राष्ट्र के पुनर्निर्माण की चुनौती

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

कोरोना वायरस के खात्मे के लिए बनी एक वैक्सीन ट्रायल में फेल हो गई। दूसरी वैक्सीन ब्रिटेन ने बनाई है जिसका ट्रायल चल रहा है। इस बीच भारत में प्लाज्मा थिरैपी के जरिए कोराना वायरस के संक्रमित मरीजों के इलाज में सफलता मिली है। इस तकनीक का इस्तेमाल व्यापक पैमाने पर करने का प्रयास चल रहा है। भारत में अभी तक 5447 लोग कोरोना की चपेट में आकर ठीक हो चुके हैं। उनके रक्त से प्लाज्मा संग्रहित कर कोरोना प्लाज्मा बैंक तैयार किया जा सकता है। यह कोरोना के इलाज की कारगर तकनीक साबित हो चुका है। मतलब यह कि कोराना वायरस अब लाइलाज नहीं रहा। इसका इलाज निकल आया है। तो फिर इससे डरने का कोई कारण नहीं है। बेहतर है कि अब लॉकडाउन खत्म किया जाए। पाबंदियां हटाई जाएं और आर्थिक गतिविधियां फिर से शुरू की जाएं। जो संक्रमित हों उनका इलाज भी चलता रहे और आर्थिक गतिविधियां भी चलती रहें। भारत की अर्थव्यवस्था पहले से ही संकट में है। बेरोजगारी कई दशकों का आंकड़ा पार कर चुकी है। लोगों के बचत के पैसे स्वाहा हो चुके हैं। कोरोना वायरस ने रही सही कसर भी पूरी कर दी है। सच्ची यही है कि हम लंबे समय तक लॉकडाउन को झेलने की स्थिति में नहीं हैं।

अब अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की जरूरत है। यह काम विशेषज्ञों का है। यह आर्थिक प्रयोगों का नहीं मुकम्मल रणनीति के साथ ठोस काम करने का समय है। मोदी है तो मुमकिन है कह देने से प्रधानमंत्री के पास अपना नंबर बनाया जा सकता है लेकिन यह मोर्चा फतह नहीं किया जा सकता। मनमोहन सिंह जैसा अर्थशास्त्री यदि सत्ता में होता तो यह मुमकिन था। लेकिन हमारा नेतृत्व राष्ट्रहित में भी उनकी सलाह नहीं ले सकता। क्योंकि वे विश्व के जाने-माने अर्थशास्त्री होने के बावजूद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं और मोदी सरकार कांग्रेसमुक्त भारत का संकल्प ले चुकी है। कांग्रेस पार्टी वर्तमान सरकार को फूटी आंखों नहीं सुहाती। फिर भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए धुरंधर अर्थशास्त्रियों का पैनल बनाने की जरूरत है। पिछले छह वर्षों के अंदर देश में जितने भी बड़े अर्थशास्त्री हैं उनमें से अधिकांश को विदेशों की ओर पलायन करना पड़ा है। रिजर्व बैंक के गवर्नर एक-एक कर इस्तीफा दे चुके हैं। सरकार यदि सचमुच राष्ट्रवादी है तो उसे संकट की इस घड़ी में रूठे हुए अर्थशास्त्रियों को मनाकर वापस लाना चाहिए। मनमोहन सिंह से सलाह लेने में भी अपने अहं को आड़े नहीं आने देना चाहिए। देशभक्त सिर्फ भाजपा में नहीं उसके बाहर भी हैं। वैश्विक संकट की इस घड़ी में सबकी सेवा लेनी चाहिए। कुछ समय तक देशहित में अपने एजेंडे और राजनीतिक महत्वाकांक्षा का त्याग कर देना चाहिए अन्यथा आनेवाली पीढ़ियां माफ नहीं करेंगी।

हालांकि स्थिति फिर भी बहुत निराशाजनक नहीं है। एक अच्छी बात यह है कि चीन से एक हजार अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां पलायन की तैयारी कर चुकी हैं। वे भारत के संपर्क में भी हैं। उन्हें प्लांट लगाने और निवेश  के लिए तैयार करना होगा और आवश्यक सुविधाएं देनी होंगी। इससे औद्योगिक सेक्टर में तेज़ी आएगी। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार का भी सृजन होगा। अर्थशास्त्रियों के पैनल को इसकी जिम्मेवारी देनी चाहिए। उन्हें ग्रामीण और शहरी भारत के संसाधनों को ध्यान में रखते हुए एक फुलप्रूफ कार्ययोजना तैयार करने के काम में लगा देना चाहिए। गावों में कृषि, पशुपालन, मत्स्य और मुर्गी पालन. कृषि आधारित उद्योग, कुटीर उद्योग आदि के जरिए खुशहाली ली जा सकती है। लोगों की क्रयशक्ति बढ़े। आर्थिक चिंताओं से मुक्ति मिले तो एक नए युग की शुरुआत हो सकती है। मोदी सरकार के समक्ष देश के पुनर्निर्माण का स्वर्णिम अवसर भी है और चुनौती भी।

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