कहां सो रहे थे कलम के सिपाही

ग़ज़ल

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-देवेंद्र गौतम

 

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

तबाही… तबाही… तबाही… तबाही.

ये किस मोड़ पर आ गए हम इलाही!

 

मिटाई गई कैसे हर्फे-हक़ीकत

कहां सो रहे थे कलम के सिपाही.

 

कभी बादशाही के अंदर फकीरी

फकीरी के अंदर कभी बादशाही.

 

पता मंज़िलों की बताता है हमको

न रहबर दिखाता है अब रास्ता ही.

 

यक़ी कौन करता है किसकी ज़बां पर

भला कौन देता है किसकी गवाही.

 

न फूलों की खुश्बू बची है सलामत

न गुलशन में बाकी है ताज़ा हवा ही.

 

निगाहे-करम की जरूरत किसे है

बुलंदी पे लाई तेरी कम-निगाही.

 

कड़ी धूप में भी चला जा रहा है

वो अनजान रस्तों का अनजान राही.

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