बिहार की ग्रामीण महिलाओं के शुरू कर दी कोरोना माई की पूजा

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

खबरें सिर्फ सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होतीं। उससे कहीं ज्यादा गति से कानों-कान वायरल होती हैं। बिहार के ग्रामीण इलाकों में अभी एक नई देवी के प्रकट होने की कथा तेज़ी से वायरल हो रही है। वह देवी हैं कोरोना माई। उनके संबंध में कई कथाएं प्रचलित हो गई हैं। एक कथा के मुताबिक घास गढ़ती महिलाओं के समक्ष एक गाय देवी के रूप में परिणत हो गई और पूजा अर्चना करने, भोग चढ़ाने का निर्देश देकर चली गईं। बस गांव-गांव में कोरोना मी की पूजा होने लगी। न कोई मंत्र, न कोई निर्धारित विधान। बस देवी से रक्षा की गुहार लगाई जाने लगी।

दुनिया के लिए भले ही कोराना चीन के बुहान शहर में पैदा होनेवाला एक जानलेवा वायरस मात्र हो लेकिन बिहार की ग्रामीण महिलाओं के लिए वह आस्था का प्रतीक बन गया है। दुनिया भर के वैज्ञानिक अभी तक कोरोना वायरस की वैक्सीन नहीं बना सके लेकिन बिहार की ग्रामीण महिलाओं ने कोरोना का इलाज ढूंढ निकाला है। वे पूजा अर्चना के जरिए कोरोना माई को प्रसन्न कर रही हैं। पूजा का विधान भी बहुत सरल है। महिलाएं नौ लड्डू और नौ लौंग लेकर किसी बंजर जमीन पर जा रही हैं। फूल, सिंदूर चढ़ाकर पूजा करती हैं। गड्ढा खोदती हैं और कोरोना माई रक्षा करो कहकर उसे श्रद्धापूर्वक गाड़ दे रही हैं। इसके लिए न कोई मंत्र है न किसी पुजारी की जरूरत। कहीं-कहीं छठ पूजा की तरह अर्ध्य देकर कोरोना माई की पूजा की जा रही है।

कोरोना माई के प्रकट होने की घटना किस गांव की है किसी को पता नहीं लेकिन यह खबर पारंपरिक तरीके से वायरल हो गई है और विभिन्न गावों में कोरोना माई की पूजा होने लगी है। इन महिलाओं को किसी वैक्सीन का, किसी काढ़े का, किसी दवा का इंतजार नहीं है। दुनिया भर के कितने वैज्ञानिक, कितनी कंपनियां इसका वैक्सीन बनाने में लगी हैं, उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है। उन्हें पता है कि जिस तरह उन्होंने चेचक को छोटी माता, बड़ी माता के रूप में स्वीकार किया था, उसी तरह कोरोना माता अवतरित हुई हैं और भोग चढ़ाने पर वे रक्षा करेंगी। यह ग्रामीणों का अपना ईजाद है। इसमें ब्राह्मणवादी कर्मकांड का कोई योगदान या हस्तक्षेप नहीं है। अभी शुरुआत है। बाद में कोरोना पूजा क्या स्वरूप ग्रहण करेगा, कोई नहीं जानता।

पढ़े-लिखे आधुनिक लोग इसे अंधविश्वास कह सकते हैं लेकिन यही अंधविश्वास उन्हें मानसिक अवसाद की स्थिति में जाने से बचा रहा है। कोरोना की कोई दवा तो है नहीं। जांच के भरोसेमंद उपकरण भी नहीं हैं। एक मशीन प़जिटिव परिणाम देती है तो दूसरी मशीन निगेटिव करार देती है। इलाज अथवा बचाव के जो भी उपाय किए जा रहे हैं सब भगवान भरोसे चल रहे हैं। अनिश्चितता के कारण पूरी दुनिया में मानसिक अवसाद और सामूहिक तनाव के मामले बढ़ रहे हैं। आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। पति पत्नी की हत्या कर रहा है। मां बच्चों को लेकर नदी में कूद जा रही है। पत्नी पति को कुल्हाड़े से मार दे रही है। चारो तरफ मनोवैज्ञानिक समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे में अगर बिहार की ग्रामीण महिलाएं अंधविश्वास के जरिए ही अपने अंदर आशाओं का संचार कर ले रही हैं। अपने ऊपर नकारत्मकता को हावी होने से रोक ले रही हैं तो अंधविश्वास की अवधारणा पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। इसे पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। जो स्वयं को आधुनिक समझते हैं। जो वैज्ञानिक सोच में विश्वास रखते हैं। उनके पास इस संकट के समय अपनी मनःस्थिति को सामान्य और सोच को सकारात्मक रखने का कोई जरिया नहीं है। वे देश दुनिया में संक्रमण के आंकड़े देख रहे हैं। वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल की रिपोर्टों पर नज़र दौड़ा रहे हैं। लेकिन इस महामारी पर जितना चिंतन कर रहे हैं उतना ही मानसिक संताप झेल रहे हैं।

जिन ग्रामीण महिलाओं ने कोरोना माई को जन्म दिया है, वे गरीब वर्ग की हैं। कोरोना की जांच के लिए 4500 रुपये खर्च करने की स्थिति में नहीं है। इलाज निकल भी आए तो वे अपना इलाज करा पाने की स्थिति में नहीं हैं। उनकी दुनिया एक खास दायरे तक सीमित है। राज्य और केंद्र सरकार को भी उनकी कोई चिंता नहीं है। उन्हें पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं कराई गई हैं। ऐसे में उनके लिए उनकी आस्था ही जीने का एकमात्र साधन है। चाहे वह अंधी हो अथवा वैज्ञानिक। हम इसे अंधविश्वास कहकर सिरे से खारिज नहीं कर सकते है। उनके ग्रामीण देवता हों, कुलदेवता हों या पीपल तथा बरगद के पेड़ पर रहने वाले ब्रहम बाबा। ये सभी उनके मनोवैज्ञानिक चिकित्सक हैं। उनके अंदर सकारात्मक ऊर्जा भरने के स्रोत हैं, यह उनकी आस्था का एक आयाम है जिसे खारिज़ नहीं किया जा सकता।

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