नेताजी का रहस्यलोक

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भारत को आजाद हुए 75 साल बीत गए। इस दर्मियान आजाद भारत की नस्लों को यही पढाया गया कि स्वतंत्रता संग्राम महात्मा गांधी की विचारधारा के तहत पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में लड़ा गया और सत्य तथा अहिंसा के बल पर गुलामी की जंजीरों को तोड़ डाला गया। लेकिन यह अर्धसत्य है। इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले लोग जानते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में हमारे राष्ट्रनायक नरम तथा गरम दल में बंटे हुए थे और अंग्रेजों को मुख्य चुनौती गरम दल से मिल रही थी। गरम दल के नेता दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के नेतृत्व वाले मित्रराष्ट्र के विरोध में थे और जर्मनी, इटली तथा जापान के त्रिगुट वाले विक्षुब्ध राष्ट्र के साथ थे। उस समय भारत के ह्रदय सम्राट नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के जरिए विक्षुब्ध गुट की ओर से युद्ध में हिस्सा लिया था। उनका मानना था कि ब्रिटेन को युद्ध में परास्त करने के बाद भारत को आजाद कराना आसान हो जाएगा जबकि वामपंथियों समेत राष्ट्रनायकों का एक हिस्सा मानता था कि फासिस्टवाद के खिलाफ लड़ने के नाते ब्रिटेन के खिलाफ अभी कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। हालांकि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की गति को रोकना उनके वश की बात नहीं थी। वह राष्ट्रवाद की इतनी प्रचंड लहर थी कि उससे किनारा करने वाले लंबे समय के लिए राष्ट्र की मुख्यधारा के बाहर हो गए।

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

बहरहाल 1942 का आंदोलन एक स्वतःस्फूर्त जन विस्फोट था जबकि नेताजी एक सुनियोजित रणनीति के मुताबिक काम कर रहे थे। पंडित नेहरू गरम दल के नेताओं को पसंद नहीं करते थे। सरकारी दस्तावेज़ों में गरम दल के लगभग सभी क्रांतिकारियों को आतंकवादी करार दिया गया। नेताजी को तो अंग्रेजों ने ही युद्ध अपराधी घोषित कर दिया था। आजाद भारत की सरकारें सैद्धांतिक रूप से यही मानती रहीं हालांकि इसे कभी खुलकर स्वीकार नहीं किया।

लेकिन भारतवासियों के मन में नेताजी प्रति अपार श्रद्धा का भाव रहा है। उनके नाम का उच्चारण ही रगों में जोश भर देता है। लोगों का मानना है कि यदि नेताजी के नेतृत्व में आजादी मिली होती तो तस्वीर कुछ और होती। नेताजी के के त्याग का सबसे बड़ा उदाहरण है कि उस समय के सबसे कठिन समझे जानेवाली आइसीएस की परीक्षा पास करने और सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा में शामिल होने के बावजूद उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नौकरी को लात मार दिया और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

वर्ष 1921 में उन्होंने देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर सर्वोच्च प्रशासनिक पद से इस्तीफा दे दिया था। नौकरी छोड़ने के बाद वे सबसे पहले महात्मा गांधी से मिले। लेकिन गांधी के विचारों से वे बहुत ज्यादा सहमत नहीं हुए। इसके बाद महात्मा गांधी के ही परामर्श पर वे चितरंजन दास से मिले। उनसे अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने चितरंजन दास को ही अपना राजनैतिक गुरु माना।

चितरंजन दास ने एक नेशनल कॉलेज की स्थापना की थी। नेताजी उस कॉलेज के प्रिंसिपल नियुक्त किए गए। इस संस्था का संचालन उन्होंने बड़ी योग्यता के साथ किया। जब प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आए तो उनके बहिष्कार में नेताजी ने महत्वपूर्ण भाग लिया। इसके कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिए गया और पहली बार उन्हें 6 माह के कारावास का दंड दिया गया। वर्ष 1923 में कांग्रेस के अंदर ही स्वराज पार्टी की स्थापना हुई। उसी समय अंग्रेजी में फारवर्ड नामक एक दैनिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया गया। श्री बोस को उसके जरिए पार्टी के विचारों के प्रचार का कार्य सौंपा गया। नेताजी का विचार था कि अंग्रेजी सरकार से विधान मंडलों के चुनाव में भी दो-दो हाथ किया जाए। चुनावों में स्वराज दल ने हिस्सा लिया और असाधारण प्रदर्शन किया।

चुनाव में चितरंजन दास कोलकाता कॉरपोरेशन के मेयर चुने गए और नेताजी उसके एग्जीक्यूटिव ऑफिसर नियुक्त हुए। इस पद पर भी उन्होंने विलक्षण योग्यता का परिचय दिया। उनके काम से विरोधी दल के लोग भी खुश थे। तत्कालीन वायसराय ने नेताजी को अपने पक्ष में लाने की बहुत कोशिश की। यह संभव नहीं हुआ तो उन्हें बंगाल अराजक ऑर्डिनेंस के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया। नेताजी को मांडले वर्मा जेल भेज दिया गया। जेल में उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ा। इसे देखते हुए उन्हें बिना किसी शर्त के रिहा कर दिया गया। जेल में रहते हुए भी नेताजी को बंगाल विधान परिषद का सदस्य चुना गया।

