यश की जगह अपयश कमा लाए बाबा रामदेव

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि आयुर्वेद विवादों के घेरे में हैं। उन्होंने कोरोना की दवा दवा बनाई लेकिन इतनी गोपनीयता बरती कि उसके लिए विधिवत लाइसेंस तक नहीं लिया। उत्तराखंड आयुर्वेद विभाग के लाइसेंसिंग ऑफिसर का कहना है कि पतंजलि आयुर्वेद ने कफ, बुखार और इम्युनिटी की दवा के लाइसेंस के लिए आवेदन दिया था। उसके आवेदन में कोरोना महामारी का कहीं जिक्र नहीं था। इस लाइसेंस पर बनी दवा को कोरोना की दवा के रूप में प्रचारित करना गलत है। उत्तराखंड और राजस्थान की सरकारों ने बाबा रामदेव की कंपनी के खिलाफ नोटिस भेजने और मुकदमा दर्ज कराने की बात कही है। उन्होंने काम यश का किया लेकिन अपनी ही गलती के कारण अपयश का भागी बन गए।

बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने कोरोना के इलाज के लिए कोरोनील नामक दवा लांच की है और तीन दवाओं के एक किट के जरे कोरोना का शत प्रतिशत इलाज का दावा किया है। देश की बड़ी आयुर्वेद कंपनी होने के नाते पतंजलि को किसी बीमारी पर शोध करने और दवा बनाने का अधिकार है। दुनिया की 100 से ज्यादा कंपनियां कोरोना की वैक्सीन या दवा बनाने में लगी हैं। की कंपनियां दवा बना चुकी हैं और उनकी दवा का परीक्षण चल रहा है। दवा बनाने में कोई समस्या नहीं है। लेकिन इसकी कुछ औपचारिकताएं हैं। कुछ प्रक्रियाएं हैं जिनका पालन करना होता है। बाबा रामदेव ने इनका पालन नहीं किया और अचानक दवा लांच कर दुनिया को चौंका देने की कोशिश की। इस कोशिश में मामला फंस गया। अगर उनकी दवा सचमुच कोरोना के इलाज में रामवाण का काम करती है तो भी फिलहाल इसका लाभ न उनकी कंपनी को मिलने जा रहा है और न कोरोना पीड़ित मरीजों को। नए सिरे से औपचारिकताएं पूरी करने में कितना समय ज़ाया होगा कहना कठिन है। परीक्षण कई चरणों में होता है जिसमें कई महीने लग सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनुमति भी जरूरी है।

पतंजलि ने सबसे पहले कोरोना की दवा बनाई, पूरे विश्व में आयुर्वेद का सिक्का जमाने की तैयारी कर ली लेकिन जरा सी गलती के कारण अपनी कंपनी और अपने देश को श्रेय मिलने के बेहतरीन अवसर को गवां दिया। देश में फिलहाल नरेंद्र मोदी की सरकार है जिसका रुख उनके प्रति नरम रहता है। लेकिन सरकार की मोर्चों पर जंग लड़ रही है। एक तरफ चीन, पाकिस्तान और नेपाल के साथ सीमा विवाद और दूसरी तरफ देस में कोरोना का विकराल होता कहर। बाबा रामदेव की दवा की लाइसेंसनिंग और परीक्षण में वह कितना मददगार हो सकेगी कहना कठिन है। जबतक औपचारिकताएं पूरी नहीं होतीं और दवा उत्पादन के लिए हरी झंडी नहीं मिल जाती, जितनी मात्रा में दवा का उत्पादन हो चुका है वह गोदाम में पड़ी रहेगी। इत्तेफाक से यदि ट्रायल में दवा फेल हो गई तो सारा पैसा पानी में। पतंजलि की साख पर अलग से नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इतनी बड़ी कंपनी का संचालक होने के बाद भी बाबा रामदेव इतनी बड़ी महामारी की दवा बनाने में इतनी दस्तावेज़ी लापरवाही कैसे कर बैठे कि सारे किए कराए पर पानी फिरने की नौबत आ गई, समझ से परे है।

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