चुनाव, महामारी और मार्च का महीना! 

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पिछले दो वर्षों से मार्च की महीना कोविड के प्रकोप का महीना बना हुआ है। अब अगले साल 2022 में मार्च से पहले चार राज्यों का चुनाव होना है। फिर मई से पहले उत्तर प्रदेश का चुनाव। चार राज्यों के चुनाव में राजनीतिक दल भले अपनी पूरी ताकत लगाए लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनाव में तो न विपक्ष मानेगा न सत्तापक्ष।  रैलियों और रोड शो का मौसम तो आएगा ही। राजनीतिक दलों के लिए पहली प्राथमिकता है चुनाव। कोविड की तीसरी लहर का आमंत्रण पत्र भी साबित हो सकता है यह मार्च का महीना। 2024 के आम चुनाव का सेमी फाइनल।

अब कोविड-19 की दूसरी लहर काफी हद तक कमजोर हो चली है। अधिकांश राज्यों में अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। संक्रमितों और मृतकों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है। कोविड को हराकर स्वस्थ होने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है। अस्पतालों में बेड और आक्सीजन की किल्लत लगभग खत्म हो चुकी है। दवाओं की कालाबाजारी भी करीब-करीब थम चुकी है। इस लहर में संक्रमितों और मृतकों की संख्या पर विवाद है। सरकार कुछ बताती है। गैरसरकारी संस्थाएं कुछ दावा करती हैं। राष्ट्रीय मीडिया का अलग आकलन है अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का अलग। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह लहर पहली लहर से कहीं ज्यादा संक्रामक और कहीं ज्यादा घातक साबित हुई। इस दौरान हमारी चिकित्सा सेवा का पूरा ढांचा चरमरा गया था और शवों का अंतिम संस्कार तक मुश्किल हो गया था। हजारों शव गंगा की लहरों में बहते और रेत में दफ्न मिले। अंतिम संस्कार के दौरान परंपराओं के निर्वहन में भी कठिनाई आई। सरकारी आंकड़ों में प्रतिदिन मृतकों की संख्या चार हजार बताई जाती रही। लेकिन साढ़े छह लाख गावों के देश भारत में जहां श्मशानों और कब्रिस्तानों की संख्या लाखों में है, वहां चार हजार शवों के अंतिम संस्कार में परेशानी हो यह बात गले से नीचे नहीं उतरती। खैर जो भी हो इस दूसरी लहर ने भारत को अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा कोरोना प्रभावित देश बना दिया। अब लहर जरूर धीमी हो चुकी है लेकिन उसका सह उत्पाद फंगस कई रंगों में मौत का कहर बरपा रहा है। इतना तय है कि जिस तीसरी लहर के कयास लगाए जा रहे हैं वह पहली और दूसरी लहर से कहीं ज्यादा घातक होगी। हम उसके लिए चाहे जितनी तैयारी कर लें अफरा-तफरी मचने से शायद ही रोका जा सके।

दूसरी लहर के आने की विशेषज्ञों को आशंका थी लेकिन सरकारी तंत्र को विश्वास नहीं था इसलिए इसकी कोई विशेष तैयारी भी नहीं की गई थी। यह मान लिया गया कि वैक्सीन पड़ जाने के बाद लोग सुरक्षित हो जाएंगे और कोविड की वापसी हुई भी तो जान-माल का ज्यादा नुकसान नहीं होगा। लेकिन वह आ और पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जाहिर है कि दो लहरों के कटु अनुभव के बाद सरकार तीसरी लहर की आशंका को नज़र-अंदाज़ नहीं कर सकती है। इसकी तैयारी केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर शुरू कर दी गई है लेकिन सरकार का ध्यान उत्तर प्रदेश पर भी लगा हुआ है। यह स्वाभाविक भी है।

