भाजपा सरकार को सामाजिक दूरी की दरकार

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

कोरोनाकाल में सबसे ज्यादा बार जिस शब्द को दुहराया गया वह है सोशल डिस्टेंसिंग यानी सामाजिक दूरी। अब कुछ लोग इसकी जगह फिजिकल डिस्टेंसिंग यानि शारीरिक दूरी शब्द का इस्तेमाल करने लगे हैं। दोनों के अर्थ में काफी अंतर है। सोशल डिस्टेंसिंग का मतलब है समाज के विभिन्न समुदायों के बीच दूरी, मनमुटाव, हिंसक टकराव। यह दूरी तो भारत में कोरोनाकाल से बहुत पहले से बल्कि हमेशा से रही है। मनुस्मृति के वर्णाश्रम में शूद्रों के साथ अन्य वर्णों की दूरी बनाकर रखी गई जिसका एक हद तक आज भी पालन हो रहा है। ब्रिटिश सरकार की नीति ही थी- बांटो और राज करो। भारतीय राजनीति आज भी अंग्रेजों की उसी नीति पर चल रही है। राष्ट्रीय एकता का नारा खूब दिया जाता है लेकिन व्यवहार में ठीक इसके उल्टा आचरण किया जाता है। उत्तर भारत के राज्यों में तो चुनावों के दौरान जातीय समीकरण की खुलकर चर्चा की जाती है। इसी आधार पर जीत-हार का अनुमान लगाया जाता है। हालांकि कोई राजनीतिक दल वर्ण अथवा जाति के आधार पर सामाजिक दूरी के पक्ष में नहीं रहा। भले वोटों का गणित साधने के लिए इसके इस्तेमाल से गुरेज़ भी नहीं किया लेकिन सैद्धांतिक रूप से वर्णगत सोशल डिस्टेंसिंग का विरोध करता रहा। आजादी के बाद आधुनिक विचारों के प्रभाव के कारण भारत में यह सामाजिक दूरी काफी हद तक कम हुई है। छुआछूत के मामले कभी कभार सामने आते भी हैं तो सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से या कस्बों से। बड़े शहरों और महानगरों में कोई किसी की जाति नहीं पूछता। ढाबे में बगल की कुर्सी पर कौन बैठा है या उसका रसोइया किस जाति का है कोई नहीं पूछता।

राजनीति में जरूर अगड़े, पिछड़े, दलित, आदिवासी, लोकल, बाहरी आदि के आधार पर समाज को बांटने और उनके बीच के अंतर्विरोधों को बढ़ाने का काम किया जाता है। इससे पार्टी का जनाधार और वोट बैंक तैयार करने में मदद मिलती है। 90 के दशक में जब त्तकालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए मंडल आयोग लागू किया था तो भारतीय समाज में पिछड़ों और अगड़ों के बीच तकरार चरम पर पहुंच गई थी। समाजवादी पृष्ठभूमि के क्षेत्रीय दलों ने अग़ड़े-पिछड़े का खूब इस्तेमाल किया। बिहार में लालू प्रसाद ने नारा दिया था-भूरा बाल साफ करो। अर्थात भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला यानी कायस्थ को साफ कर दो। बिहार में यही चार जातियां अगड़ी मानी जाती हैं। अगड़ी जातियों के अंदर भी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में राजपूत और भूमिहार अथवा ब्राह्ण के बीच लंबे समय से लड़ाई चलती रही है। इस लड़ी में सैकड़ों हत्याएं हो चुकी हैं। अभी योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रित्व काल में एनकाउंटर के नाम पर इसी जातीय युद्ध को बढ़ाने का आरोप लगाया जा रहा है। वीपी सिंह के मंडल धमाके ने जब जातीय युद्ध को तेज़ कर दिया तो  उस समय भारतीय जनता पार्टी ने जरूर धर्म के आधार पर हिंदू एकता की बात की थी और मंडल की जगह कमंडल का नारा दिया था। भाजपा ने जातियों में बंटे हिंदू समाज को एकजुट कर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की थी। तभी से हिंदू-मुसलमान के बीच सामाजिक दूरी बढ़ाने और उन्हें आपस में लड़ाने की भरपूर कोशिश की जाती रही। 2014 के बाद इसे अपने चरम तक पहुंचा दिया गया। सोशल डिस्टेंसिंग दरअसल भाजपा की राजनीति का अहम हिस्सा है।

भाजपा नेताओं के अचेतन मस्तिष्क में भी सामाजिक दूरी की भावना पूरी गहराई के साथ मौजूद है। यही कारण है कि जब कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने की बात आई तो सत्ता में बैठे भाजपा नेताओं ने शारीरिक दूरी की जगह सामाजिक दूरी का पालन करने का आह्वान किया। मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग को कोरोना से जंग का मुख्य हथियार करार दिया। धार्मिक आधार पर यह दूरी तो पिछले छह वर्षों के अंदर इतना ज्यादा बढ़ाई जा चुकी है कि देश का माहौल ही जहरीला हो चला है। सोशल मीडिया में नफरत का गर्म लावा निरंतर प्रवाहित किया जा रहा है और सत्तातंत्र भी कहीं न कहीं इसे संरक्षण देता प्रतीत होता है। मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी सुबह से रात तक सोशल डिस्टेंसिंग बढ़ाने में लगा रहता है। इसका कोरोना से कुछ लेना-देना नहीं है। कोरोना से बचाव के लिए शारीरिक दूरी की जरूरत है सामाजिक दूरी की नहीं। सत्ता की राजनीति में जरूर इसकी भूमिका हो सकती है।

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