परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र सिंह यादव

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ज्यादातर वीर सैनिकों को शहादत के बाद मरणोपरांत परमवीर चक्र का सम्मान मिलता है। लेकिन भारतीय सेना के सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव एक ऐसे जांबाज सैनिक हैं जिन्हें कारगिल युद्ध में अपनी वीरता के कारण जीवित अवस्था में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। युद्ध के दौरान एक बार वे बुरी तरह घायल हो गए तो सांस रोककर मुर्दा होने का अभिनय किया। पाकिस्तानी सैनिक उन्हें मृत समझकर आपस में बातचीत करने लगे। उनकी बातचीत से पता चला कि वे भारत के बंकर को तबाह करने की योजना बना रहे थे। सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव के हाथ और पैर में गंभीर चोटें लगी थीं। वे खड़े हो पाने की हालत में नहीं थे। लेकिन पूरे साहस के साथ रेंगते हुए काफी दूर तक अपने अधिकारियों के पास पहुंचे और उन्हें दुश्मनों की योजना की जानकारी दी। अफसरों ने उनका प्राथमिक उपचार किया और दुश्मनों के मंसूबे को विफल करने की तैयारी कर ली।

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

उन्हें पहाड़ से नीचे लाया गया। घायल होने के कारण उन्हें अचानक कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। तीन दिनों तक उन्हें कुछ भी खाने-पीने को नहीं दिया गया। पानी तक देने में संकोच किया जा रहा था कि कहीं इससे नुकसान न हो जाए। बाद में ड़ाक्टरों ने पानी पिलाया। एक इंजेक्शन भी दिया। इसके बाद वे बेहोशी की हालत में चले गए। उन्हें जम्मू के सैनिक अस्पताल में ले जाया गया। फिर वहां से इलाज के लिए दिल्ली रेफर कर दिया गया। लंबे इलाज के बाद वे स्वस्थ हो सके।

यह घटना चार मई 1999 की है। रात के समय 21 भारतीय सैनिकों को  जम्मू-कश्मीर के द्रास-कारगिल क्षेत्र की सबसे ऊंची चोटी  टाइगर हिल पर कब्जे के लिए भेजा गया था। उनमें सात सैनिकों की एक टुकड़ी बाकी लोगों से आगे निकल गई और सबसे पहले शीर्ष चोटी पर पहुंच गई। 19 साल के सैनिक सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव सबसे पहले चोटी पर पहुंचने वाले उन 7 सैनिकों में शामिल थे।

 

5 मई 1999 की सुबह जब उनकी बटालियन 18 वीं टाइगर हिल चोटी पर पहुंची तो पाकिस्तानी सैनिकों से उनकी भिड़ंत हो गई। उनपर तीन बार हमले हुए। उस समय उनके पास न पर्याप्त हथियार थे, न गोला-बारूद। फिर भी वे पूरी बहादुरी के साथ लड़े। इस लड़ाई में भारत के 6 सैनिक शहीद हो गए। योगेंद्र सिंह यादव को भी कुल 17 गोलियां लगी थीं। वे बुरी तरह घायल हो गए थे  लेकिन उनकी जान बची हुई थी। पाक सैनिक जब करीब आए तो उन्होंने अपनी सांस रोककर मृत होने का अभिनय किया। मुर्दा की तरह पड़े-पड़े उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों की बातचीत सुन ली। उन्हें पता चला कि पाकिस्तानी सेना 500 मीटर डाउनहिल स्थित भारत की मध्यम मशीनगन पोस्ट पर हमला करने की योजना बना रही थी। योगेंद्र सिंह यादव ने इसकी सूचना पहुंचाकर अपने अधिकारियों को अलर्ट करना जरूरी समझा।

