थमने लगा भाजपा का अश्वमेघ का घोड़ा!

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देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा का अश्वमेघ का घोड़ा बेलगाम हो चुका है। उसकी चाल थम चुकी है। भाजपा का अहंकार एनडीए के बिखराव का कारण बनता जा रहा है। गठबंधन धर्म से उसका मोहभंग हो चुका है। महाराष्ट्र में शिवसेना और झारखंड में आजसू का एनडीए से बाहर होना यही दर्शाता है। आजसू ने सीटों के बंटवारे में अपने दावे के खारिज होने पर अपनी राह अलग कर ली है। अपने 10 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है जिसमें वह सीटें भी शामिल हैं जहां भाजपा की पहली सूची के उम्मीदवार पहले से मौजूद हैं। जाहिर है कि आजसू चाहे जितनी सीटों पर लड़े। जीतनी सीटों पर जीत हासिल करे। आगे का रास्ता उसे अकेले ही तय करना होगा। अभी तक वह बहुमत का आंकड़ा जुटाने में मदद के जरिए पाला बदल-बदल कर सत्तासुख हासिल करता रहा है। यदि भाजपा और झामुमो गठबंधन की सीटें बराबरी पर होंगी तो आजसू की भूमिका बढ़ेगी अन्यथा इसबार उसे विपक्ष में बैठना पड़ जाएगा। भाजपा के साथ खास बात यह है कि झारखंड और महाराष्ट्र दोनो ही राज्यों में वह मजबूत स्थिति में रही है। उसे अजेय होने का बोध रहा है। लिहाजा उसके अंदर अहंकार का आ जाना स्वाभाविक है। उसे अकेले दम पर बहुमत हासिल करने का भरोसा रहा है। हालांकि महाराष्ट्र में भले वह अकेले दम पर बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सकी लेकिन सबसे बड़ी पार्टी तो बनी हुई है ही। हरियाणा में भी उसे दुष्यंत चौटाला का उनकी शर्तों पर सहयोग लेना पड़ा।

तोड़-फोड़कर सरकार बनाने की नीति का त्यागकर भाजपा महाराष्ट्र में शिवसेना के दबाव में आने की जगह सरकार बनाने के अपने दावे से पीछे हट जाना बेहतर समझा। यह गठबंधन से मोहभंग का ही सूचक है। वैसे भी शिवसेना के साथ उसकी केमेस्ट्री कभी मिली नहीं। हिंदुवादी संगठन होने के बावजूद दोनों की सोच में अंतर था। शिवसेना के हिन्दुत्व में क्षेत्रीयतावाद शामिल रहा है जबकि भाजपा के हिन्दुत्व में राष्ट्रवाद का तड़का लगा हुआ है। शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे किसी संसदीय संस्था में नहीं होने के बावजूद महाराष्ट्र के बेताज बादशाह की हैसियत रखते थे। उनके फरमान की अवहेलना करने की किसी में हिम्मत नहीं थी। अंडरवर्ल्ड के डॉन भी उनसे भय खाते थे। उनके बाद भाजपा का राजनीतिक वर्चस्व बढ़ने से महाराष्ट्र में शिवसेना कमजोर पड़ती जा रही थी।

भाजपा की क्षेत्रीय दलों को समाप्त करने की नीति भी उसके अस्तित्व के लिए खतरा थी। महाराष्ट्र के सीएम पद पर काबिज होकर ही वह अपना पुराना रुत्बा वापस पा सकती थी। इसीलिए उद्धव ठाकरे अपने बेटे आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं। लेकिन यह भाजपा के लिए नुकसान का सौदा होता। इसलिए उसने शिवसेना को अपनी राजनीति के लिए खुला छोड़ दिया। अब शिवसेना कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस का साथ मिलकर सरकार बनाना चाहती है। सोनिया गांधी और शरद पवार के साथ उसकी बातचीत चल रही है। शिवसेना ने सरकार बनाने का दावा कर दिया है। लेकिन राज्यपाल ने शरद पवार को भी वार्ता के लिए आमंत्रित किया है। अभी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। वहां राष्ट्रपति शासन लागू होने के भी आसार हैं। केंद्र में भाजपा का शासन है। राज्यपाल उसकी बात ज्यादा मानेंगे। वह अपने दावे से पीछे हटी है तो इसके पीछे कुछ रणनीति होगी।

झारखंड में आजसू के अलग होने से कितना फर्क पड़ेगा यह तो चुनाव नतीजों से पता चलेगा। लेकिन इतना तय है कि जिस तरह यूपीए में बिखराव आया उसी तरह एनडीए में भी बिखराव आएगा। भाजपा वैसे भी एक नेता, एक पार्टी, एक देश के लक्ष्य को हासिल करना चाहती है। यह तभी संभव है जब वह इतनी ताकतवर हो जाए कि किसी राज्य में उसे क्षेत्रीय क्षत्रपों की जरूरत नहीं पड़े। फिलहाल ऐसी स्थिति नहीं है। लेकिन उसे मोदी मैजिक पर भरोसा है। वह भावनात्मक लहर पैदा करना और उसे वोटों में बदलना जानती है। हालांकि यह मैजिक हरियाणा और महाराष्ट्र में नहीं चल पाया। पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी लेकिन अनुच्छेद-370 के खात्मा, बालाकोट और पाकिस्तान को सबक सिखाने जैसी उपलब्धियों का इन राज्यों में चुनावी लाभ नहीं मिला। लेकिन भाजपा को उम्मीद है कि अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसके लिए संजीवनी का काम करेगा। एक भावनात्मक लहर उठेगी और आर्थिक मोर्चे पर विफलताओं से लोगों का ध्यान हट जाएगा। रोजी-रोटी के मसले को राम मंदिर का निर्माण ढक लेगा। लेकिन यह कितना कारगर होगा और भावनात्मक लहरों पर भाजपा कबतक सवारी कर सकेगी, यह समय बताएगा। लेकिन फिलहाल गठबंधन की राजनीति के भविष्य पर सवालिया निशान तो लग ही गया है।

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