1939 में त्रिपुरी के चुनाव में नेताजी भारी बहुमत से कांग्रेस का अध्यक्ष चुने गए। उस चुनाव में महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे दिग्गज नेताओं ने उनका भरपूर विरोध किया था लेकिन नेताजी की लोकप्रियता और स्वीकार्यता को वे रोक नहीं सके थे। महात्मा गांधी डॉ पट्टाभी सीतारामय्या को पार्टी का अध्यक्ष बनाना चाहते थे। उन्होंने इसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। इसके कारण कांग्रेस दो गुटों में बंट गई। उसी समय कांग्रेस की कार्यसमिति ने 12  बड़े नेताओं ने एक साथ इस्तीफा दे दिया। उस स्थिति में पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने एक प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस के अध्यक्ष को नई कार्य समिति के सदस्यों की नियुक्ति महात्मा गांधी की सलाह से करनी चाहिए। यह प्रस्ताव पारित भी हो गया। एक तरह से यह नेताजी को पद त्यागने का निर्देश था। नेताजी ने गांधी जी की इच्छा को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वे फॉरवर्ड ब्लॉक को संगठित करने के काम में लग गए। नेताजी का महात्मा गांधी से वैचारिक मतभेद जरूर था लेकिन उनके सम्मान में वे कमी नहीं आने देते थे। वे महात्मा गांधी को भारत का सबसे बड़ा महापुरुष मानते थे और इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते थे। नेताजी का मानना था कि महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से भारत को स्वाधीनता कभी नहीं मिलेगी। उनका मानना था कि अंग्रेज द्वितीय विश्व-युद्ध में फंसे हैं। उनकी इस राजनीतिक अस्थिरता का फ़ायदा उठाते हुए स्वतंत्रता की लड़ाई तेज़ करनी चाहिए।

वर्ष 1934 में जब नेताजी इलाज के सिलसिले में ऑस्ट्रिया प्रवास पर थे तब उन्हें अपनी पुस्तक लिखने के लिए एक अंग्रेजी टाइपिस्ट की जरूरत पड़ी। इसके लिए ऑस्ट्रियन महिला एमिली शेकल को जोड़ा गया। सुभाष चंद्र बोस का एमिली से प्रेम हो गया। उन दोनों ने 1942 में हिंदू पद्धति से विवाह रचा लिया तथा इमली से उन्हें एक पुत्री प्राप्त हुई जिसका नाम अनीता बोस रखा गया।

दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने रूस, जर्मनी और जापान सहित कई देशों की यात्रा की। इन यात्राओं का उदेश्य स्वतंत्रता संग्राम के लिए अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन को मजबूत करना भारत में ब्रिटिश राज पर हमला करना था। विश्वयुद्ध के दौरान 1942 में उन्होंने भारत को आजाद कराने के लिए जापान में आजाद हिंद फौज नामक सशस्त्र सेना का गठन किया। इसकी स्थापना महान क्रांतिकारी नेता रासबिहारी बोस ने जापान में की थी।

आजाद हिंद फौज के गठन में जापान का भारी सहयोग रहा था। इस फौज में करीब 85000  सैनिक शामिल थे। इसमें एक महिला विंग भी था जिसे झांसी ब्रिगेड कहा जाता था। कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन इसकी कमांडर थीं। 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थाई सरकार भी बना ली। इस सरकार को  जापान,जर्मनी, फिलीपीन्स,चीन,कोरिया इटली और आयरलैंड ने मान्यता दे दी थी।

आजाद हिंद फौज ने कई रेडियो केंद्र स्थापित किए थे। जहां से बराबर समाचार प्रसारित होते रहते थे। फौजी स्कूलों की स्थापना भी की गई थी। जिसमें सैनिकों को बराबर प्रशिक्षित किया जाता था। एक राष्ट्रीय बैंक की स्थापना भी की गई थी। डाक विभाग की स्थापना के साथ-साथ नए टिकटों का प्रयोग किया गया था। नेताजी ने अपनी अस्थाई सरकार की करेंसी भी जारी की थी। इस सरकार का अपना गुप्तचर विभाग भी था।

नेताजी ने फहराया तिरंगा झंडा

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को सैनिक युद्ध में पराजित कर भारत से खदेड़ने की कोशिश की थी। 30 दिसंबर 1943 को उन्होंने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में आजाद हिंद सरकार का गठन कर पहली बार तिरंगा झंडा फहराया था। इसके बाद पुनः 14 अप्रैल को मणिपुर के मोइरंग में तिरंगा फहराया गया। उस रेजिमेंट की कमान कर्नल शौकत मलिक ने संभाल रखी थी।

