कर्नाटक का प्रवासी नाटक

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

कर्नाटक सरकार ने पहले प्रवासी मजदूरों को रोकने के लिए स्पेशल ट्रेनों के परिचालन पर रोक लगाई। उससे देश के अंदर गलत संदेश गया। इसे बंधुआ मजदूरी की वापसी का प्रयास कहा जाने लगा। फिर चौतरफा आलोचना के बाद उसे फिर से चलाने की इजाजत दी। इससे एक बात तो साफ है कि कर्नाटक सरकार को प्रवासी मजदूरों की अहमियत का अहसास हो गया। उसे अंदाजा हो गया कि उनके बगैर निर्माण उद्योग को संचालित करना मुश्किल हो जाएगा। सरकार इस मामले को प्रेम से सुलझा सकती थी। उसे मजदूरों को विश्वास में लेकर उन्हें वापस लौटने को मनाना चाहिए था। लेकिन वहां जिस धारा की सरकार है वह फरमान जारी करने में विश्वास करती है। लोकतांत्रिक तौर तरीके उसकी कार्यशैली में शामिल नहीं हैं।

यह मजदूर पिछले डेढ़ महीने से टिन की छत के नीचे वापसी के दिन गिन रहे थे, तब सरकार को उनकी चिंता नहीं थी। अब वापसी का मौका मिला तो वे तुरंत निकल जाना चाहते हैं। कर्नाटक सरकार ने जब बिहार, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने का फैसला लिया तो उन्हें उम्मीद जगी। अगर उनकी इतनी कमाई होती कि दो चार महीने बिना काम के रह सकते तो शायद उनके अंदर घर लौटने की यह बेचैनी नहीं होती। वे महामारी से डरे हुए थे। जब परदेश में कोई व्यक्ति मुसीबत में फंसता है तो उसे घर की याद आती है। सरकार यदि अडंगा नहीं लगाती और उन्हें विश्वास दिलाती कि उनका काम सुरक्षित रहेगा वे कुछ दिन घर घूमकर वापस लौट आएं तो संभवतः मान जाते। 3 मई और 5 मई के बीच चलाई गई विशेष ट्रेनों से करीब 9,600 मजदूर अपने परिवार तक पहुंच पाए थे।

साउथ वेस्टर्न रेलवे ने इस दौरान दानापुर, भुवनेश्वर, हटिया, लखनऊ, बड़काखाना और जयपुर के लिए ट्रेनें चलाई लेकिन 5 मई को राज्य सरकार ने अंतरराज्यीय ट्रेन सेवा रद्द कर दी। कहते हैं कि 5 मई को मुख्यमंत्री ने बिल्डरों के साथ एक बैठक की थी और उसके बाद फैसला लिया कि मजदूरों को वापस नहीं भेजा जाएगा। व्यवसाय, निर्माण और अन्य औद्योगिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने के लिए उनकी जरूरत है।

बिल्डरों ने प्रवासी मजदूरों के मुद्दे पर कहा कि मजदूरों को सभी जरूरी सुविधा दी जा रही है और निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। 5 मई को सीएम येदियुरप्पा ने कहा कि मंत्रियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रवासी मजदूरों को समझाए और उन्हें गृह राज्य जाने से मना करें। साथ ही मुख्यमंत्री ने मजदूरों से अपील की कि वे अफवाहों पर ध्यान ना दें और गैर जरूरी यात्रा से बचें।

लेकिन मजदूरों को डर था कि कहीं उन्हें कोरोना ना हो जाए। वे अपने घर और परिवार के बीच रहना चाहते थे। वे अनिश्चितता और डर के कारण वापस लौटना चाह रहे थे। अगर लॉकडाउन के दौरान उनका खयाल रख गया होता तो शायद वे रुक जाते। कर्नाटक सरकार के ट्रेन रोकने और मजदूरों को वहीं रहने के फैसले की तुलना बंधुआ मजदूरी प्रथा की जाने लगी। कांग्रेस और सीपीआई (एम) ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। सीपीआई (एम) नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि यह मजदूरों के साथ बंधुआ की तरह बर्ताव करने से कहीं ज्यादा बुरा है।

कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने भी मजदूरों को रोके जाने का मसला उठाते हुए कहा है कि  प्रवासी मजदूरों को बंधक नहीं बनाया जा सकता। उन्हें विश्वास में लेना होगा। सरकार और बिल्डरों को उन्हें प्रोत्साहन देना चाहिए। राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से कर्नाटक को सख्त संदेश देने का आग्रह किया है।

कर्नाटक से लौटने के लिए मजदूर कितने बेताब हैं यह ट्रेन टिकट के आवेदन से ही पता चलता है. राज्य सरकार ने ऑनलाइन फॉर्म भरवाने के लिए वेबसाइट बनवाई है। इसके जरिए करीब 2.13 लाख कर्मचारियों ने राज्य से घर लौटने के लिए खुद को पंजीकृत कराया है। इस बीच 6 मई को येदियुरप्पा सरकार ने राज्य में पंजीकृत मजदूरों के लिए राहत पैकेज का ऐलान किया। इसके तहत पंजीकृत 15.8 लाख मजदूरों को 3,000 रुपये दिए जाएंगे। इससे पहले इन मजदूरों को 2,000 रुपये दिए जा चुके हैं।

राजनीतिक बयानबाजी और मजदूरों के दबाव के बाद गुरुवार शाम कर्नाटक सरकार ने प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्य तक पहुंचाने के लिए विशेष ट्रेन सेवा बहाल करने का फैसला किया है। ट्रेन रद्द करने के फैसले की जमकर आलोचना हुई थी। राज्य सरकार ने 8 मई से ट्रेन सेवा शुरू करने का फैसला किया है और इस बाबत उसने 9 राज्यों को चिट्ठी लिखी है यह जानने के लिए कि क्या वे इस बात से राजी है कि फंसे हुए मजदूरों को वापस भेज देना चाहिए। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मजदूरों की वापसी के पक्ष में नहीं थे। उन्हें चौतरफा आलोचना के बाद इसे स्वीकार करना पड़ा है।

यह तय है कि कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों की सेवा लेने वाले देश के तमाम राज्यों की सरकारों को श्रमबल की जरूरत का अहसास हो चुका है। उनके गृह राज्यों की सरकारें अभी इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही हैं। सिर्फ झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने यह संकल्प लिया है कि मजदूरों के पलायन को रोकेंगे और उन्हें उनके घरों के पास ही रोजगार उपलब्ध कराएंगे। इसके लिए उन्होंने राज्य के संसाधनों और संभावनाओं की तलाश शुरू कर दी है। वे कुटीर उद्योगो के विस्तार पर काम कर रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अभी इस दिशा में कोई संकेत नहीं दिया है।

 

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