मोदी सरकार को महंगा पड़ेगा किसानों से पंगा लेना 

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

मोदी सरकार ने तीन कृषि सुधार कानून बनाकर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है। किसान आंदोलित हैं। अभी दिल्ली की तमाम सीमाओं पर किसानों के जत्थे हजारों की संख्या में पड़ाव डाले हुए हैं। कई लाख किसान दिल्ली पहुंच चुके हैं और बुराड़ी के निरंकारी मैदान में मौजूद हैं। दिल्ली पुलिस सारे किसानों को गिरफ्तार कर दिल्ली के स्टेडियमों में रखना चाहती थी लेकिन दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी। मोदी सरकार दिल्ली के बॉर्डरों पर जमा किसानों से अपील कर रही है कि वे निरंकारी मैदान में आ जाएं। लेकिन वे जंतर-मंतर जाने पर अड़े हुए हैं। मोदी सरकार अभी तक कई आंदोलनों को पुलिस की बर्बर कार्रवाई के जरिए सफलता पूर्वक दबा चुकी है या कुचल चुकी है। किसानों को भी दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए भाजपा शासित राज्यों में बैरिकेटिंग, लाठी चार्ज, गोली चार्ज, अश्रु गैस, वाटर केनन जैसे तमाम उपाय कर चुकी लेकिन किसानों को रोक नहीं सकी। अगर दिल्ली सरकार ने स्टेडियमों को अस्थाई जेल बनाने की अनुमति दे दी होती तो सरकार का दमन चक्र रुकता नहीं, जारी रहता। लेकिन अब समस्या है कि लाखों की संख्या में जुटे किसानों को रखने के लिए उसके पास जगह नहीं है। इसलिए उसे बैकफुट पर आना पड़ा। सरकार ने विवश होकर किसानों को अहिंसक तरीके से धरना-प्रदर्शन की अनुमति प्रदान कर दी लेकिन उन्हें बुराड़ी के निरंकारी मैदान में जुटने का निर्देश दे दिया।

मोदी सरकार ने कृषि सुधार के नाम पर जो तीन कानून बनाए उनका उद्देश्य क्या है यह कोई छुपी हुई बात नहीं है। अडाणी के पास बड़े-बड़े गोदाम हैं और पिछले एक-डेढ़ साल से वे नए-नए गोदाम बनवा रहे हैं। उनकी मदद के लिए कृषि उत्पाद को आवश्यक वस्तु अधिनियम से बाहर कर दिया गया। जमाखोरी की पूरी छूट दे दी। अब वे आराम से अनाज का भंडारण कर सकते हैं और बाजार में तेजी आने तक का इंतजार कर सकते हैं। इसके अलावा निजी क्षेत्र में कृषि मंडी खोलने की भी इजाजत दे दी। किसान सरकारी मंडी में अनाज बेचेंगे तो उन्हें टैक्स देना पड़ेगा जबकि निजी मंडी में कोई टैक्स नहीं लगेगा। मूल्य निर्धारण निजी मंडियों के संचालक करेंगे। उनपर न्यूनतम समर्थन मूल्य की कोई शर्त नहीं होगी। उन्हें तीन दिनों के अंदर भुगतान करना होगा। नहीं भी करें तो किसानों को उनके खिलाफ अदालत में जाने का अधिकार नहीं होगा। बिहार में सरकारी मंडियां पहले हीं खत्म की जा चुकी हैं। इससे उन्हें क्या लाभ हुआ है जगजाहिर है। अंबानी ने बिग बाजार खरीद कर एक मजबूत रिटेल चेन तैयार कर लिया है। यह सब तैयारियां कानून बनाने के पहले से चल रहीं हैं। अडाणी अनाज का भंडारण करेंगे और अंबानी उसकी बिक्री करेंगे। यही योजना है। किसान जब त्राहिमाम की स्थिति में पहुंच जाएंगे तो उन्हें कार्पोरेट कंपनियों के साथ कांट्रैक्ट फार्मिंग में जाने को मजबूर हो जाना पड़ेगा। यही मकसद है। यह प्रयोग अमेरिका और यूरोप में विफल हो चुका है लेकिन हमारी सरकार पश्चिम के स्क्रैप से मजबूत इमारत बनाने में विश्वास करती है।