उस समय जापान ने नेताजी का भरपूर सहयोग किया था। आजाद हिंद फौज के साथ जापानी सेना भी इस अभियान में शामिल थी। उन्होंने पूर्वोत्तर की ओर से अंग्रेजों को खदेड़ते हुए भारत में प्रवेश करने की योजा बनाई थी। मणिपुर में जीत का तिरंगा झंडा लहराने के बाद वे आगे बढञना चाह रहे थे। लेकिन मौसम प्रतिकूल होने के कारण उन्हें अभियान को बीच में ही छोड़कर सेना को वापस लौटाना पड़ा था।

नेताजी का मानना था कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की पूरी ताकत जर्मनी, जापान और इटली को परास्त करने में लगी हुई है। ऐसे में सशस्त्र युद्ध के जरिए भारत की आजादी आसानी से हासिल की जा सकती है। इसी मकसद से उन्होंने विक्षुब्ध गुट के राज्याध्यक्षों से संपर्क किया था। वे जापान गए। जर्मनी जाकर हिटलर से भी हाथ मिलाया  और उसके बाद सिंगापुर जाकर आजाद हिंद फौज की कमान संभाली। उन्होंने पूरी तैयारी के बाद जापानी सेना की मदद से पूर्वोत्तर की ओर से भारत में प्रवेश किया था।

आजाद हिंद फौज के जवानों ने 19 मार्च 1944 को अंग्रेजी सेना को खदेड़ कर अपना झंडा फहराया था। फौज के उस रेजिमेंट की कमान कर्नल शौकत मलिक ने कुछ मणिपुरी समर्थकों और आजाद हिंद के सिपाहियों की मदद से यह अभियान संभाला था और मोइरंग में राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। मणिपुर और इंफाल की लड़ाई आजाद हिंद फौज के लिए बहुत खास रही थी। मोइरंग आजाद हिंद फौज का मुख्यालय बना हुआ था। लेकिन उस समय भारी बारिश हो रही थी। इसके कारण रसद आपूर्ति और संचार में बहुत दिक्कतों को सामना करना पड़ रहा था। बेहद खराब मौसम के कारण जंग को अधूरा छोड़कर आजाद हिंद फौज और जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा था। इसके बाद अंग्रेजों को अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिल गया था।

लेकिन यह झंडा आजादी के बाद अपनाए गए देश के वर्तमान तिरंगा झंडा से थोड़ा अलग था। आज़ाद हिंद फ़ौज के झंडे में नारंगी, सफेद और हरे रंग की तीन पट्टियां तो थीं  लेकिन बीच की सफेद पट्टी बाकी दोनों से दोगुनी मोटी थी और बीच की सफेद पट्टी पर एक उछलता हुआ बाघ दर्शाया गया था। इसके अलावा पहली नारंगी पट्टी पर आज़ाद लिखा था और निचले हिस्से की हरी पट्टी पर हिन्द। फिर भी अंग्रेजों के लिए यह एक बड़ी चुनौती थी। उन्हें इस बात का डर था कि कहीं दूसरे विश्वयुद्ध में हिटलर का खेमा जीत गया तो उन्हें बहुत बेआबरू होकर भारत और अन्य उपनिवेशों से भागना पड़ेगा।

लेकिन आजाद हिंद फौज के जवान 19 मार्च की तारीख की अहमियत नहीं भूले और देश आज भी 19 मार्च को न  केवल आजाद हिंद के देश में प्रवेश को बल्कि देश की सरजमीं पर अंग्रेजों से जीत कर पहली बार तिरंगा फहराने की तारीख को याद करता है।

रहस्यमय अंत

नेताजी की मृत्यु की कभी पुष्टि नहीं हुई। सरकारी रिकार्ड के मुताबिक 18 अगस्त 1945  को रूस जाते समय उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन न इसका कोई साक्ष्य मिला न इसकी पुष्टि हुई। आजादी के बाद भी नेताजी के संबंध में तरह-तरह के दावे किए जाते रहे लेकिन उनमें से कोई भी दावा पुष्ट नहीं हो सका।

गुप्तचरों की चौकसी

नेताजी पर ब्रिटिश सरकार की कड़ी नज़र तो थी ही, आजाद भारत की सरकारें भी अदृश्य दबाव के तहत उन्हें इतिहास के मलवे में दफ्न करने का प्रयास करती थीं। पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और उनके बाद की सरकारें भी इसी परंपरा का अनुसरण करती थीं। इसके कई दृष्टांत सामने आ चुके हैं। कहते हैं कि इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में नेता जी पर एक पूरी फ़ाइल फाड़ डाली गई थी।

नेताजी पर किताबें लिख चुके एक जाने-माने लेखक ने प्रधानमंत्री कार्यालय से नेताजी की सोवियत संघ में मौजूदगी से संबंधित दस्तावेज़ की जांच रिपोर्ट मांगी तो जवाब मिला कि इससे विदेशी संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। सवाल है कि 75 वर्ष पूर्व की कहानी में ऐसे कौन से तथ्य हैं जिनका अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर विपरीत असर पड़ेगा। सवाल है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंध खराब होंगे अथवा हुक्मरानों के चेहरे का नकाब उतर जाएगा? बकौल ग़ालिब-कुछ तो है जिसकी राज़दारी है।

एक शोध के मुताबिक 1942 में चर्चिल ने सुभाष बोस का एनकाउंटर करने का आदेश दिया था। उन्होंने गुप्तचर विभाग को यह आदेश दिया था। मध्यपूर्व से जर्मनी जाने के रास्ते में उन्हें यह काम करना था। लेकिन नेताजी के रास्ता बदल देने के कारण चर्चिल का आदेश पूरा नहीं हो पाया।

यह भी माना जाता है कि 1945 की ताइवान में हुई विमान दुर्घटना इसी साजिश का हिस्सा थी। एक मान्यता है कि उसी दुर्घटना में नेताजी शहीद हुए थे। हालांकि ऐसी किसी दुर्घटना के भी साक्ष्य नहीं मिले। इतिहासकारों का मानना है कि ब्रिटिश हुकूमत को सबसे ज्यादा परेशानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस से थी। दूसरे विश्वयुद्ध में ब्रिटेन की तरफ से तैनात भारतीय सिपाहियों का झुकाव नेताजी की तरफ था और कई जगहों पर उन्होंने बगावत भी की थी। भारत सरकार का गुप्तचर विभाग नेताजी के परिवार के लोगों के पत्राचार पर भी नज़र रखता था। नेताजी के मन में नेहरू के प्रति क्या भावना थी इसका अंजाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आजाद हिंद फौज में उन्होंने एक नेहरू रेजिमेंट तक बनाया था।

नेताजी की जासूसी क्यों की जा रही थी इस संबंध में कई तरह की बातें प्रचलित हैं। लेकिन सबसे विश्वसनीय तर्क यह लगता है कि नेहरू जी को विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु की थ्योरी पर व्यक्तिगत रूप से विश्वास नहीं था। उनके परिजनों पर इसलिए नज़र रखी जा रही थी कि वे कभी तो अपने परिवार के लोगों से संपर्क करने का प्रयास करेंगे। इस तरह उनका पता चल जाएगा।

कहानी नेताजी की फरारी की

दूसरे विश्वयुद्द के दौरान 1940 के जमाने में जब जर्मनी के लड़ाकू विमान लंदन पर बम बरसा रहे थे तब ब्रिटिश सरकार ने विक्षुब्ध गुट के करीबी सुभाष चंद्र बोस को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर कलकत्ता की प्रेसिडेंसी जेल में कैद कर रखा था। 29 नवंबर 1940 को सुभाष चंद्र बोस ने अपनी गिरफ़्तारी के विरोध में भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। उनका स्वास्थ्य गिरने लगा। इससे ब्रिटिश सरकार डर गई कि कहीं जेल में उनकी मौत हो गई तो भारी बदनामी होगी। नतीजतन पांच दिसंबर को गवर्नर जॉन हरबर्ट ने बोस को उनके घर भिजवा दिया।

हरबर्ट चाहता था कि जैसे ही उनकी सेहत में सुधार हो उन्हें फिर से हिरासत में ले लिया जाए। नेताजी के एल्गिन रोड स्थित घर के बाहर सादे कपड़ों में पुलिस का कड़ा पहरा बिठा दिया था बल्कि घर के अंदर की गतिविधियों पर भी नज़र रखने के लिए कुछ एजेंट लगाए गए थे। उनके एजेंट कितने सक्रिय थे यह इसी बात से समझ जा सकता है कि गवर्नर को यहां तक रिपोर्ट थी कि नेताजी ने जेल से घर वापस लौटने के बाद जई का दलिया और सब्ज़ियों का सूप पिया था।

उस दिन से ही उनसे मिलने वाले हर शख़्स की गतिविधियों पर नज़र रखी जाने लगी थी और बोस के द्वारा भेजे हर ख़त को डाकघर में ही खोल कर पढ़ा जाने लगा था। इधर नेताजी भूमिगत होने की पूरी तैयारी कर ली थी। इसके लिए उन्होंने अपने 20 वर्षीय भतीजे शिशिर बोस की मदद ली थी। इस योजना की जानकारी शिशिर के अलावा घर के किसी सदस्य को नहीं थी।

