजशाही चलती रही। लोकतंत्र की पुनर्स्थापना 1848 के बाद ही हो सकी। यानी 69 साल बाद। भारतीय लोकतंत्र भी अभी संक्रमण काल से ही गुजर रहा है। लोकतंत्र की आड़ में परिवारवाद, व्यक्तिवाद का दौर चलता रहा। अब माफियावाद का दौर दस्तक दे रहा है। जब तक आम जनता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक नागरिक गुणों से लैस नहीं होगी इस तरह की विकृतियां जारी रहेंगी।

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