सरकार किसानों को समझा रही है कि यह कानून उनकी भलाई के लिए बनाए गए हैं। लेकिन इनसे उनका क्या भला होगा बताने के लिए उसके पास कुछ नहीं है। बस सरकार ने कह दिया कि भला होगा तो मान लीजिए भला होगा। सरकार की नीयत साफ होती तो इन कानूनों को बनाने के पहले किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों से सलाह-मश्विरा करती। लेकिन सलाह-मश्विरा करना मोदी सरकार की कार्यशैली में शामिल नहीं है। वह सलाह करती भी है तो अपने कार्पोरेट मित्रों के साथ और उनके हित को अपनी प्राथमिकता में रखती है। मोदी सरकार ने किसानों को जितना भोला और जितना मूर्ख समझा था उतने वे हैं नहीं। आज खेतीबाड़ी के क्षेत्र में पढ़े लिखे लोग हैं और किसानों के नेता नियम कानून को बेहतर तरीके से समझते हैं। सभी जानते हैं कि देश की आबादी का 70 फीसदी हिस्सा गावों में रहता है और कृषि कार्य से जुड़ा है। मोदी सरकार ने आबादी के बड़े हिस्से से पंगा ले लिया है। यह ठीक उसी तरह है जैसे नोटबंदी के समय बिना किसी तैयारी के 76 प्रतिशत करेंसी को अचानक बंद कर दिया था। अब स्थिति यह है कि सरकार ने अडाणी-अंबानी के हित के लिए जो फैसला लिया है उसे वापस नहीं ले सकती। वह मित्रों को नाराज नहीं कर सकती। दोशवासी भले नाराज हो जाएं। भाजपा सत्ता में बने रहने के सारे दरवाजे जानती है। मित्र कृषि क्षेत्र पर काबिज होने का इंतजार कर रहे हैं और किसान सरकार के झांसे में नहीं आ रहे हैं। वे दमन के सामने भी सर नहीं झुका रहे हैं। वे करो या मरो के मूड में आ चुके हैं। कृषि मंत्री के लिए इस समय किसानों के गुस्से को शांत करना प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन वे किसान नेताओं को बातचीत के लिए 3 दिसंबर का समय मांग रहे हैं। इस बीच वे अपना जवाब तैयार कर लेंगे। कुछ कुतर्क गढ़ लेंगे या फिर दो कदम पीछे हटने को तैयार हो सकते हैं।

मोदी सरकार मजदूरों का हक छीन चुकी है, कर्मचारियों का दमन कर चुकी है। कई करोड़ नौकरियां छीन चुकी है। अपने खिलाफ बोलने वालों के लिए उसने कई तरह के सर्टिफिकेट तैयार कर रखे हैं। उसके आइटी सेल, गोदी मीडिया और मूर्ख अंधभक्तों के अलावा कोई उसके समर्थन में नहीं है। लेकिन वह तिकड़मों के बल पर चुनाव जीतने की कला सीख चुकी है। चुनाव आयोग उसकी जेब में है। वह मतपत्रों के जरिए चुनाव के लिए कभी तैयार नहीं होगी और जबतक ईवीएम है भाडपा की सरकार बनती रहेगी। जहां तक जन विद्रोह का सवाल है, भारत में इसकी कोई संभावना नहीं है। आजादी की लड़ाई में भी आबादी का एक छोटा सा तबका शामिल हुआ था। अगर इस देश के लोगों में अपने अधिकारों के लिए लड़ने का दम होता तो वे इतने लंबे समय तक गुलाम नहीं रहते। अभी भी वे गुलामी की मानसिकता से मुक्त नहीं हुए हैं। कभी किसान आंदोलित होंगे, कभी युवा, कभी मजदूर, कभी कर्मचारी लेकिन उनका एकजुट आंदोलन शायद ही कभी सामने आए। उनकी एकजुटता के बीच में जाति और धर्म की पुख्ता दीवारें खड़ी की जा चुकी हैं। भारत की जनता अंदर से कोई दबाव बनाने की स्थिति में नहीं है। अमेरिका में जो वाइडेन के पूरी तरह सत्ता में आने के बाद शायद बाहरी दबाव कुछ काम  कर जाए। अन्यथा इस देश का भगवान ही मालिक है।

1 Comment
  1. erotik says

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