किसान आंदोलन के लिए खतरे की घंटी है लखबीर हत्याकांड

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 नई दिल्ली। अब यह साफ हो चुका है कि किसानों के धरना स्थल सिंघु बार्डर पर युवा मजदूर लखबीर सिंह की नृशंस हत्या नहंगों ने की थी। उन्होंने हत्या के बाद शव का एक हाथ और एक पांव काटकर शव को बैरिक्ट पर टांगदिया था। हत्या का कारण धर्मग्रंथ का अपमान था। निहंग शुरू से ही किसानों के धरनास्थल पर मौजूद हैं। वे धर्म के मामले में उतने ही कट्टर हैं जितना तालीबान अथवा अन्य धर्मों के कट्टरपंथी। वे धर्मग्रंथ का अपमान सहन नहीं कर पाए। लेकिन उन्होंने यह जानते हुए कि किसान शांतिपूर्ण धरना पर बैठे हैं वहीं हिंसा को अंजाम दिया। वहां हजारों की संख्या में मौजूद किसानों को इतनी बड़ी घटना की जरा सी भनक तक नहीं मिली यह आश्चर्य की बात है। सवाल है कि क्या किसान आंदोलन पर मंडराते खतरों के प्रति किसान नेता क्या इतने असावधान हैं कि रात के समय चौकसी बरतने की कोई व्यवस्था नहीं की? रात में पहरा देने का कोई इंतजाम नहीं किया? सारे के सारे किसान शाम होने के बाद अपने टेंटों में जाकर आराम फरमाने लगते हैं?

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

ऐसे में तो उनके आंदोलन को बदनाम करने के लिए किसी स्तर पर कुछ भी किया जा सकता है। रात के समय उनपर कोई भी हमला कर सकता है। सरकारी तंत्र ऐसा नहीं भी करे तो खलिस्तानी या पाकिस्तानी आतंकवादी अवश्य कर सकते हैं। इल्जाम पुलिस प्रशासन के सर जाएगा। दिल्ली के बार्डरों पर किसानों के धरना के कई महीने बीत चुके हैं। सरकार के साथ उनकी कई दौर की वार्ताओं का भी कोई नतीजा नहीं निकला है। न सरकार किसानों को समझा पा रही है न किसान सरकार को। तीन विवादास्पद कानूनों को वापस लेने या लागू करने का कोई उपक्रम नहीं हो रहा है। उनके धरना का सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है।

सवाल है कि ऐसे में किसान नेता धरना के अलावा आंदोलन के किसी अन्य तरीके को क्यों नहीं अपनाते हैं? जब उन्हें पता है कि सरकार उनके पक्ष को सुनने या स्वीकार करने को तैयार नहीं है तो कम से कम जन समर्थन प्राप्त कर आंदोलन को राष्ट्रव्यापी स्वरूप देने का ही प्रयास करते। यह काम दिल्ली की सीमाओं पर धरना देकर नहीं किया जा सकता। किसान नेता इस बात से अवगत हैं कि संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था में राजनीतिक दल वोटों के अलावा अन्य किसी नुकसान को नुकसान नहीं समझते। वोट के अलावा कोई भाषा नहीं समझते। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाकों के कई चुनावों में किसान आंदोलन सत्ताधारी भाजपा को झटका देने में विफल रहा है। लखीमपुर खीरी नरसंहार को किसान नेता मुद्दा बनाकर जन समर्थन प्राप्त कर सकते थे। सरकार को घेर सकते थे। लेकिन उसके अभियुक्तों पर कार्रवाई से सरकार पीछे नहीं हटी। मुख्य अभियुक्त की गिरफ्तारी हो चुकी है। उसके मंत्री पिता की कुर्सी डगमगा रही है। विधानसभा चुनाव को देखते हुए राज्य अथवा केंद्र सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठा रही है जिससे जनता के बीच गलत संदेश जाए।

दूसरी तरफ किसान नेता राजनीतिक दलों के नेताओं का समर्थन लेने या अपने मंच पर जगह नहीं देने की नीति पर कायम हैं। प्रियंका गांधी तक को शहीद किसानों के अरदास पर बोलने का मौका नहीं दिया। किसान स्वयं भी संसदीय राजनीति को कहीं से प्रभावित करने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में यदि भाजपा 2022 और 2024 के चुनाव में एक बार फिर जीत हासिल कर सत्ता में वापस आ जाती है तो उनकी मांगों का, उनके आंदोलन का क्या होगा?

लखबीर सिंह की हत्या के मामले में तीन निहंग गिरफ्तार हो चुके हैं। उन्हें कोर्ट में हाजिर किया जा चुका है। उनसे पूछताछ के लिए रिमांड भी मिल चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसकी सच्चाई सामने आएगी। लेकिन किसान नेता जिस तरह धरना स्थलों पर असावधानी बरत रहे हैं उसे देखते हुए इस तरह की घटनाओं का पुनरावृत्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। किसान नेताओं को अपने आंदोलन के स्वरूप पर मंथन करने की जरूरत है।

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