नेताजी ने योजना बनाई कि शिशिर उन्हें देर रात को अपनी कार में कलकत्ता से दूर किसी रेलवे स्टेशन तक ले जाएंगे। उन्हें घर के मेनगेट से ही बाहर निकलना था। उनके पास दो विकल्प थे, या तो वे अपनी जर्मन वाँडरर कार का इस्तेमाल करें या फिर अमेरिकी स्टूडबेकर प्रेसिडेंट का। अमेरिकी कार आरामदेह थी लेकिन उसे आसानी से पहचाना जा सकता था, इसलिए इस यात्रा के लिए वाँडरर कार को चुना गया। शिशिर कुमार बोस ने अपनी किताब द ग्रेट एस्केप में लिखा है कि उन्होंने मध्य कलकत्ता के वैचल मौला डिपार्टमेंट स्टोर से भेष बदलने के लिए कुछ ढीली सलवारें और एक फ़ैज़ टोपी ख़रीदी। इसके बाद एक सूटकेस, एक अटैची, दो कमीज़ें, टॉयलेट का कुछ सामान, तकिया और कंबल ख़रीदा। शिशिर फ़ेल्ट हैट लगाकर एक प्रिटिंग प्रेस गए और वहां से नेताजी के लिए विज़िटिंग कार्ड छपवाए। कार्ड पर लिखा था, मोहम्मद ज़ियाउद्दीन, बीए, एलएलबी, ट्रैवलिंग इंस्पेक्टर, द एंपायर ऑफ़ इंडिया अश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, स्थायी पता, सिविल लाइंस, जबलपुर।

यात्रा की एक रात पहले शिशिर ने देखा कि नया सूटकेस वाँडरर कार के बूट में समा ही नहीं पा रहा था। इसलिए नेताजी का पुराना सूटकेस ही ले जाने का निश्चय किया गया।

उस सूटकेस पर एससीबी लिखा हुआ था। उसे मिटा कर उसके स्थान पर चीनी स्याही से एमज़ेड लिखा गया।

16 जनवरी को कार की सर्विसिंग कराई गई। अंग्रेज़ों को धोखा देने के लिए सुभाष के निकल भागने की बात बाकी घर वालों, यहां तक कि उनकी मां से भी से छिपाई गई।

गुप्तयात्रा से पहले नेताजी सुभाष ने अपने परिवार के साथ आख़िरी बार भोजन किया। उस समय वो सिल्क का कुर्ता और धोती पहने हुए थे। वे घर क सभी सदस्यों के सो जाने के बाद रात डेढ़ बजे नेताजी सुभाष बोस मोहम्मद ज़ियाउद्दीन का भेष धारण किया। उन्होंने सोने के रिम का अपना चश्मा पहना जिसको उन्होंने एक दशक पहले पहनना बंद कर दिया था। लंबी यात्रा के लिए फ़ीतेदार चमड़े के जूते पहने। नेताजी कार की पिछली सीट पर जा कर बैठ गए। शिशिर ने वांडरर कार बीएलए 7169 का इंजन स्टार्ट किया और उसे घर के बाहर ले आए। सुभाष के शयनकक्ष की बत्ती जलती छोड़ दी गई।

रात के सन्नाटे में उन्होंने लोअर सरकुलर रोड, सियालदाह और हैरिसन रोड होते हुए हावड़ा पुल पार किया। भोर होते-होते वे आसनसोल के बाहरी इलाके में पहुंच गए। सुबह क़रीब साढ़े आठ बजे शिशिर ने धनबाद के बरारी में अपने भाई अशोक के घर से कुछ सौ मीटर दूर सुभाष को कार से उतारा। शिशिर अशोक के घर में पहुंचे तो थोड़ी देर बाद इंश्योरेंस एजेंट ज़ियाउद्दीन के भेष में सुभाष बाबू ने घर में प्रवेश किया। वे अशोक को बीमा पॉलिसी के बारे में बताने लगे इसी बीच एक कमरे में उनके आराम की व्यवस्था की गई।

शाम को जियाउद्दीन वेषधारी नेताजी ने गोमो से कालका मेल पकड़ने की बात कही। यह ट्रेन देर रात को गोमो पहुंचती थी। शिशिर बोस उन्हें गोमो ले गए और कालका मेल के खुलने तक स्टेशन पर मौजूद रहे। इस ट्रेन से नेताजी दिल्ली पहुंचे फिर वहां से फ्रंटियर मेल से पेशावर निकल गए।

19 जनवरी की देर शाम वे पेशावर के केंटोनमेंट स्टेशन पहुंचे तो मियां अकबर शाह बाहर निकलने वाले गेट के पास खड़े थे। उन्होंने एक आकर्षक व्यक्तित्व वाले मुस्लिम शख़्स को गेट से बाहर निकलते देखा तो समझ गए कि वह छद्मभेष में सुभाष चंद्र बोस हैं। अकबर शाह उनके पास गए और उन्हें एक तांगे में बिठाया। उन्होंने तांगे वाले को डीन होटल चलने को कहा और खुद दूसरे तांगे में बैठे और उसके पीछे चलने लगे।

रास्ते में उनके तांगेवाले ने सलाह दी कि इतने मज़हबी मुस्लिम शख़्स को विधर्मियों के होटल में क्यों ले जा रहे हैं। आप उनको ताजमहल होटल ले चलिए वहां मेहमानों के नमाज़ पढ़ने और वज़ू करने का बेहतर इंतजाम है। मियां अक़बर को भी लगा कि बोस के लिए ताजमहल होटल ज़्यादा सुरक्षित जगह हो सकती है क्योंकि डीन होटल गुप्तचर विभाग की नज़र में हो सकता है।

