किसान आंदोलनः उल्टा पड़ गया अमित शाह का दांव

0 187

-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

किसानों का सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ाने में हरियाणा के मुख्मंत्री मनोहर लाल खट्टर की अहम भूमिका रही। बाकी कसर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पूरी कर दी। 25 नवंबर को पंजाब के किसान जब अपने ट्रैक्टरों पर राशन लादकर दिल्ली के लिए निकले तो खट्टर साहब ने हरियाणा पार न करने देने का पूरा इंतजाम कर दिया। कहीं सड़क पर बैरिकेटिंग कराई कहीं बड़े-बड़े पत्थर बिछवा दिए। कहीं गड्ढा खुदवा दिया। रास्ते में भारी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात कर दिया। वे इन जनविरोधी कार्रवाइयों के जरिए मोदी जी की नज़र में अपना नंबर बनाना चाहते थे। लेकिन किसानों की सुनामी सारी बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ती चली गई तो किसानों पर अश्रु गैस, लाठी चार्ज, गोली चार्ज और वाटर केनिंग का इस्तेमाल किया। फिर भी उनकी सारी युद्धस्तरीय तैयारी धरी की धरी रह गई। पुलिस के हमले में कुछ किसान घायल हुए। एक किसान की मौत भी हो गई लेकिन किसान हर बाधा को पार कर दिल्ली पहुंच गए। गोदी मीडिया, भाजपा का आइटी सेल और उसके बयानबहादुर नेताओं ने इसे पाकिस्तान प्रदत्त खलिस्तानी आंदोलन तक करार दिया। लेकिन इससे सरकार की नीयत ही संदिग्ध होता चली गई। अविश्वास बढञता चला गया।

जब किसान दिल्ली पहुंच गए तो अमित शाह ने मोर्चा संभाला। उनके निर्देश पर दिल्ली पुलिस ने केजरीवाल सरकार से दिल्ली के सारे स्टेडियमों को अस्थाई जेल बनाने की अनुमति मांगी। दिल्ली सरकार के गृहमंत्री ने किसानों की मांग को जायज बताते हुए स्टेडियम देने से इनकार कर दिया। लेकिन अमित शाह आंदोलनो को कुचलने में माहिर रहे हैं। उन्होंने तुरंत पैंतरा बदला और बुराड़ी के निरंकारी मैदान को अघोषित रूप से अस्थाई जेल बनाने की तैयारी कर ली। उन्होंने किसानों को वहां अपना धरना जारी रखने की अनुमति प्रदान कर दी। जो किसान दिल्ली पहुंच चुके थे वे निरंकारी मैदान पहुंच भी गए। लेकिन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व अन्य राज्यों के किसान अभी रास्ते में थे। 500 किसान संगठनों के संयुक्त महासंघ की कोर कमेटी के नेता शाह की चाल को समझ गए और उन्होंने निरंकारी मैदान जाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे जंतर-मंतर जाएंगे या फिर यहीं रहेंगे। इसके बाद किसान नेताओं ने दिल्ली के सभी प्रवेश मार्गों को घेर लेने का फैसला किया। इधर मोदी और शाह स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ पाए। वे चुनाव प्रचार के लिए हैदराबाद चले गए। इस बीच किसानों ने चारों तरफ से दिल्ली को घेर लिया। अब स्थिति यह है कि दूसरे राज्यों से होने वाली आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो गई। कोई भी ट्रक दिल्ली में प्रवेश नहीं कर सकेगा। सप्लाई चेन पूरी तरह ठप्प हो जाएगा। इससे बाजार में जितनी सामग्री है वह महंगी हो जाएगी और मामला लंबा चला तो दिल्ली की ढाई करोड़ की आबादी त्राहिमाम कर उठेगी। उसका गुस्सा मोदी सरकार पर टूटेगा। ऐसे में मोदी सरकार को या तो किसानों के खिलाफ सेना को उतारना पड़ेगा या फिर उनकी मांगें मान लेनी होगी। अगर मांगें मान लीं तो स्थिति नियंत्रण में आ जाएगी लेकिन मोदी जी का अहंकार टूट जाएगा। अगर सरकार दमन की नीति अपनाएंगी तो यह देशव्यापी किसान विद्रोह का रूप ले लेगा जिसमें बेरोजगार युवा, मजदूर और अन्य वर्गों के लोग शामिल हो जाएंगे। अगर सरकार बर्बरता से बाज नहीं आएगी तो यह आंदोलन अधिक समय तक संयमित और अहिंसक नहीं रह पाएगा। देश में गृहयुद्ध की स्थिति बन जाएगी। यह सरकार बनाम जनता के युद्ध में परिणत हो जाएगा।

सवाल है कि क्या अडाणी और अंबानी को लाभ पहुंचाने के लिए मोदी सरकार पूरे देश को हिंसा की आग में झोंक देने में संकोच नहीं करेगी। मोदी जी इन दो मित्र उद्योगपतियों को एक-एक कर देश की काफी संपदा कौड़ियों के मोल दे चुके हैं और लगातार देते जा रहे हैं। लेकिन कृषि क्षेत्र उनके हवाले करना इतना आसान नहीं होगा। किसान और मजदूरों की आवाज़ को वे लाठी, गोली और प्रोपगेंडा मशीनरी से नहीं दबा सकेंगे। मोदी जी ने अभी तक अपने छह वर्षों के कार्यकाल में कोई संस्थान बनाया नहीं। बस पुरानी सरकारों के बनाए उपक्रमों को दोस्तों के बीच लुटाते रहे। इतना सारा कुछ बेच डालने के बाद भी जीडीपी को माइनस 24 डिग्री पर लाकर खड़ा कर दिया। अब देश को लुटाना जारी रखना उनके लिए महंगा पड़ेगा। उनके भक्तों की संख्या इतनी नहीं है कि किसानों, मजदूरों और आम जनता की आवाज़ को दबा सके। पुलिस, अर्ध सैनिक बल और सेना भी उनके पूंजीपति मित्रों की तिजोरी भरने के लिए जनता का दमन करने को शायद ही तैयार हो। वे देश के रक्षक हैं मोदी जी के लठैत नहीं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

%d bloggers like this: