कोरोना कालः अपनी जड़ों की ओर वापसी का समय

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-देवेंद्र गौतम

कोरोना के कारण लोगों के अंदर जरूरत से ज्यादा डर समा गया है। वे बेपर की अफवाहों को भी सच मान ले रहे हैं। हालांकि भारत बहुत सधी हुई रणनीति के तहत इस वायरस के साथ जंग लड़ रहा है। वैसे भी 138 करोड़ की आबादी वाले देश में 17 हजार लोगों के संक्रमित होने और साढ़े पांच सौ से कुछ अधिक लोगों की मौत को बहुत भयावह स्थिति नहीं कहा जा सकता। मात्र 30 करोड़ की आबादी वाले अमेरिका में 27 लाख से अधिक लोग संक्रमण हैं और 40 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इस लिहाज से भारत के आंकड़े कुछ भी नहीं हैं। लेकिन भविष्य की अनिश्चितता के मामले में भारत का ग्राफ अन्य देशों से कहीं ज्यादा ऊंचा है। हम एक विकासशील देश हैं। हमारा अर्थ व्यवस्था पहले से ही मंदी की मार झेल रही है। हम घरों ज्यादा समय तक बंद नहीं रह सकते। हमें काम चाहिए। एक सुरक्षित भविष्य चाहिए।

यह विध्वंसकाल है। कहते हैं कि हर विध्वंस किसी नए निर्माण की शुरुआत का सूचक होता है। इस लॉकडाउन के समय पहली बार राजसत्ता का ध्यान ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की ओर गया है। प्रवासी मजदूरों को उनके घर के पास ही रोजगार उपलब्ध कराने की बात हो रही है। कारखाने बंद हैं और खेती का काम जारी है। यह शुभ संकेत है। कोरोना से निपटने के बाद आर्थिक पुनर्रचना का काम यदि ग्रामकेंद्रित होगा तो शहरों में भी उसका भरपूर उजाला दिखाई देगा। जंगलों में वृक्ष होंगे तो पशु-पक्षी रहेंगे। जंगल आबाद रहेंगे तो शहर भी आबाद रहेंगे। सरकार को कोरोना से जंग के बीच में ही जड़ों की ओर वापसी की शुरुआत कर देनी चाहिए।

लॉकडाउन के दौरान दुनिया के विभिन्न देशों में घरेलू हिंसा में बढ़ोत्तरी की खबरें आ रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसपर गहरी चिंता जताई है। आमतौर पर छुट्टी के दिन जब परिवार के सभी सदस्य घर पर होते हैं तो एक उल्लास का माहौल होता है। आज यह छुट्टी नहीं मजबूरी है। एक अदृश्य दुश्मन हमारे चारों ओर मौत बांटता घूम रहा है। हम शौक से घर पर नहीं हैं। खौफ के कारण रहना पड़ रहा है। इसके कारण मन में कुंठा उत्पन्न हो रही है औक कुंठा के कारण हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह आपात कारणों से उत्पन्न हुई एक मनोवैज्ञानिक समस्या है। दुनिया भर की सरकारें एक नियत समय के लिए लॉकडाउन की घोषणा कर रही हैं और स्थितियों के अनुरूप उसकी अवधि बढ़ा रही हैं या उसमें थोड़ी बहुत छूट दे रही हैं। लेकिन लोगों को कबतक घरों में कैद रहना होगा, उनकी आय के साधन बचे रहेंगे या खत्म हो जाएंगे, वे जीवित बचेंगे या यह अदृश्य वायरस उनके शरीर के अंदर प्रविष्ट होकर उनके जीवन का अंत कर देगा, कोई नहीं जानता। पूरा मानव समाज एक अनिश्चित भविष्य की आशंकाओं से भरा है। भारत जैसे विकास के चक्रिय सिद्धांत को मानने वाले, विपरीत परिस्थियों में भी सब्र के साथ उनके गुजरने का इंतजार करने वाले देश में बेचैनी और मानसिक तनाव अपनी हदें पार कर रहा है तो सरल रैखीय विकास के सिद्धांत को मानने वाले पश्चिमी देशों में स्थिति क्या होगी, कल्पना की जा सकती है। यह तनाव व्यक्ति केंद्रित नहीं, सामूहिक है। पूरा माहौल, पूरी मानव जाति तनावग्रस्त है। मानसिक तनाव हमेशा व्यक्ति के अंदर चिड़चिड़ापन पैदा करता है। निश्चित रूप से समस्याएं जीवन का हिस्सा होती हैं, हर किस को उनसे जूझना पड़ता है। लेकिन यदि किसी समस्या का समाधान मौजूद हो तो वह ज्यादा परेशान नहीं करती। जिस समस्या का कोई समाधान ही न हो वह खीज़ के अलावा कुछ नहीं पैदा कर सकती। मनुष्य स्वयं को बेबस न महसूस करे तो क्या करे। वह अपनी खीज़ का इजहार भी नहीं कर पाता तो वह उसकी बोलचाल, उसके दैनिक व्यवहार में अभिव्यक्त होने लगता है। जाहिर है कि घर में कैद होने के कारण इसका विस्फोट अपने परिजनों पर ही हो सकता है। पति ने गुस्से में कुछ कह दिया तो पत्नी भी उसे बर्दाश्त नहीं कर सकेगी। हाल में एक महिला अपने चार बच्चों को गंगा नदी में फेंककर स्वयं को भी गंगा के हवाले कर दिया था। उसने यह निर्णय सामान्य अवस्था में तो लिया नहीं होगा। जाहिर तौर पर मानसिक तनाव और अवसाद के चरम पर पहुंचने के बाद उसने यह फैसला किया होगा।

