किसान आंदोलनः अडानी और अंबानी चाहें तो टूट सकता है यह गतिरोध

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-देवेंद्र गौतम

यह पहला मौका है जब देश के दो बड़े पूंजीपति घराने जन आंदोलन के निशाने पर हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के संशोधन प्रस्ताव को खारिज करने के बाद किसान नेताओं ने अपने आंदोलनात्मक कार्यक्रमों की जो घोषणा की है उसमें अंबानी और अडानी के व्यावसायिक संस्थानों का बहिष्कार शामिल है। यह बहिष्कार पंजाब में करीब दो महीने से चल रहा है। अब इसे पूरे देश में फैलाने का आह्वान किया जा रहा है। किसान नेताओं ने जियो सीम को दूसरी कंपनियों में पोर्ट कराने का आह्वान किया है। यदि कृषि पर निर्भर देश की 60 प्रतिशत आबादी जियो का बहिष्कार कर देगी तो यह मुकेश अंबानी के लिए बड़ा झटका होगा। यदि रिलायंस की सारी कंपनियों का बहिष्कार हो गया तो सिर्फ विदेश व्यापार के जरिए अंबानी ग्रुप का टिकना कठिन हो जाएगा। अडानी की भी यही गति होगी।

आमतौर पर किसी भी जनआंदोलन का सीधा निशाना सत्ताधारी दल पर होता है लेकिन दो उद्योगपति घरानों के निशाने पर आने का सीधा मतलब है कि उनके उस रिमोट का खुलासा हो चुका है जिसके जरिए वे सरकार को संचालित करते रहे हैं। व्यापारी कभी भी किसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधि नहीं होता। घनश्याम दास बिड़ला कांग्रेस और महात्मा गांधी के बेहद करीब थे। लेकिन आम जनता के बीच भी उनकी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता थी। वही नहीं देश में जितने भी उद्योगपति घराने हैं उनका सत्ता के साथ तालमेल रहा है। वे अपने अनुकूल नीतियां बनवाने का प्रयास करते हैं लेकिन वे कभी आम जनता की नज़र में खलनायक नहीं बनना चाहते। मुकेश अंबानी जब जियो लेकर आए थे तो देशवासियों की नज़र में वे हीरो के रूप में स्वीकार किए गए थे। उन्होंने आम जनता को इंटरनेट का भरपूर इस्तेमाल करने का मौका दिया। अभी भी जियो का डाटा अन्य कंपनियों से ज्यादा महंगा नहीं है। स्पीड भी बेहतर है। लेकिन उन्हें सोचना चाहिए कि चंद वर्षों के अंदर वे खलनायक क्यों बन गए। इसका कारण यह है कि उन्होंने सत्ता के साथ मधुर संबंध ही नहीं बनाए बल्कि उसे नियंत्रित करने की शक्ति भी प्राप्त कर ली। अपनी इच्छा के मुताबिक नीतियां बनवाने लगे। जनहित को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर स्वहित पर ध्यान देने लगे। जबतक यह खेल पर्दे के पीछे चल रहा था कोई समस्या नहीं थी। लेकिन अब कृषि सुधार कानूनों को लेकर सारे पर्दे हट चुके हैं। लोगों को समझ में आ रहा है कि वे अन्य संस्थानों की तरह कृषि क्षेत्र पर भी कब्जा करना चाह रहे हैं। अच्छा व्यापारी आम जनता को अपने विरोध में नहीं खड़ा करता। उसकी कोशिश होती है कि उसके संस्थान लाभ भी कमाएं और जनता को भी लाभ पहुंचाएं। खासतौर पर उपभोक्ता सामग्रियों का व्यापार करने वाले उद्योगपति इसका विशेष ध्यान रखते हैं। वे जनता को जनार्दन मानते हैं। अपना चरागाह नहीं मानते।