वे अभी सोच ही रहे थे कि इस बीच उनके पास दो पाकिस्तानी सैनिक आए और शहीद हो चुके सैनिकों पर गोलियां चलाना शुरू कर दिया। वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि कोई जीवित नहीं बचा है। उनकी एक गोली यादव के सीने में लगी और उन्हें लगा कि अब जीने की कोई उम्मीद नहीं बची है। तभी एक पाकिस्तानी सैनिक के पैर यादव के शरीर को छू गए और उन्हें अपनी जान बचे होने का अनुभव हुआ। योगेंद्र सिंह यादव ने अचानक एक हथगोला निकाला और उसे पाकिस्तानी सैनिक पर फेंक दिया। यह ग्रेनेड उसके जैकेट के हुड के अंदर उतरा और इससे पहले कि वह माजरा समझ सके विस्फोट में उड़ गया। इसके बाद यादव ने रेंगते हुए, एक राइफल उठाई और दुश्मन सैनिकों पर फायरिंग शुरू कर दी। उन्होंने जगह बदल-बदलकर फायरिंग की ताकि दुश्मन को यह लगे कि वहां एक से अधिक सैनिक हैं। इस अप्रत्याशित हमले से पाकिस्तानी सैनिकों में खलबली मच गई। उन्हें लगा कि भारतीय सेना की दूसरी बटालियन आ गई है। उनमें कुछ मारे गए। कुछ भाग गए।

इसके बाद वे कुछ मीटर रेंगकर पहुंचे और उन्होंने पाकिस्तानी सेना के अड्डे, उनके टैंक और उनकी मोटर की स्थिति का जायजा लिया। वह अपनी यूनिट को पूरी जानकारी देना चाहते थे, ताकि वह टाइगर हिल के रास्ते में अन्य सैनिकों को किसी भी तरह की दुर्घटना से बचा सके और टाइगर हिल पर भारत का कब्जा हो सके।

लेकिन आगे बढ़ने से पहले उन्होंने एक बार फिर इस बात की जांच की कि उनका कोई साथी जीवित बचा है क्या…। जब किसी के जीवित होने का कोई लक्षण नहीं दिखा तो उन्होंने अपना खुद का जायजा लिया। उन्होंने देखा कि उनका एक हाथ टूटा हुआ है। उन्होंने टूटे हाथ को पीठ की तरफ डाला और रेंगते हुए नीचे उतरने लगे। एक नाले के पास रेंगते हुए वे एक गड्ढे में उतर गए। यादव के जख्मों से बेतहाशा दर्द रिस रहा था इसके बावजूद वे अपने आत्मबल, कर्तव्यबोध और साहस के बल पर अपने आपको संभाले रखा था। वे सूचना देने तक अपनी तंद्रा बनाए रखना चाहते थे।

गड्ढे में उतरने के कुछ ही देर बाद भारतीय सैनिक वहां पहुंचे और उन्हें गड्ढे से निकालकर कमांडिंग ऑफिसर के पास ले गए। योगेंद्र यादव ने अपने कमांडिंग ऑफिसर को पाकिस्तानी साजिश की सूचना दे दी। इसके बाद वे बेहोश हो गए। उन्हें श्रीनगर के सैनिक अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां तीन दिन बाद उन्हें होश आया। बाद में उन्हें दिल्ली रेफर कर दिया गया। उनकी सूचना के जरिए भारतीय सेना को सटीक रणनीति तैयार करने में मदद मिली और  भारतीय सेना को बिना किसी नुकसान के टाइगर हिल पर भारत का झंडा लहराने में मदद मिली।

 

अगस्त 1999 में, नायब सूबेदार योगेन्द्र सिंह यादव को युद्ध के दौरान अनुकरणीय साहस और पराक्रम प्रदर्शित करने के नाते भारत के सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वे जीवित अवस्था में यह सम्मान प्राप्त करने वाले चंद सेना नायकों में शामिल हो गए। साथ ही वे इस सम्मान के सबसे कम उम्र के प्राप्तकर्ता बने। 26 जनवरी 2006 को तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने उन्हें यह पुरस्कार प्रदान किया।

 

योगेंद्र सिंह यादव उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के औरंगाबाद अहीर गांव के रहने वाले हैं। वे मात्र साढ़े सोलह वर्ष की आयु में भारतीय सेना में शामिल हो गए थे। उनके अंदर देशभक्ति का प्रबल जज्बा है। उन्हें देश के विभिन्न इलाकों में आज भी बुलाया और सम्मानित किया जाता है। वे युवा पीढ़ी का प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं।

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