समाजशास्त्रियों को आशंका है को कोरोना का संकट खत्म होने के बाद तलाक़ के मामले बढ़ सकते हैं। संभव है ऐसा हो। लेकिन यदि सरकार ने कोरोना काल के बाद राष्ट्र और समाज के पुनर्निर्माण की सटीक योजना बना ली तो आपसी संबंधों के एक नए युग की शुरुआत भी हो सकती है। हालांकि कई देशों के वर्तमान नेतृत्व में इस कौशल का अभाव दिखता है।

यह भी सच है कि सामूहिक तनाव कोरोना काल की ही उपज नहीं है। इसका बीजारोपण 90 के दशक में ही हो गया था। हालांकि पूरे परिवार के साथ सामूहिक आत्महत्या की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं। लेकिन खासतौर पर 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण की शुरुआत के बाद इसमें बढ़ोत्तरी होने लगी थी। उस समय तमाम सार्वजनिक उपक्रमों में श्रमबल की छंटनी शुरू हो गई थी। गोल्डेन हैंडशेक और जबरन सेवानिवृत्ति का सिलसिला शुरू हो गया था। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में नौकरियों का सृजन करने की जगह उसमें कटौती किए जाने का दुष्परिणाम तो आना ही था। सिर्फ लाभ कमाने के लिए कम आबादी वाले देशों के तौर तरीकों को अपनाना आत्मघाती तो था ही। धीरे-धीरे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के सामाजिक दायित्व की भूमिका को नज़र-अंदाज़ कर उन्हें लाभ-हानि के पैमाने पर इतारा जाने लगा। समस्या यह थी कि ट्रेड यूनियन के अधिकारों में कटौती के कारण इसका सही तरीके से प्रतिकार भी नहीं किया जा सका। अधिकांश यूनियनों ने तो इस संकट को पहचाना तक नहीं। अर्थशास्त्रियों ने भी भारत में वैश्वीकरण और मानव संसाधन के बीच सामंजस्य बिठाने संबंधी सुझाव नहीं दिए। इन तमाम बातों के बावजूद निराशा और अनिश्चितता के बादल उतने घने नहीं थे जितना 2016 में नोटबंदी के बाद हुए। सरकार ने काले धन का खात्मा करने के एक प्रयोग के जरिए पूरे देश की कमर तोड़कर रख दी। थोड़ी राहत मिली तो बिना तैयारी के जीएसटी लागू कर दिया। भारत-पाकिस्तान, हिंदू-मुसलमान और सैन्य राष्ट्रवाद का इस्तेमाल कर भाजपा प्रचंड बहुत के साथ सत्ता में वापस तो चली आई लेकिन इसे अपनी तिकड़मों की जीत मानने की जगह जन समर्थन का पर्याय मान लिया। इसके बाद एक-एक कर ऐसे फैसले लेती चली गई जो सामाजिक समरसता और आर्थिक विकास के लिए घातक साबित हुई। अर्थ व्यवस्था भयानक मंदी की चपेट में आने लगी। इससे उबरने पर मंथन ही चल रहा था कि कोरोना वायरस का तांडव शुरू हो गया। वायरस पार पसारता रहा और सरकार डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत और मध्य प्रदेश की सरकार गिराने में व्यस्त रही। जब संकट ज्यादा गहराने लगा तो देश में बिना किसी तैयारी के अचानक लॉकडाउन कर दिया गया। पूरी आबादी घरों में कैद हो गई। जो जहां था वहीं फंस गया। प्रवासी मजदूर सड़कों पर पैदल घर की ओर चल पड़े।

खैर जो हो चुका सो हो चुका। गल्तियों और भूलों से ही इनसान कुछ सीखता है। अब आगे का रास्ता ज्यादा सुगम बना सकें तो बेहतर है। हमाने सामने बहुत बड़ी चुनौती है। इसके खिलाफ एकबद्ध होकर सटीक रणनीति के साथ लड़ना होगा। यह अपनी जड़ों की ओर लौटने का समय है। कैसे और किस रूप में लोटेंगे इसपर चिंतन करने की जरूरत है।

 

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