गायत्री मंत्र के प्रकाश से धरती को आलोकित करने का दिन

कार्तिक पूर्णिमा :देव-दीपावली पर विशेष

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रश्मि सिंह
. कार्तिक मास की अंतिम तिथि देव-दीपावली के रूप में मनाई जाती है। देव- दीपावली की महिमा पुराण एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी वर्णित है। धार्मिक ग्रंथों व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु का प्रथम अवतार मत्स्य के रूप में कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। इसके अतिरिक्त तारकासुर का वध करने के लिए अग्नि और वायु देव के सहयोग से जन्मे भगवान कार्तिकेय को देवसेना का अधिपति बनाया गया, लेकिन भाई गणेश के विवाह कर दिए जाने से भगवान कार्तिकेय नाराज होकर कार्तिक पूर्णिमा को ही क्रौंच पर्वत पर चले गए। कार्तिकेय के प्रेम मोह से अभिभूत माता पार्वती और पिता महादेव वहां ज्योति के रूप में प्रकट हुए। कार्तिक माह की शुरूआत होते ही दीपदान तथा आकाश दीप प्रज्वलित करने की व्यवस्था के पीछे गायत्री मंत्र के प्रकाश से धरती माता को आलोकित करने का भाव रहा है। इस अवसर पर शरद ऋतु से भगवान सूर्य की गति में भी परिवर्तन होता है। फलस्वरूप कार्तिक पूर्णिमा के दिन से ही दिन छोटा होने लगता है और रात बड़ी होने लगती है। अंधेरे का प्रभाव भी बढ़ने लगता है। अंधेरे से लड़ने के लिए दीप प्रज्वलित कर हम कार्तिक मास की पूर्णिमा को देव-दीपावली के रूप में मनाते हैं। देव का एक पर्यायवाची शब्द नेत्र भी है। इस दृष्टि से दीप प्रज्वलन के पीछे नेत्र ज्योति जागृत रखने का भी संदेश देव-दीपावली देता है। देव-दीपावली हमें ज्ञान,सदाचार, सद्भाव सहित अन्य सद्गुणों को जीवन में आत्मबल के दीपक बनकर रोशनी देने का संदेश भी संप्रेषित करता है। कार्तिक मास की अंतिम तिथि पूर्णिमा के संदर्भ में यह भी मान्यता है कि महाभारत ग्रंथ के शांति एवं अनुशासन पर्व के अनुरूप कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक शरशैय्या पर लेटे भीष्म ने योगेश्वर कृष्ण की उपस्थिति में पांडवों को राजधर्म, दान धर्म और मोक्ष धर्म का उपदेश दिया था। ज्ञान का यह काल काफी शुभ माना जाता है। इस अवधि में व्रत-उपवास, सदाचार और दान का विशेष महत्व है। आइए, हम सब कार्तिक मास की अंतिम तिथि, कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव- दीपावली के अवसर पर मन में प्रेम-दीप जलाते रहने का संकल्प लें।

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

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