पब्लिक सेक्टर के बाद कृषि क्षेत्र भी मित्रों के हवाले

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

देश के किसान सड़कों पर हैं। आंदोलित हैं और सरकार कान में रूई डालकर बैठी हुई है। वह तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को जबरन लागू करने पर अड़ी है। सरकार ने अपनी पूरी मशीनरी किसानों को यह समझाने में लगा दी है कि यह कानून उनकी बेहतरी के लिए है। लेकिन किसान नेताओं को गले से सरकार के तर्क नीचे नहीं उतर पा रहे हैं। उनका मानना है कि यह कानून कार्पोरेट सेक्टर के दबाव में बनाए गए हैं। कोविड-19 के चलते देश में भय का माहौल है और इसी बीच मोदी सरकार ने कृषि मंडी, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और जरूरी वस्तु संशोधन अध्यादेश जारी कर दिए। फिर इन्हें दोनों सदनों से पारित कराकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से कानून बनवा लिया। राज्यसभा में मत विभाजन की मांग करने के बावजूद ध्वनि मत से जबरन पारित करवाया गया। इस बात को लेकर राज्यसभा के उप सभापति पूर्व पत्रकार हरिवंश भी फजीहत का सामना करना पड़ा।

केंद्र सरकार का दावा है कि इन कानूनों से किसानों की आय दुगनी करने का लक्ष्य पूरा हो जाएगा। इन कानूनों से किसान देश में किसी भी जगह अपनी उपज़ बेच सकेगा। मगर, एक भी किसान संगठन सरकार की बात से सहमत नहीं है। देश में ज्यादातर छोटी जोत के किसान हैं। उन्हें फसल कटने के साथ ही नकदी की जरूरत पड़ती है। उनकी इतनी उपज नहीं होती कि देश के एक कोने से दूसरे कोने में बेचने के लिए ले जाएं। वे अपनी उपज का भंडारण कर बाजार में तेज़ी आने का इंतजार नहीं कर सकते। आरएसएस के साथ जुड़ा भारतीय किसान संघ भी सरकार के तर्क से सहमत नहीं है। प्रधानमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री के नाम संघ के राष्ट्रीय महासचिव ने गत 22 सितंबर को पत्र लिखा है। इसके बाद किसान संघ की 15 हज़ार इकाइयों ने कानूनों में संशोधन की मांग वाले प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेज दिए हैं।

इस मौके पर राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ सहित देश के सभी 600 किसान संगठन साझा आंदोलन करने के लिए आपस में सहमति बनाने का प्रयास कर रहे  हैं। देश के 18 राज्यों में किसान रैली और सभाएं करके इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं लेकिन पंजाब में किसानों का आंदोलन सबसे ज्यादा जुझारू है। वहां अंबानी और अडानी की कंपनियों का भी बहिष्कार किया जा रहा है। उनके पेट्रोल पंप और मॉल से खरीदारी बंद है। आंदोलनकारी बड़ी संख्या में लगातार कारपोरेट घरानों खासतौर पर अडानी और अंबानी के पेट्रोल पंप और अन्य कारोबारों के बाहर धरने पर बैठे हुए हैं। राज्य के 31 किसान संगठन आपसी सहमति से आंदोलन करने को राजी हुए हैं। इसके बाद हरियाणा, राजस्थान, केरल आदि हैं।

शुरू में शिरोमणि अकाली दल ने कृषि अध्यादेशों को किसानों के लिए हितकर बताया। इसपर किसान संगठनों ने अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के घर तथा भाजपा के नेताओं के घरों के स्थायी घेराव का एलान कर दिया। पंथक वोट के बाद किसान वोट खिसकने के चलते अकाली दल को यू-टर्न लेना पड़ा। दल ने अपनी अकेली मंत्री हरसिमरत कौर बादल को इस्तीफ़ा देने को कहा और साथ ही करीब 27 वर्ष से बिना शर्त समर्थन देती आ रही देश की इस अकेली पार्टी ने राजग से भी नाता तोड़ लिया। अब अकाली दल इन कानूनों को किसानों और संघीय ढांचे के विरोध में बता रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिंह को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाना पड़ा। इसमें भाजपा के दो विधायक गैरहाजिर रहे और बाकी सभी दलों के विधायकों ने सर्वसम्मति से संविधान के आर्टीकल 254 (2) के तहत मिली ताकतों का इस्तेमाल करते हुए केंद्रीय कानूनों में संशोधन वाले बिलों को पारित किया और राज्यपाल के पास जाकर इन बिलों को राष्ट्रपति को भेजने की अपील की।