लिहाज़ा दोनों तांगों के रास्ते बदलकर वे ताजमहल होटल पहुंचे। वहां का मैनेजर मोहम्मद ज़ियाउद्दीन नेताजी से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उनके लिए फ़ायर प्लेस वाला एक सुंदर कमरा खुलवा दिया। अगले दिन सुभाष चंद्र बोस को मियां अकबर ने अपने एक साथी आबाद ख़ां के घर पर ठहरा दिया। वहां सुभाष बाबू ने ज़ियाउद्दीन का भेष त्याग कर एक बहरे पठान का वेष धारण कर लिया। यह इसलिए भी ज़रूरी था क्योंकि सुभाष स्थानीय पश्तो भाषा बोलना नहीं जानते थे।

सुभाष बाबू के पेशावर पहुंचने से पहले ही अकबर ने तय कर लिया था कि फ़ॉरवर्ड ब्लॉक के दो लोग, मोहम्मद शाह और भगतराम तलवार, उन्हें भारत की सीमा पार कराएंगे। भगत राम का नाम बदल कर रहमत ख़ां कर दिया गया था। तय हुआ कि वे अपने गूंगे बहरे रिश्तेदार ज़ियाउद्दीन को अड्डा शरीफ़ के मज़ार ले जाएंगे जहां उनके फिर से बोलने और सुनने की दुआ मांगी जाएगी।

26 जनवरी, 1941 की सुबह मोहम्मद ज़ियाउद्दीन और रहमत ख़ां एक कार में रवाना हुए। दोपहर तक उन्होंने तब के ब्रिटिश साम्राज्य की सीमा पार कर ली। वहां उन्होंने कार छोड़ दी और उत्तर पश्चिमी सीमांत के ऊबड़-खाबड़ कबाएली इलाके में पैदल ही बढ़ना शुरू कर दिया।

27-28 जनवरी की आधी रात वो अफ़ग़ानिस्तान के एक गांव में पहुंचे।

वहां से उन लोगों ने चाय के डिब्बों से भरे एक ट्रक में लिफ़्ट ली और 28 जनवरी की रात जलालाबाद पहुंच गए। अगले दिन उन्होंने जलालाबाद के पास अड्डा शरीफ़ मज़ार पर ज़ियारत की। 30 जनवरी को उन्होंने तांगे से काबुल की तरफ़ बढ़ना शुरू किया। फिर एक ट्रक पर बैठ कर बुद ख़ाक के चेक पॉइंट पर पहुंचे। वहां से एक अन्य तांगा करके 31 जनवरी, 1941 की सुबह काबुल पहुंच गए।

इधर नेताजी सुभाष को गोमो छोड़ कर शिशिर 18 जनवरी को कलकत्ता वापस लौट गए और अपने पिता के साथ चितरंजन दास की पोती की शादी में सम्मिलित हुए। वहां जब उनसे लोगों ने सुभाष के स्वास्थ्य के बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि उनके चाचा गंभीर रूप से बीमार हैं।

इस बीच रोज़ सुभाष बोस के एल्गिन रोड वाले घर के उनके कमरे में खाना पहुंचाया जाता रहा। वह खाना उनके भतीजे और भतीजियां खाते रहे ताकि लोगों को आभास मिलता रहे कि सुभाष अभी भी अपने कमरे में हैं। नेताजी ने शिशिर से कहा था कि अगर वो चार-पांच दिन उनके भाग निकलने की ख़बर छिपा लें तो फिर उन्हें कोई नहीं पकड़ सकेगा। 27 जनवरी को एक अदालत में सुभाष के ख़िलाफ़ एक मुकदमे की सुनवाई होनी थी। तय किया गया कि उसी दिन अदालत को बताया जाएगा कि सुभाष बाबू घर से गायब हैं और उनका कहीं पता नहीं है।

नेताजी सुभाष के दो भतीजों ने पुलिस को ख़बर दी कि वो घर से गायब हो गए हैं। यह सुनकर सुभाष की मां प्रभावती का रोते-रोते बुरा हाल हो गया। उनको संतुष्ट करने के लिए सुभाष के भाई सरद ने अपने बेटे शिशिर को उसी वाँडरर कार में सुभाष की तलाश के लिए कालीघाट मंदिर भेजा। 27 जनवरी को नेताजी सुभाष के गायब होने की ख़बर सबसे पहले आनंद बाज़ार पत्रिका और हिंदुस्तान हेराल्ड में छपी। इसके बाद उसे रॉयटर्स ने उठाया। इसके बाद ये ख़बर पूरी दुनिया में फैल गई। इस खबर को ब्रिटिश खुफ़िया अधिकारियों की भद्द पिट गई कि उनकी आंखों के सामने नेताजी गायब हो गए और उन्हें इसकी भनक तक नहीं मिली।

शिशिर कुमार बोस ने अपनी किताब रिमेंबरिंग माई फ़ादर में लिखा है कि उन्होंने और उनके पिता ने अफ़वाह फैलाई कि नेताजी ने संन्यास ले लिया है। जब महात्मा गांधी ने सुभाष के गायब हो जाने पर टेलिग्राम किया तो उनके पिता ने तीन शब्द का जवाब दिया कि हालात संन्यास की तरफ़ इशारा कर रहे हैं। लेकिन वे रविंद्रनाथ टैगोर से इस बारे में झूठ नहीं बोल पाए। जब टैगोर का तार उनके पास आया तो उन्होंने जवाब दिया, सुभाष जहां कहीँ भी हों, उन्हें आपका आशीर्वाद मिलता रहे।

जब वायसराय लिनलिथगो को सुभाष बोस के भाग निकलने की ख़बर मिली तो वे बंगाल के गवर्नर जॉन हरबर्ट पर बहुत नाराज़ हुए। हरबर्ट ने अपनी सफ़ाई में कहा कि अगर सुभाष के भारत से बाहर निकल जाने की ख़बर सही है तो हो सकता है कि बाद में हमें इसका फ़ायदा मिले। लेकिन लिनलिथगो इस तर्क से प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने कहा कि इससे ब्रिटिश सरकार की बदनामी हुई है।

कलकत्ता की स्पेशल ब्रांच के डिप्टी कमिश्नर जे वी बी जानव्रिन का विष्लेषण था कि हो सकता है कि सुभाष संन्यासी बन गए हों लेकिन उन्होंने ऐसा धार्मिक कारणों से नहीं बल्कि क्रांति की योजना बनाने के लिए किया होगा।

उधर 31 जनवरी को पेशावर पहुंचने के बाद रहमत ख़ां और उनके गूंगे-बहरे रिश्तेदार ज़ियाउद्दीन, लाहौरी गेट के पास एक सराय में ठहरे। इस बीच रहमत ख़ां ने वहां के सोवियत दूतावास से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

तब नेताजी ने स्वयं जर्मन दूतावास से संपर्क करने का फ़ैसला किया। उनसे मिलने के बाद काबुल दूतावास में जर्मन मिनिस्टर हांस पिल्गेर ने 5 फ़रवरी को जर्मन विदेश मंत्री को तार भेज कर कहा कि सुभाष से मुलाक़ात के बाद उन्हें सलाह दी गई है कि वे भारतीय दोस्तों के बीच बाज़ार में अपने-आप को छिपाए रखें। उनकी तरफ़ से रूसी राजदूत से संपर्क किया है।

बर्लिन और मास्को से उनके वहां से निकलने की सहमति आने तक बोस सीमेंस कंपनी के हेर टॉमस के ज़रिए जर्मन नेतृत्व के संपर्क में रहे। इस बीच सराय में सुभाष बोस और रहमत ख़ां पर ख़तरा मंडराने लगा। एक अफ़ग़ान पुलिस वाले को उनपर शक हो गया था।

उन दोनों ने पहले कुछ रुपये देकर और बाद में सुभाष की सोने की घड़ी दे कर उससे अपना पिंड छुड़ाया। ये घड़ी सुभाष को उनके पिता ने उपहार में दी थी।

कुछ दिनों बाद सीमेंस के हेर टॉमस के ज़रिए सुभाष बोस के पास संदेश आया कि अगर वे अफ़ग़ानिस्तान से निकल जाना चाहते हैं तो उन्हें काबुल में इटली के राजदूत पाइत्रो क्वारोनी से मिलना चाहिए। 22 फ़रवरी, 1941 की रात को नेताजी ने इटली के राजदूत से मुलाक़ात की। इस मुलाक़ात के 16 दिन बाद 10 मार्च, 1941 को इटालियन राजदूत की रूसी पत्नी सुभाष चंद्र बोस के लिए एक संदेश ले कर आईं जिसमें कहा गया था कि सुभाष दूसरे कपड़ो में एक तस्वीर खिचवाएं।

नेताजी की उस तस्वीर को एक इटालियन राजनयिक ओरलांडो मज़ोटा के पासपोर्ट में उनकी तस्वीर की जगह लगा दिया गया। 17 मार्च की रात सुभाष को एक इटालियन राजनयिक सिनोर क्रेससिनी के घर शिफ़्ट कर दिया गया। अगली सुबह तड़के नेताजी एक जर्मन इंजीनियर वेंगर और दो अन्य लोगों के साथ कार से रवाना हुए। वे अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पार करते हुए पहले समरकंद पहुंचे और फिर ट्रेन से मास्को के लिए रवाना हुए। वहां से जर्मनी की राजधानी बर्लिन निकल गए।