यह बात सामने आ चुकी है कि कृषि कानूनों के पारित कराए जाने से पहले बल्कि उनका अध्यादेश तैयार होने से भी पहले मुकेश अंबानी और गौतम अडानी को इसकी जानकारी थी और वे इनका लाभ उठाने की तैयारी में लग गए थे। उनके बीच कार्य विभाजन भी हो चुका था। अडानी गोदानों का विस्तार कर रहे थे और अंबानी रिटेल चेन का। अब मामला जिस मुकाम तक पहुंच चुका है उसमें अभी भी अंबानी और अडानी के पास जनता का विश्वास जीतने का एक अवसर बचा हुआ है। वे मोदी सरकार पर तीनों कानून वापस लेने का दबाव डालें और किसान संगठनों के साथ विचार-विमर्श के बाद नए सिरे से कानून बनाने का आग्रह करें तो उनके प्रति बनता नकारात्मक माहौल उनके पक्ष में हो सकता है। अगर अडानी खाद्यान्न के सबसे बड़े भंडारक और अंबानी सबसे बड़े विक्रेता बनना चाहते हैं तो यह काम किसानों को विश्वास में लेकर भी किया जा सकता है। किसान सिर्फ अपने उत्पाद का लाभकारी मूल्य चाहते हैं। उन्हें उनका हक प्रदान करते हुए और उपभोक्ताओं के हितों का ध्यान रखते हुए भी अडानी और अंबानी की कंपनियां लाभ कमा सकती हैं। मुर्गी के अंडे खाना हमेशा उसका जिबह करने से ज्यादा लाभदायक होता है। यह सही है कि व्यापारी का एकमात्र लक्ष्य लाभ कमाना होता है। लेकिन दूसरे को नुकसान पहुंचाकर उठाया गया लाभ स्थाई नहीं होता। मुकेश भाई और अडानी साहब व्यापार की नीतियों से नावाकिफ तो नहीं होंगे। दूसरी बात यह कि एक राजनीतिक दल के हितैषी के रूप में स्थापित होना लंबे समय में नुकसानदेह साबित हो सकता है। भाजपा हमेशा सत्ता में रहेगी यह जरूरी नहीं है। इसकी सत्ता की भी एक निश्चित अवधि है। नरेंद्र मोदी चाहे जितने भी ताकतवर नेता हों वे अमृत पीकर तो नहीं आए हैं। यह मर्त्यलोक है। उनकी मृत्यु भी होगी। लेकिन अंबानी और अडानी की कंपनियां तो पीढ़ी-दर पीढ़ी चलती रहेंगी। उनका अस्तित्व जनता के वोटों पर नहीं उसके भरोसे और विश्वास पर टिका है। ज्यादा लाभ के चक्कर में देश को तहस-नहस करने से उन्हें कोई लाभ नहीं प्राप्त होनेवाला। दुनिया में पूंजीवाद विकसित हुआ और सर्वहारा क्रांति नहीं हुई तो इसका एकमात्र कारण यह है कि पूंजीपति घरानों ने श्रमबल के हितों का खयाल रखा। उसका शोषण नहीं किया बल्कि उसे बेहतर और सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आवश्यक मेहनताना दिया। सामंती हथकंडों से स्वयं को दूर रखा। अभी भारत में आर्थिक गतिविधियों को जिस दिशा में ले जाया जा रहा है वह बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की नीति पर आधारित नहीं है। वह द्विजन हिताय द्विजन सुखाय की नीति पर चल रहा है। मोदी सरकार ने एक-एक कर सार्वजनिक क्षेत्र के बहुत सारे संस्थान दो पूंजीपति घरानों को उपहारस्वरूप दे डाला। फिर भी उन्हें संतोष नहीं हो रहा है। अगर धीरूभाई अंबानी जीवित होते तो कभी भी इस स्तर पर नहीं उतरते जिस स्तर पर मुकेश अंबानी उतर चुके हैं। रतन टाटा भी बड़े उद्योगपति हैं लेकिन वे जनता के चहेते थे और बने हुए हैं। हर आपदा के समय वे जनता की मदद के लिए तत्पर रहते हैं। मुकेशभाई अंबानी और गौतम अडानी को एक बार गंभीरता से सोचना चाहिए कि क्या देश की पूरी आबादी को नाराज कर कमाया हुआ धन उन्हें वह सुख प्रदान करेगा जो जनता का विश्वास और भरोसा जीतकर कमाया हुआ धन देगा। क्या वे सामंती पूंजीवाद से स्वयं को अलग कर जनहितकारी पूंजीवाद को अंगीकार कर सकते हैं? मौजूदा स्थिति में किसानों और मोदी सरकार के बीच जो गतिरोध बना हुआ है उसे अंबानी और अडानी एक झटके में दूर कर जनता के चहेते बन सकते हैं।

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