कोरोना काल में लाशों का व्यापार

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

भारत में सर्पदंश से मरने वालों की लाशें बहती नदी में प्रवाहित करने का प्रचलन रहा है। लेकिन अभी गंगा में जो दर्जनों की संख्या में बहती लाशें मिल रही हैं वह महामारी काल की अंतिम संस्कार से वंचित लाशें हैं। आपदा के समय लाशो की गिनती मुश्किल होती है। 1920 में स्पेनिश फ्लू के प्रकोप के समय महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने गंगा नदी में बेशुमार बहती लाशों का जिक्र किया था। अब 2021 में उसी कारुणिक दृश्य की पुनरावृति हो रही है।

बिहार के बक्सर जिले में गंगा नदी से 71 और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में 23 लाशें बरामद की गई हैं। यह लाशें 20-25 दिनों से गंगा में बह रही थीं। उनमें से कुछ अधजली अवस्था में हैं। संभवतः लकड़ी कम होने के कारण उनका आधा-अधूरा दाह संस्कार करने के बाद नदी में बहा दिया गया। उनमें से किसी की पहचान नहीं हो पाई है। उनका पोस्टमार्टम भी नहीं किया गया। इसलिए यह कहना कठिन है कि उनकी मौत कोरोना के कारण हुई थी या किसी अन्य कारण से। चारों तरफ से जो खबरें आ रही हैं उसके मुताबिक देशभर के श्मशानों और कब्रिस्तानें में लाशों की कतार लगी है। दाह संस्कार के लिए आवश्यक सामग्रियों का भी अभाव हो गया है। सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि प्रतिदिन 3-4 हजार मौतें हो रही हैं। 3-4 हजार लाशों का अंतिम संस्कार करने में तो परेशानी नहीं होनी चाहिए। देश में करीब 6 लाख 28 हजार 221 गांव हैं। हर गांव में कब्रिस्तान और श्मशान है। कस्बाई शहरों में भी एक-दो मुक्तिधाम अवश्य है। बड़े शहरों में दर्जनों और महानगरों में सैकड़ों की संख्या में इनकी मौजूदगी है। फिर चार हजार शवों के अंतिम संस्कार में इतनी समस्या क्यों है?

जाहिर है कि सरकारी आंकड़े गलत हैं। जितना बताया जा रहा है स्थिति उससे कहीं ज्यादा भयावह है। नदियां पहले से प्रदूषित हैं। अब कोरोनाकाल में यह जानलेवा होती जा रही हैं। अभी लोगों की मदद के ले जितने इंसान सक्रिय हैं उससे कहीं ज्यादा मानवरुपी गिद्धों और चीलों की टोली मंडरा रही है। हर दिन आपदा में अवसर तलाशने वाले ठगों, कालाबाजारियों और आर्थिक दोहन से संबंधित खबरे मीडिया में  रही हैं। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा तो यह है कि लाशों के कफन तक की चोरी की जा रही है। कई लोग इस आरोप में पकड़े जा चुके हैं। सरकारी तंत्र पूरी तरह फ्लाप हो चुका है। सत्ता में बैठे लोगों को लोगों की जान की नहीं चुनाव की चिंता है। भाजपा के लोग अस्पतालों और श्मशानों में बदइंतजामी से उतना दुःखी नहीं हैं जितना बंगाल चुनाव हार जाने से। वे किसी तरह बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की फिराक में है। भाजपा का आइटी सेल बंगाल में हिंसा को लेकर अफवाहें फैलाने में लगा है। कोरोनो से हो रही मौतों पर उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं है। वहां सांप्रदायिक जहर फैलाने की कोई गुंजाइश नहीं है। जहां गुंजाइश है वहां भाजपा के लोग तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। कर्नाटक में भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने कोविड अस्पताल में हिंदू-मुस्लिम को लेकर कितना हंगामा किया सबको पता है।

समस्या यह नहीं है कि कोरोना की दूसरी लहर भारी संख्या में लोगों की जान ले रही है और तीसरी लहर दस्तक दे रही है, समस्य यह है कि मोदी सरकार इसे समस्या मान ही नहीं रही है। वह आत्ममुग्धता में डूबी ही है। बिहार में पप्पू यादव ने भाजपा सांसद के पास लावारिश पड़े एंबुलेंसों का भंडाफोड़ किया तो उल्टे उन्हीं को गिरफ्तार कर लिया गया। सांसद महोदय से जवाब-तलब भी नहीं किया गया। उत्तर प्रदेश में कोरोना पीड़ितों की मदद करने वालों पर ही प्राथमिकी दर्ज की जा रही है। सोशल मीडिया पर भी कोई आक्सीजन की कमी का रोना रोता है तो उसपर कार्रवाई कर दी जा रही है। इतनी अमानवीय और निर्दयी पार्टी जब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की बात करती है तो उसपर या तो गुस्सा आता है या फिर हंसी आती है। बहुत कम परिवार बचे हैं जिनका कोई सदस्य कोरोना की चपेट में आने से बचा हो या जिसमें इलाज के दौरान किसी की मौत नहीं हुई हो। सत्ता के शीर्ष से लेकर आम जनता के एक हिस्से में नैतिकता का घोर अभाव दिख रहा है। मोदी सरकार स्थिति को संभाल नहीं पा रही है लेकिन मजाल है कि कोई उसपर उंगली उठा दे। वह अपनी नाकामी को भी कामयाबी के रूप में पेश करती है। अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को देशद्रोह करार देती है। उसे कोरोना की नहीं पंजाब और उत्तर प्रदेश क चुनावों की चिंता है। पीएम मोदी पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्दे नज़र ही गुरुद्वारों में मत्था टेकना शुरू कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ गायों की सेवा कर चुनाव जीतने की तैयारी में लगे हैं। उनलोगों ने भक्तों की एक ऐसी जमात खड़ी कर ली है जो संस्थानों की विक्री को भी राष्ट्रवादी कदम मानता है। पहले आसाराम और रामरहीम जैसे धर्मगुरुओं के भक्त होते थे अब राजनेताओं के भी भक्त होने लगे हैं।

इस अंधेरे युग का अंत कब और कैसे होगा अभी कहना मुश्किल है। सांप्रदायिकता को ही अपना धर्म बना चुके लोग हिंदू धर्म को कितना कलंकित करेंगे पता नहीं।

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