नीरा आर्याः नेताजी को बचाने के लिए पति को मार दी गोली

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के अंदर देशभक्ति की भावना इतनी प्रबल थी कि वे कोई भी कुर्बानी देने में हिचकते नहीं थे। आजाद हिंद फौज के गुप्तचर विभाग में एक महिला जासूस थी नीरा आर्या। वह उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के खेड़का की रहने वाली थी। उनके पिता सेठ छज्जूमल उस जमाने के जाने-माने व्यापारी थे। उनके दोनों बच्चे कोलकाता में पढ़ते थे। उनकी बेटी नीरा आर्या छात्र जीवन में ही आजाद हिंद फौज के रानी झांसी रेजीमेंट से जुड़ गई थी और सेना के गुप्तचर विभाग के लिए काम करने लगी। इत्तिफाक से उसका विवाह श्रीकांत जय रंजन दास नामक जिस युवक से हुआ वह ब्रिटिश सेना के गुप्तचर विभाग में इंस्पेक्टर था। ब्रिटिश सरकार ने उसे नेताजी को जिंदा या मुर्दा पकड़ लाने का जिम्मा दिया था। जब नीरा के पति श्रीकांत को भनक लगी कि उसकी पत्नी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सेना में शामिल हैं तो उसने अपनी पत्नी की रेकी शुरू कर दी। इस तरह जल्द ही उसे सुभाष चंद्र बोस के ठिकाने का पता चल गया। एक दिन जब नीरा नेताजी से मिलने गई तो श्रीकांत ने उसका पीछा किया और मौका पाते ही नेताजी पर गोली चला दी। वह गोली नेताजी के ड्राइवर को लगी। नीरा आर्या ने आव देखा न ताव तुरंत संगीन निकाली और पति के सीने में उतार दी। नेताजी उसका त्याग और देश के प्रति समर्पण देखकर दंग रह गए।

ब्रिटिश हुकूमत ने नीरा आर्या को गिरफ्तार कर ब्रिटिश अधिकारी की हत्या के आरोप में मुकदमा चलाया और उसे काला पानी की सज़ा दे दी। जेल में उसे असहनीय यातनाएं दी गईं। यहां तक कि उसका स्तन तक काटने की कोशिश की गई। उसे प्रलोभन भी दिया गया कि यदि वह नेताजी का सुराग दे दे तो उसे छोड़ दिया जाएगा। लेकिन अपने पति तक की कुर्बानी देने वाली नीरा आर्या से कोई भेद उगलवा पाना आसान नहीं था।

आजाद हिंद फौज के गुप्तचर विभाग के चीफ पवित्र मोहन रॉय थे। नीरा आर्या आजाद हिंद फौज की पहली महिला जासूस थी। उसे यह जिम्मेदारी स्वयं नेताजी ने दी थी। बाद में उसने कई युवतियों को अपने साथ शामिल किया। नीरा आर्या ने अपनी एक आत्मकथा में लिखा है कि उनके साथ एक लड़की सरस्वती राजामणि थी। वह उनसे छोटी वर्मी युवती थी। उसे और नीरा आर्या को अंग्रेज अधिकारियों की जासूसी का जिम्मा मिला था। इसके लिए उन्होंने मर्दों का रूप धारण कर अंग्रेज अफसरों के घरों और मिलिट्री कैंपों की जासूसी की। यहां से मिलने वाली जानकारी वे नेताजी से साझा करती थीं।

एक दिन उनकी एक साथी दुर्गा थोड़ी चूक के कारण अंग्रेजों की पकड़ में आ गई। उसे छुड़ाने के लिए नीरा आर्या और राजामणि ने हिजड़े की वेशभूषा बनाई। जहां दुर्गा को बंदी बनाया गया था, वहां के अफसरों को धोखे से नशीली दवा खिला दी। इसके बाद अपनी साथी दुर्गा को लेकर भागे। तभी एक अंग्रेज सैनिक ने फायरिंग की, जिससे राजामणि के पैर में गोली लग गई। वे तीनों एक पेड़ पर चढ़ गए। अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें पकड़ने के लिए ऑपरेशन चलाया। वे तीन दिनों तक पेड़ पर ही पड़ी रहीं। बाद में किसी तरह आजाद हिंद फौज के बेस में लौटे।’

तीन दिन तक टांग में गोली लगी रहने के कारण दुर्गा हमेशा के लिए लंगड़ाने लगीं। लेकिन उनकी बहादुरी से खुश होकर नेताजी ने राजामणि को रानी झांसी ब्रिगेड में लेफ्टिनेंट और नीरा आर्या को कैप्टन का ओहदा दिया था।

स्वतंत्रता संग्राम की इस बहादुर सेनानी के जीवन के अंतिम दिन बेहद कष्ट में गुजरे। अपने जीवन यापन के लिए नीरा आर्या को फूल बेचने का काम करना पड़ा। हैदराबाद के फलकनुमा इलाके में एक झोपड़ी में उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी दिन बेहद गरीबी में काटे। 26 जुलाई 1998 को चारमीनार के पास उस्मानिया अस्पताल में उन्होंने दम तोड़ा। बताया जाता है कि एक स्थानीय पत्रकार ने अपने साथियों के साथ मिलकर उनका अंतिम संस्कार किया था।

इस तरह के जीवट स्वतंत्रता सेनानियों को आजाद भारत में कष्ट उठाना पड़ा यह बहुत शर्मिंदगी की बात है। हम से कम आजादी के प्लेटिनम जुबली वर्ष पर इस तरह के गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों को कम से कम श्रद्धांजलि अवश्य देनी चाहिए।

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