महाराष्ट्र पर विधवा विलाप बंद करे गोदी मीडिया

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

मीडिया का एक खेमा बार-बार उद्धव ठाकरे के हिंदुत्व पर तंज़ कस रहा है। उसे गिरवी रख देने की बात कर रहा है। उसे शिवसेना की विचारधारा अथवा बाला साहब की नीतियों की आखिर इतनी चिंता क्यों हैं, इसे समझने की जरूरत है। भारत में विपरीत विचारधारा वाले दलों की साझा सरकार पहली बार नहीं बनी है। बिहार में समाजवादी पृष्ठभूमि के नीतीश कुमार और भाजपा की साझा सरकार चल रही है। झारखंड में आजसू और भाजपा की साझा सरकार बनी थी। तो क्या नीतीश ने सांप्रदायिक शक्तियों के सामने समर्पण कर दिया या आजसू ने भगवा चादर ओढ़ ली। भाजपा ने पीडीपी के साथ जम्मू-कश्मीर बनाई तो क्या भाजपा ने इस्लाम धर्म कुबूल कर लिया या पीडीपी हिंदुत्व की मुरीद हो गई। विपरीत विचारधारा के लोग जब सरकार बनाने हैं तो विचारधारा का आदान प्रदान करते न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत सरकार चलती है।

गोदी मीडिया की चिंता दरअसल यह नहीं है। उनकी चिंता यह है कि शिवसेना ने मोदी और अमित शाह से अलग राह क्यों अपनाई। अपनी जिद पर क्यों अड़ी रही। उसे भाजपा के समक्ष नतमस्तक होकर रहना चाहिए था। जो मिल रहा था उसे कुबूल करना चाहिए था। गोदी मीडिया को देश की आर्थिक राजधानी भाजपा के हाथ से निकल जाने की खीज़ है जिससे वह उबर नहीं पा रहा है। कभी कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता का रास्ता छोड़ देने की बात कर रहा है तो कभी शिवसेना के धर्मनिरपेक्ष हो जाने की बात कर रहा है। तरह-तरह से अपनी बौखलाहट का प्रदर्शन कर रहा है। समस्या यह है कि पत्रकारों की यह पीढ़ी राजनीतिक घटनाक्रम का तटस्थ दर्शक नहीं बने रह सकती। उसे किसी एक पक्ष का पैरोकार बन जाना है। उसके हर कर्म, दुष्कर्म को सही ठहराना है। उसकी नीतियों और फैसलों की समीक्षा करने की कोई जरूरत नहीं समझती। वह जिसका पक्ष ले उसके हर कदम की सराहना करना, उनकी गलतियों पर पूरी बेशर्मी के साथ पर्दा डालना और अच्छे कार्यों को खूब बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना अपना परम पुण्य कर्तव्य मान बैठता है। ऐसे लोगों को पत्रकार तो कत्तई नहीं माना जा सकता। उन्हें चारण भट्ट जरूर कहा जा सकता है।

हाथ में आते-आते महाराष्ट्र की सत्ता फिसल जाने से देवेंद्र फडणवीस, नरेंद्र मोदी और अमित शाह दुःखी अवश्य होंगे। होना बी चाहिए। लेकिन उनके समर्थक गोदी मीडिया पत्रकार तो छातियां पीट-पीटकर अपनी हताशा का प्रदर्शन कर रहे हैं। महाराष्ट्र में एक राजनीतिक प्रयोग हुआ है। इसका फलाफल तो आने देते। पत्रकार यदि पत्रकारिता की भूमिका में रहते तो ज्यादा उचित था लेकिन वे तो भविष्यवक्ता की भूमिका में आ चुके हैं। वे दहाड़ें मार-मार कर बोल रहे हैं कि छह महीने से ज्यादा यह सरकार नहीं चलेगी। अमित शाह खामोश नहीं बैठेंगे। भाजपा सत्ता में वापस लौटेगी। किसी दूसरे दल की सरकार को नहीं चलने देना। किसी तरह जोड़-तोड़ कर सरकार बना लेना, क्या इसे काबलियत माना जाना चाहिए, इसकी प्रशंसा की जानी चाहिए? हद है। इसे पत्रकारिता नहीं चाटुकारिता कहते हैं। गोदी मीडिया की आंखों में जरा सी भी शर्म बची है तो विधवा विलाप बंद करे और महाराष्ट्र के राजनीतिक घटनाक्रम पर नज़र रखे। उसका निष्पक्ष विश्लेषण करे। अन्यथा रही सही विश्वसनीयता भी खत्म हो जाएगी। चौथे खंभे पर जनता का भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। आपातकाल में पत्रकारों ने अपनी गरिमा को नहीं गिराया था। अब तो सत्ता के तलवे चाटने पर उतर आया है। चंद लोगों के चलते पूरा पत्रकार जगत बदनाम हो रहा है।

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