केंद्र सरकार ने किसान संगठनों को बातचीत के लिए बुलाया लेकिन किसी मंत्री के बैठक में ना होने के कारण किसानों का गुस्सा और बढ़ गया। हरियाणा के किसानों ने जेजेपी के नेता दुष्यंत चौटाला से उपमुख्यमंत्री का पद छोड़ने का दबाव बनाना शुरू किया हुआ है। पंजाब में तो केंद्र ने रेल बंद करने का एलान किया और राष्ट्रपति से समय ना मिलने के विरोध में कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने खुद जंतर मंतर पर धरना दिया। अकाली दल और आप के विधायकों ने दिल्ली न जाने का फैसला किया।

सवाल है कि कोरोनाकाल के कौरान कृषि अध्यादेश लाने की ऐसी क्या जल्दबाजी थी? इससे पहले किसान संगठनों या राजनीतिक दलों के साथ बातचीत करना जरूरी क्यों नहीं समझा गया? सरकार जबरदस्ती इन कानूनों को लागू करने पर आमादा क्यों है? असल में यह कानून कॉरपोरेट घरानों के लिए ही लाए गए हैं।  यह इत्तेफाक तो नहीं है कि अडानी ने कानून बनने से पहले ही अपने गोदामों की संख्या बढ़ाना शुरू कर दिया था और मुकेश अंबानी बिग बाजार की डील फाइनल कर चुके थे। इन कानूनों को बनाने के दौरान राज्यों के अधिकारों को नज़रअंदाज़ किया गया। कृषि, जमीन और राज्यों के भीतर का व्यापार राज्य का विषय है। इसके अलावा अभी तक कृषि एक पेशा मानी जाती है। केंद्र सरकार ने जिस सातवें शैड्यूल की एंट्री 33 का सहारा लेकर कानून बनाए हैं, उनके मुताबिक अब खेती वाणिज्य और व्यापार के वर्ग में आ गई है।

अब तक केंद्र सरकार ने कृषि उपज़ की बिक्री के संबंध में 2003 और 2017 में मॉडल एक्ट बनाए थे। राज्य सरकारों को इनके मुताबिक अपने कृषि उपज़ मार्किट कमेटी कानूनों में संशोधन करने को कहा जाता रहा है। अब तक कृषि उपज़ केवल उन मंडियों में बेची जा सकती थी जो राज्य सरकार की ओर से अधिसूचित की जाती थी। इनके रखरखाव के लिए सरकार को टैक्स लगाने का अधिकार था। लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन करवानी भी जरूरी थी। नये कानून के मुताबिक केवल पेन कार्ड के जरिए कोई भी व्यक्ति, कंपनी या फर्म कहीं से भी कृषि उपज़ खरीद सकेगी और इसके लिए एक पैसा भी टैक्स नहीं देना पड़ेगा। इससे यह तर्क निकलना स्वाभाविक है कि सरकार धीरे-धीरे पंजाब, हरियाणा और कई अन्य राज्यों से गेहूं-धान की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर हो रही खरीद बंद करना चाहती है। यही सिफारिश कृषि लागत और मूल्य आयोग कई सालों से आपनी रिपोर्टों में करता आ रहा है। शांता कुमार कमेटी की यही सिफारिश है। कृषि में ठेका प्रणाली के कानून की सभी शर्तें कंपनियों के पक्ष में हैं। किसान स्वामीनाथन रिपोर्ट के मुताबिक सभी फसलों का समर्थन मूल्य और खरीद की गारंटी मांग रहा है। जरूरी वस्तुओं के संशोधन कानून के मुताबिक कारपोरेट घरानों को जमाखोरी करने की छूट दे दी गयी है, जिससे महंगाई आसमान छू सकती है। देश के गरीबों के सामने रोटी का मसला और भी विकराल रूप ले सकता है। इस देश के करोड़ों किसानों की सहमति के बिना कानून थोप देना गैर-लोकतांत्रिक और राज्यों की नाराजगी के बावज़ूद सुनवाई ना करना सहकारी संघवाद के खिलाफ है। लेकिन मोदी सरकार जो तय कर लेती है उसे जबरन लागू करती है चाहे वह देश और देशवासियों के लिए कितना भी विनाशकारी क्यों न हो। पिछले छह वर्षों से यही हो रहा है और संभवतः 2024 तक यही रवैया जारी रहेगा।

 

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