एग्जिट पोल का गड़बड़झाला

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-देवेंद्र गौतम

मीडिया संस्थान और सर्वे एजेंसियां चुनाव के दौरान इंतजार करती रहती हैं कि चुनाव खत्म हो और वह एक्जिट पोल का पिटारा खोलें। एक समय जब यह एक्जिट पोल चुनाव के दौरान ही शुरू हो जाते थे और मतदान को प्रभावित करने का हथियार बन जाते थे। बाद में शिकायतें मिलने के बाद चुनाव योग ने चुनाव संपन्न होने तक इसपर रोक लगा दी। इसके बाद उन्हें बस चुनाव खत्म होने का इंतजार रहता है। अब वे वोटरों को प्रभावित नहीं कर पाते लेकिन मतगणना में शामिल नौकरशाहों को अवश्य संदेश दे देते हैं कि सत्ता के अनुकूल आचरण पेश करें। आमतौर पर यह एग्जिट पोल सत्ताधारी दल को जीतता हुआ दिखाते हैं। चाहे सत्ता कांग्रेस के हाथ में हो या विपक्ष के हाथ में। यह एक खास एजेंडे के तहत प्रायोजित कार्यक्रम होता है इसीलिए अक्सर गलत साबित होता है। अनुमान के आंकड़े कभी वास्तविक नतीजों से मेल नहीं खाते।

इसबार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर पूरे देश और दुनिया की नज़र थी। हो सकता है सातवें चरण के बाद त्तर प्रदेश के एक्जिट पोल के अनुमान विरोधाभाषी हों, अविश्वसनीय हों, गलत साबित हो जाएं लेकिन मतगणना के बाद आए नतीजे यदि एक्जिट पोलों के अनुमान को सत्य साबित कर दें तो भी आश्चर्य नहीं होगा। जीती बाजी यदि हाथ से निकल जाए तो इसके लिए एकमात्र दोषी विपक्षी एकता का अभाव ही माना जाएगा। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने विपक्षी दलों को एकजुट करने का प्रयास अवश्य किया लेकिन अपने ही नेतृत्व में। उन्होंने छोटे-छोटे दलों को अपने गठबंधन में शामिल किया। वे विपक्षी दलों के उस खेमे के साथ रहे जो पिछले कई चुनावों से भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी बनाकर भाजपा को पराजित करने के दिवास्वप्न देखता है। इसमें मुख्य रूप से ममता बनर्जी, केसीआर आदि शामिल हैं। ममता बनर्जी ने महाराष्ट्र जाकर राकपां के दिग्गज नेता शरद पवार से मिलीं। अन्य विपक्षी नेताओं से मिलीं। उन्होंने कांग्रेस के अस्तित्व को पूरी तरह से नकारा। उन्होंने भाजपा के दिग्गज नेताओं को पहली बार बंगाल चुनाव में पराजित करने का कारनामा दिखाया। लेकिन इस बात को भूल गईं कि वे एक क्षेत्रीय दल की नेत्री हैं और बंगाल के बाहर उनका कोई सांगठनिक ढांचा नहीं है। चाहे जितनी भी कमजोर हो चुकी हो लेकिन विपक्षी दलों में एकमात्र कांग्रेस है जो राष्ट्रीय पार्टी की हैसियत रखती है। शरद पवार, प्रशांत किशोर और उद्धव ठाकरे तक का मानना है कि कांग्रेस को शामिल के बिना कोई विपक्षी गठबंधन नहीं बन सकता है।

अखिलेश यादव कांग्रेस को दरकिनार कर जातीय नेताओं और दलों की गोलबंदी की लेकिन विपक्षी मतों के बिखराव को रोक नहीं सके। कांग्रेस ने कुछ सीटों को छोड़कर सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए। उसे चाहे जितनी सीटें हासिल हों लेकिन उसके प्रत्याशियों को जो भी वोट मिले वह विपक्ष के ही वोट थे। बसपा का तो खैर अघोषित रूप से भाजपा के साथ तालमेल रहा और उसी की रणनीति के तहत उसने चुनाव लड़ा। इधर ओवैसी साहब भी मुस्लिम वोटों को काटने के मकसद से मैदान में उतर गए। उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यकों ने उनपर कितना भरोसा किया, कितने प्रतिशत वोट दिए यह तो मतगणना के बाद पता चलेगा लेकिन उन्हें जो भी वोट मिले हैं वह भाजपा के पक्ष में जाने वाले नहीं थे।

हो सकता है कि तमाम क्जिट पोल गलत साबित हों और नतीजे उनके आंकलन के विपरीत निकलें। लेकिन यह चुनाव 2024 के आम चुनावों की दिशा तय करने वाले हैं। यदि क्षेत्रीय क्षत्रप अपने सूबे के बाहर की दुनिया को नहीं देख पाए, अपनी महत्वाकांक्षाओं को काबू में नहीं रख सके तो 2024 के फाइनल में उनके हाथ में सत्ता की बागडोर आना मुश्किल हो जाएगा। भाजपा उनके बीच की रस्साकशी का लाभ उठाने से जरा भी नहीं चूकेगी।

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