भाजपा ने पार्टी विथ डिफरेंस का नायाब नमूना पेश किया : सुबोधकांत सहाय

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रांची। महाराष्ट्र के महाड्रामा का पटाक्षेप हो गया। इसके साथ ही भाजपा की सत्तालोलुपता और अवसरवादिता भी उजागर हो गई। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जैसे जिम्मेवार पदों पर बैठे लोग भी आंकड़ों के गणित को नहीं समझ सके। जबरन सरकार बनाने की कोशिश की। रात के अंधेरे में साजिश रची और तड़के सुबह राष्ट्रपति शासन हटवा कर शपथ ग्रहण करवा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जैसै नेता ने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को बधाई तक दे डाली। लेकिन सत्ता के मद में वे यह भूल गए उन्होंने शरद पवार और सोनिया गाधी जैसे धुरंधर नेताओं को चुनौती दे डाली है। उक्त बातें पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सुबोध कांत सहाय ने कही। उन्होंने कहा कि किसी पार्टी को तोड़ने की कोशिश राजनीति नहीं होती। इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ क्रूर मजाक कहा जा सकता है। अंततः पिछले दरवाजे से सत्ता लूट का यह खेल फड़नवीस और अजीत के इस्तीफे के साथ खत्म हो गया। भाजपा का 188 विधायकों के समर्थन का दावा था और फ्लोर टेस्ट का सामना करने से पहले ही दम निकल गया।
सत्ता के अहंकार में उन्हें इस बात का शायद ही एहसास हो कि देशवासियों के बीच क्या संदेश गया है। श्री सहाय ने कहा कि महाराष्ट्र प्रकरण से कितनी जगहंसाई हुई है और झारखंड के चुनाव पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इससे भाजपा अनजान है। पार्टी विथ डिफरेंस का नायाब नमूना पेश किया है भाजपा ने। अब यह स्पष्ट हो चुका है कि इसके हाथ में न देश सुरक्षित है न लोकतंत्र। भाजपा ने पूरी तरह तानाशाही लादने का प्रयास किया है। गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने तो दिल्ली के द्वारपाल की भूमिका निभाई। संवैधानिक पदों की गरिमा में इतनी गिरावट आजाद भारत के इतिहास में कभी नहीं आई थी। बेशर्मी की हद तो तब हो गई जब अजीत पवार को समर्थन के इनाम के रूप में भ्रष्टाचार के नौ मामलों में क्लीन चिट दे दिया गया। यह प्रमाणित हो गया कि तमाम जांच एजेंसियां पीएमओ के इशारे पर काम करती हैं और क्लीन चिट देती हैं। महाराष्ट्र से मोदी और शाह के तिलिस्मी साम्राज्य का पतन शुरू हो गया है। उनके राजयोग की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है।

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