घाटी में आतंकवाद का बदलता चेहरा

धार्मिक उन्माद पर क्षेत्रीयतावाद का तड़का

0 98

-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

श्रीनगर। घाटी में आतंकवाद का नया रूप सामने आया है। अपनी बदली हुई रणनीति के तहत वे सुरक्षा बलों पर हमला करने की जगह गैरकश्मीरियों की हत्या कर रहे हैं। इस्लाम का नाम लेने की  जगह क्षेत्रीय अस्मिता का नारा लगा रहे हैं। वे घाटी को कश्मीरी पंडितों और गैरकश्मीरियों से मुक्त कराने का प्रयास कर रहे हैं। हाल में पीपुल्स एंटी फासिस्ट फ्रंट नामक संगठन ने आठ मिनट का वाडियो जारी कर हालिया हमलों की जिम्मेदारी ली है। यह शब्दावली इस्लाम की नहीं, वामपंथ की है। पाकिस्तान में चीन की दखल बढ़ने के बाद इस शब्द के मायने क्या हैं, अभी इसका खुलासा नहीं हुआ है। इंटेलिजेंस एजेंसियों ने सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं दी है। उस लिहाज से जम्मू-कश्मीर में गैर कश्मीरी लोगों और पंडितों की निरंतर हत्या को मात्र पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमला कहकर नहीं निकला जा सकता। मामले को नए सिरे से देखने की जरूरत है।

हो सकता है यह कश्मीरी जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त कर घाटी को पूरी तरह हरे रंग में रंगने की साजिश हो। संभव है इनके जरे चीन और पाकिस्तान कश्मीर को सिर्फ कश्मीरी मुसलमानों तक सीमित कर देना चाह रहे हों। हालांकि फिलहाल सुरक्षा बलों को हिंसा प्रभावित क्षेत्रों की जनता का खुला समर्थन मिल रहा है।  तमाम मस्जिदों से लोगों को सुरक्षा बलों के अभियान का नैतिक समर्थन देने का आह्वान किया जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि सरकारी निर्देशों का प्रसारण किया जा रहा है। सुरक्षा बलों को संदिग्ध गतिविधियों की सूचना तुरंत मिल जा रही है। आतंकी संगठन क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं लेकिन सफल नहीं हो पा रहे हैं। गौर करने की बात है कि अब वे इस्लाम की नहीं कश्मीरी अस्मिता की दुहाई दे रहे हैं। फिर भी अभी उन्हें स्थानीय लोगों के घरों में शरण नहीं मिल पा रही है। लेकिन उनके समर्थक नहीं हैं ऐसा भी नहीं है। घाटी की आबादी में कुछ लोग तो हैं जो उनके शिकार का पता बता रहे हैं। व्यापक जन-समर्थन नहीं मिल पाने के कारण आतंकियों को घने जंगलों में छुपना पड़ रहा है। भारतीय सेना उनकी स्थिति को बखूबी समझ रही है। इसीलिए गावों से लेकर पहाड़ों और जंगलों तक में उनकी तलाश कर रही है। सेना का संकल्प है कि एक भी आतंकी को बचकर निकलने नहीं देगी। यही कारण है कि आए दिन मुठभेड़ें हो रही हैं। दोनों तरफ के लोग मारे जा रहे हैं। हिंसा का यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा कोई नहीं जानता।

इसमें कोई संदेह नहीं कि सेना घाटी में अपना काम बखूबी कर रही है लेकिन गैर-कश्मीरी लोगों को सुरक्षा का भरोसा नहीं हो पा रहा है। कश्मीर की अर्थ व्यवस्था में प्रवासी मजदूरों की लंबे समय से भागीदारी रही है। आमतौर पर वे मार्च में आते हैं और नवंबर तक वापस लौटते हैं। इसबार आतंकी हमलों के कारण वे निर्धारित समय से एक महीने पूर्व ही वापस लौटना चाह रहे हैं। आतंकियों की इस रणनीति के कारण बाद के दिनों में यदि क्षेत्रीयतावाद का कोई उभार आया भी तो घाटी में शारीरिक श्रम की आवश्यकता की पूर्ति मुश्किल होगी। कोई भी संगठन इसकी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर सकेगा। अभी रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंडों पर गैर-कश्मीरियों के पलायन के दृश्य आम हो रहे हैं। पुलिस ने डरे सहमे लोगों को अपनी बैरकों में शरण लेने की अपील की है। लेकिन वे घर वापस लौटने को बेचैन हैं। सेना के अभियान के कारण हिंसा प्रभावित इलाकों में लोगों को घरों के अंदर ही रहने का आदेश जारी किया गया है। सड़कों पर सिर्फ सुरक्षा बलों का पहरा है या उनके गश्ती वाहनों की आवाजाही । इस लिहाज से देखें तो आतंकी संगठन कश्मीर में खौफ का माहौल बनाना में एक हद तक सफल रहे हैं। वे जिंदा वापस भले न लौट पाएं। सुरक्षाकर्मियों की गोलियों का शिकार हो जाएं। लेकिन वे आबादी के एक हिस्से के अंदर भय का माहौल बनाने में सफल रहे हैं। अगर इसकी काट नहीं की गई, मजदूरों के पलायन को रोका नहीं गया तो धीरे-धीरे आतंकियों की कोशिश अपने प्रभाव क्षेत्र का दायरा बढ़ाने की होगी। संभव है इसके अगले चरण वे कोई राजनीतिक दल बनाकर संसदीय राजनीति में दखल देने की कोशिश करें। गृहमंत्री अमित शाह ने पाकिस्तान को सुधर जाने अथवा सर्जिकल स्ट्राइक झेलने को तैयार रहने की चेतावनी दी है। लेकिन उसके सुधरने के आसार नहीं दिख रहे हैं। पाकिस्तान एक आत्मघाती देश है। खुद को नुकसान पहुंचाकर भी अगर वह अगले को नुकसान पहुंचा सकता है तो इसमें पीछे नहीं हटेगा। वह खुशी से आत्मघात कर सकता है। आतंकी संगठनों की बदली हुई रणनीति को देखते हुए सुरक्षा बलों को अपनी रणनीति की समीक्षा करनी होगी। प्रवासी मजदूरों को रोकना संभव नहीं भी हुआ तो कश्मीरी अवाम के भरोसे को हर हाल में कायम रखना होगा। कोई भी बड़ी सैन्य कार्रवाई करने से पूर्व एलओसी को साथ एलएसी पर भी मोर्चेबंदी करनी होगी। तालिबान, पाकिस्तान, चीन और रूस के संबंधों पर सूक्ष्म निगाह रखनी होगी। यह विश्व समुदाय के सहयोग से आतंकवाद के ताबूत में अंतिम कील ठोकने का समय है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

%d bloggers like this: