कृषि लागत घटाने पर भी हो चर्चा

रासायनिक खेती को अलविदा कहने का समय

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

किसान आंदोलन अब दिल्ली घेराव और किसान महापंचायत के बाद जिला स्तरीय रैलियों के दौर में पहुंच चुका है। किसान नेताओं ने पं बंगाल और अन्य चुनावी राज्यों में आंदोलन तेज़ करने का एलान किया है। भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने प. बंगाल में पाच लाख ट्रैक्टरों की रैली निकालने की घोषणा की है।  इसके साथ ही संसद का घेराव कर उसके आसपास के खाली भूखंडों में खेती करने का ऐलान किया है। आंदोलन ग्रासरूट की ओर बढ़ रहा है। इसमें नए-नए इलाके शामिल होते जा रहे हैं और सरकार तीन कृषि सुधार कानूनों को किसी कीमत पर वापस लेने को तैयार नहीं है। हालांकि संशोधन के लिए तैयार है।

समस्या की मुख्य जड़ किसानों की मेहनत का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पाना है। 60 के दशक में लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्रित्व काल में इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रावधान किया गया था। यह आज भी लागू है लेकिन यह आपसी सहमति की बात थी। इसके लिए कोई कानून नहीं बना था। इस प्रावधान के 60 साल से ज्यादा गुजर चुके लेकिन इसका लाभ हरियाणा,पंजाब जैसे कुछेक राज्यों को ही मिलता है। पूरे देश के किसानों को इसका लाभ नहीं मिलता। अब किसान चाहते हैं कि कानून बनाकर इसकी गारंटी की जाए और पूरे देश में लागू हो। समर्थन मूल्य से कम पर खरीद को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। सरकार कानून बनाना नहीं चाहती। सरकार फिलहाल सीमित खरीद करती है और किसानों की अधिकांश उपज खाद्यान्न व्यापारी औने-पौने भाव में खरीद कर ज्यादा मुनाफा कमाते हैं।

किसानों को लाभकारी मूल्य मिले इसपर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती लेकिन इसका एकमात्र रास्ता न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं है। पता नहीं क्यों सरकार और किसान नेताओं में से कोई भी कृषि की लागत को घटाने के उपायों की बात नहीं करता। कृषि संकट की शुरुआत कहां से हुई और इसे कैसे सुधारा जा सकता है इस विषय पर चर्चा नहीं होती। हमारी पारंपरिक खेती पूरी तरह शून्य बजट की और जैविक थी। 1756 में ईस्ट इंडिया कंपनी को बिहार, बंगाल उड़ीसा का दीवानी अधिकार मिलने तक देश में पशुधन की बहुतायत थी। भेड़ों और गायों के जरिए पर्याप्त उर्वरक प्राप्त हो जाता था। गौमूत्र, नीम और करंज से कीटनाशक तैयार हो जाता था। हर फसल से बीज का हिस्सा निकाल कर अलग कर लिया जाता था। बीजारोपण के पहले विभिन्न गांवों के बीच बीजों की अदला-बदली कर ली जाती थी। इससे उनके आनुवंशिक गुण बरकरार रहते थे। किसानों के परिश्रम के अलावा कोई खर्च नहीं था। मिट्टी की गुणवत्ता बरकरार थी और उपज भरपूर होती थी।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने कर वसूलने के लिए ब्रिटेन से काफी संख्या में अपने बंधुओं को बुला लिया। उनके भोजन के लिए गायों और भेड़ों का तेज़ी से वध किया जाने लगा। दूसरी तरफ अंग्रेजों ने लगान बहुत बढ़ा दिया। संकट की शुरुआत यहीं से हुई। भारी-भरकम लगान के बोझ के कारण किसानों के मन में खेती के प्रति अरुचि होने लगी। वे खेत को परती छोड़ने लगे। नतीजा 1777-78 के भीषण अकाल के रूप में सामने आया। उस समय पहला दुर्भिक्ष आयोग गठित हुआ। अंग्रेजों ने मानवतावादी कृषि संस्कृति का काफी मखौल उड़ाया। अंग्रेज समझ गए कि लगान वसूलना उनके बूते की बात नहीं है। इसलिए उन्होंने 1790 के दशक में जमींदारी प्रथा लागू कर लगान वसूलने का जिम्मा जमींदारों और जागीरदारों को सौंप दी। इसके बाद शोषण और अत्याचार के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई।

बहरहाल कृषि संकट की शुरुआत उसी समय से हुई थी जो आजादी के बाद 60 के दशक तक विकराल हो गई थी। इससे पूर्व भी भारत में करीब कई बार अन्न संकट उत्पन्न हुआ था। लेकिन 60 के दशक में जब विदेशों से सड़ा-गला अनाज मंगाने की नौबत आई तो सरकार ने खाद्दान्न के मामले में आत्मनिर्भरता का संकल्प लिया। योजनाएं बनाईं। उसी समय कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामिनाथन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया और हरित क्रांति का नारा दिया गया। आयोग ने भारतीय कृषि व्यवस्था को सुधारने और देशी तकनीक को उन्नत बनाने की नहीं सोची बल्कि कनाडा से रासायनिक कृषि तकनीक का आयात किया। भारतीय कृषि क्षेत्र की वस्तुगत स्थितियों पर विचार नहीं किया गया। जबकि उस समय भी छोटी जोत बड़ी समस्या थी। छोटी जोत के किसान उस तकनीक को पूरी तरह अपना ही नहीं सकते थे। आधुनिकता की आवश्यकता थी सुधार के लिए यह काफी नहीं था। सबसे पहले छोटी-छोटी जोतों को मिलाकर बड़ी जोत में बदलने की जरूरत थी। उपकरण लाने ठीक थे लेकिन रासायनिक खेती की तरफ जाना गलत था। रासायनिक खेती ने कृषि लागत में बेतहाशा इजाफा कर दिया। तात्कालिक तौर पर खाद्दान्न के मामले में आत्मनिर्भरता जरूर आई लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव घातक साबित हुए। रसायनों के प्रयोग के कारण मिट्टी जहरीली होती गई और जन स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ा। यदि रासायनिक खेती नहीं होती तो आज स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के कारण भारतीयों की औसत उम्र 100 साल से ज्यादा ही होती। अभी यह 65-70 के स्तर पर आ गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार शून्य बजट की खेती की बात की थी लेकिन इसकी जगह वे खेती के कार्पोटीकरण की ओर चले गए। शून्य बजट यदि व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं भी हो तो उसे कम करने की कोशिश तो की ही जा सकती है। यदि ऐसा होगा तो खाद्यान्न के बाजार मूल्य को घटाकर उपभोक्ताओं को भी राहत दी जा सकती है और किसानों को भी समृद्ध किया जा सकता है। खेती की रासायनिक तकनीक से तत्काल पीछा छुड़ाने की जरूरत है। इसके बाद मिट्टी को उलट-पलट कर उसके जहरीले अंश को खत्म किया जा सकता है। इन बिंदुओं पर किसानों को भी विचार करना चाहिए और सरकार को भी।

 

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