खेती-किसानी को नए विकल्पों की जरूरत

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन कृषि सुधार कानून वापस लेने की घोषणा कर दी। किसान संगठनों की मांग पूरी हुई। संभवतः इस सदी का सबसे बड़ा किसान आंदोलन परवान चढ़ चुका। किसानों को संगठित होने का एक मौका मिला। लेकिन भारतीय कृषि के दीर्घकालीन मुद्दे ज्यों के त्यों रह गए। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इसबात का जिक्र भी किया और वास्तव में कृषि क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या छोटी जोत की है। 86 प्रतिशत किसान पांच एकड़ से कम जोत वाले हैं। छोटी जोत में वैज्ञानिक खेती संभव नहीं होती। जोत बड़ी होने पर ही तमाम कृषि उपकरणों का इस्तेमाल और उपज में बढ़ोत्तरी हो सकती है। हमारी सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि हर पीढ़ी के बाद ज़मीन वंशजों के बीच बंट जाती है। उसका आकार और छोटा होता जाता है। छोटी जोत को बड़ी करने के लिए सामूहिक खेती ही एकमात्र उपाय है। इसके लिए छोटी-छोटी जोतों एक प्रबंधकीय व्यवस्था में लाने की जरूरत होती है। इसके लिए कृषि क्षेत्र को या तो कार्पोरेट के हवाले किया जा सकता है या फिर सहकारिता के रास्ते आगे बढ़ाया जा सकता है। तीन कृषि सुधार कानून इसे कार्पोरेटीकरण की दिशा में ले जाते। यह किसानों को मंजूर नहीं हुआ। लिहाजा अब दूसरे विकल्प पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

संभवतः दोनों विकल्प प्रधानमंत्री के ध्यान में हैं। तभी उन्होंने सहकारिता को प्रभावी बनाने के लिए अलग मंत्रालय बनाया। उसका प्रभार केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को सौंपा। कृषि कानूनों की वापसी के बाद अब इस मंत्रालय को सक्रिय करना होगा। लेकिन इसमें भी कुछ बाधाएं हैं। सहकारी आंदोलन के अंदर वर्षों से एक ताकतवर माफिया तंत्र मौजूद है। कुछ राज्यों में यह सरकार बनाने और गिराने तक की ताकत रखता है। संसदीय राजनीति में इसका दखल है। उसपर लगाम कसने के बाद ही छोटे किसानों को इस क्षेत्र से जोड़ा और लाभ पहुंचाया जा सकता है। यह बड़ी लड़ाई होगी। जाहिर है कि सहकारिता के रास्ते इसमें विदेशी निवेश की संभावना नहीं के बराबर रहेगी लेकिन आंतरिक निवेश को विकसित करने की पर्याप्त संभावना रहेगी। इसके जरिए खेती का आधुनिकीकरण संभव होगा। किसानों की दशा सुधारी जा सकेगी। कृषि, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन, कृषि आधारित उद्योग आदि कितनी ही संभावनाओं के द्वार खुल जाएंगे। ग्रामीण भारत की आधारभूत संरचना को विकसित करते हुए कृषि वैज्ञानिकों के सुझावों को अमली जामा पहनाने का अवसर निकाला जा सकता है। एक गांव के किसानों को एकजुट करने के जरिए सामाजिक विवादों का भी निपटारा किया जा सकेगा। विवादों का सबसे बड़ा कारण काम का अभाव और निठल्लापन होता है।

इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि भारतीय कृषि व्यवस्था पटरी से कब और कैसे उतरी और इसे वापस पटरी पर लाने के लिए कौन सा रास्ता बेहतर होगा। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन व्यवस्था में पदार्पण तक प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता एक टन तक थी। आज 200 किलोग्राम का टारगेट है। पलासी युद्ध में नवाब शिराजुद्दौला के पराजय के बाद जब मुगल बादशाह शाह आलम ने 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल-बिहार-उड़ीसा का दीवानी अधिकार दे दिया। तभी से कृषि संस्कृति को ग्रहण लगने शुरू हुए। भारत की कृषि तकनीक पूरी तरह जैविक थी। अंग्रेजों ने गाय-भेड़ों का अपने आहार के लिए व्यापक पैमाने पर वध करना शुरू किया। यह उत्तम खाद का स्रोत हुआ करते थे। उन्होंने लगान इतनी बढ़ा दी कि किसानों को खेती करने की जगह ज़मीन परती छोड़ देना बेहतर लगने लगा। इसके कारण अन्न का उत्पादन घटता चला गया। समस्या विकराल होती चली गई। 1880 में ब्रिटिश सरकार ने पहला दुर्भिक्ष आयोग बनाया जिसने कृषि संबंधी आंकड़ों का संकलन करने की शुरुआत की। आयोग ने पाया कि यदि प्रति व्यक्ति 200 किलोग्राम अनाज की उपलब्धता हो तो अकाल जैसी आपदा से बचा जा सकता है। यह एक सुरक्षात्मक लक्ष्य था। आज भी यही लक्ष्य है।

आजादी के बाद कृषि व्यवस्था को पटरी लाने का अवसर भी था और आवश्यकता भी थी। देश अन्न संकट से गुजर रहा था। लेकिन लाल बहादुर शास्त्री से पहले की सरकारों ने से गंभीरता से नहीं लिया। शास्त्री जी के समय कनाडा से गेहूं आयात करने की जरूरत पड़ गई। उन्होंने अनाज उत्पादन के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया। कृषि क्षेत्र के विकास के लिए कृषि आयोग का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन थे। उन्होंने भारत की पारंपरिक कृषि तकनीक का आधुनिकीकरण करने की जगह कनाडा से रासायनिक खेती की तकनीक के आयात का सुझाव दिया। तकनीक आ गई। इससे अन्न उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भरता भी आई। लेकिन यह तात्कालिक लाभ दूरगामी नुकसान का प्रस्थान बिंदु था। रासायनिक खेती के कारण खेती की लागत बढ़ गई और मिट्टी की उर्वरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। आज  अधिकांश कृषि भूमि जहरीली हो चुकी है। 1996 के बाद रासायनिक खेती का दुष्प्रभाव दिखने लगा। अन्न का संकट भी उत्पन्न होने लगा। ऐसे में दूसरे कृषि आयोग का गठन हुआ। इस आयोग ने न्यूनतम समर्थन मूल्य को दुगनी करने के साथ कई सुझाव दिए। उनका आधा-अधूरा क्रियान्वन हुआ। इसके कारण उपभोक्ता बाजार में अनाज की कीमत तेज़ी से बढ़ी। लेकिन इसका लाभ किसानों की जगह बिचौलियों को मिला।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कृषि को संकट से उबारना चाहते हैं। लेकिन इसके उपाय पर उन्होंने न कभी किसान नेताओं से बात की न कृषि वैज्ञानिकों से। इसे कार्पोरेट के हवाले करने का निर्णय ले लिया। यह मान्य नहीं हुआ। प्रधानमंत्र ने कृषि संबंधी मुद्दों के निपटारे के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाने का फैसला किया है। इसकी बैठकों में वे स्वयं उपस्थित होकर विचार-विमर्श करें तो बेहतर रास्ता निकल सकता है। यह जरूरी है।

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