कोविड-19 की दो लहरों पर गौर करें तो एक बात स्पष्ट है दोनों ही लहरों का प्रचंड रूप मार्च महीने के उत्तरार्ध में उभरकर सामने आया है और दोनों ही अवसरों पर भीड़ वाले इवेंट और सरकारी लापरवाही की समस्या थी। मार्च 2020 में जब कोविड की पहली लहर चल रही थी तो नमस्ते ट्रंप का आयोजन हुआ थी जिसमें लाखों लोग एक जगह एकत्र हुए थे। मोदी सरकार मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार को गिराने और एनडीए की सरकार बनाने में व्यस्त रही थी। इन सबसे निपटने के बाद जनता कर्फ्यू और लॉकडाउन का फैसला लिया गया था। वह लहर भी मई आते-आते धीमी पड़ने लगी थी और सितंबर आते-आते स्थिति काफी हद तक सामान्य नज़र आने लगी थी। सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम भी शुरू होने लगे थे। फरवरी 2021 में जब पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू ही तो लोग मास्क, सेनेटाइजर, शारीरिक दूरी आदि से निवृत्त हो चुके थे। बड़ी-बड़ी चुनावी रैलियों का आयोजन शुरू हो चुका था। लेकिन आधा मार्च बीतते-बीतते दूसरी लहर ने प्रचंड रूप ले लिया था। बंगाल में चार चरणों का चुनाव बाकी था। बढ़ते संक्रमण और मौतों को देखते हुए चुनावी रैलियों में कटौती और रोक की जरूरत आ पड़ी।

अब मार्च 2022 में गोवा, मणिपुर, पंजाब और उत्तराखंड विधानसभाओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। मई 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। जाहिर है कि इससे पहले चुनाव कराने होंगे। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने दावा किया है कि वे समय पर चुनाव संपन्न कराकर राज्यपालों को जीते हुए विधायकों की सूची सौंप देंगे ताकि निर्धारित समय पर नई सरकारों का गठन हो सके। उनका कहना है कि कोरोना काल में चुनाव संपन्न कराने का उनके पास पर्याप्त अनुभव है।

सवाल है कि कहीं 2020 और 2021 की तरह 2022 का मार्च महीना भी तो कोविड की तीसरी लहर को समर्पित नहीं हो जाएगा। चार राज्यों की चुनाव प्रक्रिया जनवरी 2022 में शुरू करनी होगी और मार्च का महीना राजनीतिक सक्रियता का महीना होगा। इसके तुरंत बाद उत्तर प्रदेश की हलचल तेज़ होगी जो अभी से भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सरगर्मियों का केंद्र बना हुआ है। उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है क्योंकि उसे 2024 के आम चुनावों का सेमी फाइनल माना जा रहा है। इस चुनाव को हारने के बाद 2014 में मोदी सरकार की वापसी संदिग्ध हो जाएगी। यही कारण है कि विपक्षी दल भले ही अभी निष्क्रिय दिखाई दे रहे हों लेकिन सत्तापक्ष के नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा जैसे शीर्ष नेताओं से लेकर संघ के तमाम पदाधिकारी और कार्यकर्ता अभी से चुनाव की तैयारियों में लग गए हैं। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के गिरते ग्राफ को लेकर चिंतित हैं।

लिहाजा 2022 में कोविड-19 की तीसरी लहर अगर आई तो तमाम राजनीतिक दल और सरकारी तंत्र चुनाव प्रक्रिया में व्यस्त रहेगा। इतने कम समय में अस्पतालों और चिकित्सा सेवा का विस्तार संभव नहीं है। आर्थिक मंदी का दौर भी चल ही रहा है। ऐसे में आशंका इस बात की है कि दो वर्षों से चल रही कहानी कहीं तीसरी बार भी न दुहराई जाए। यह सही है कि भारत समेत दुनिया के कई देशों ने वैक्सीन तैयार कर लिया है। लेकिन तीसरी लहर में यह कितना कारगर साबित होंगे कहना कठिन है। यह भी संभव है कि उस समय तक कोविड की कोई रामनाम दवा या वैक्सीन तैयार हो जाए।

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