किसान आंदोलनः अब सरकार को छवि बचाने की चिंता

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-देवेंद्र गौतम

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

पुस्तकः विश्व की प्राचीनतम सभ्यता लेखकः पं. अनूप कुमार वाजपेयी,कई पुरस्कारों से पुरस्कृत समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली, मुजफ्फरपुर, मूल्य-2000 रुपये लेखक ने राजमहल पहाड़ियों और चट्टानों पर संसार के प्राचीनतम आदिमानव के पदचिन्ह ढूंढ निकाले। पता-वाजपेयी निलयम, नया पारा, दुमका झारखंड

किसान आंदोलन मोदी सरकार के गले की हड्डी बन गया है। वह बुराड़ी के निरंकारी मैदान और दिल्ली के सभी बार्डरों पर धरना देकर बैठे लाखों किसानों के हुजूम को खलिस्तानी, पाकिस्तानी, फर्जी किसान नहीं साबित कर पाई। हरियाणा की सड़कों पर बैरिकेटिंग लगाकर, लाठी चार्ज करके, वाटर कैनन से पानी का बौछार करके, हवाई फायरिंग करके, सड़क पर गड्ढे खुदवाकर पंजाब से चले किसानों के सैलाब को नहीं रोक पाई। इस आंदोलन को सिर्फ एक सूबे का आंदोलन भी नहीं साबित कर पाई। जब देश के विभिन्न राज्यों के किसानों का जत्था दिल्ली पहुंचने लगा तो मोदी सरकार पर किसान विरोधी होने का ठप्पा लगने लगा। यह उसकी राजनीति के लिए नुकसानदेह था। जब इसका अहसास हुआ और दिल्ली का सप्लाई चेन ठप्प होने की नौबत आ गई तो उसकी तंद्रा टूटी। एक दिसंबर को दिल्ली के विज्ञान भवन में किसान नेताओं को वार्ता के लिए बुलाया जिसका कोई नतीजा नहीं निकला। यह समाधान के उद्देश्य से बुलाई गई बैठक थी भी नहीं। सरकार ने एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव दिया जो सभी बिंदुओं पर विचार करके बीच का रास्ता निकालेगी। किसान नेताओं ने इसे नामंजूर कर दिया है। दरअसल सरकार के तीन मंत्री किसानों के आक्रोश और इरादों को भांपने के लिए आए थे। अब उनके इनपुट के आधार पर सरकार अपनी रणनीति बनाएगी। 3 दिसंबर की बैठक में किसान नेता भी पूरा होमवर्क करके आएंगे और सरकार के प्रतिनिधि भी। सरकार हर हाल में चाहेगी कि समाधान निकले और आंदोलन वापस हो।

मोदी सरकार को इस बात का कत्तई अहसास नहीं था कि वह पूर्व की तरह अब मनमाने ढंग से कानून बनाकर लागू नहीं कर सकेगी। उसके ढोंग, उसकी अदाओं को लोग समझने लगे हैं। उसकी लोकप्रियता का ग्राफ निरंतर नीचे गिरता ही जा रहा है। किसानों का कहना है कि यह तीन कानून कार्पोरेट सेक्टर के हित में हैं और किसानों के लिए डेथ वारंट हैं। सरकार फंस चुकी है। यह कानून किसानों के हित में किस तरह हैं यह बतलाना मुश्किल है क्योंकि मंडी व्यवस्था खत्म किए जा चुके राज्यों का उदाहरण सामने है। किसान भाजपा मंत्रियों से ज्यादा पढ़े लिखे और जागरुक हैं। वे देख रहे हैं कि खुले बाजार की व्यवस्था ने बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों को मौसमी मजदूर बना दिया है।

सरकार की समस्या यह है कि अगर वह जबरन थोपे गए कानून वापस लेती है तो उसके कार्पोरेट जगत के मित्र नाराज हो जाएंगे। और अगर वापस नहीं लिया तो उसकी जनविरोधी छवि बन जाएगी और उसकी राजनीतिक ज़मीन धंसने लगेगी। फिर सत्ता हासिल करने के सटीक फार्मूले भी कारगर नहीं हो सकेंगे क्योंकि उसके लिए भी एक जनाधार की जरूरत पड़ती है। इसीलिए वह बीच का रास्ता निकालना चाहती है। कानून वापस लेने की जगह उसमें कुछ संशोधन कर काम चलाना चाहती है। कुछ किसान नेता संशोधन से संतुष्ट हो सकते हैं लेकिन ज्यादातर किसान इसे पूरी तरह रद्द कराने पर अड़े हुए हैं। उनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। सरकार इसे मुट्ठी भर किसानों का आंदोलन करार नहीं दे सकती। वह समाधान करने में जितना विलंब करेगी उसके गले में अटकी हुई हड्डी उतना ही परेशान करेगी।

किसान लाखों की संख्या में हरियाणा-दिल्ली बॉर्डर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और कृषि कानूनों को वापस लेने या फिर उसमें एमएसपी समेत कई प्रावधानों को जोड़ने की मांग कर रहे हैं। भाजपा नेतृत्व भी किसानों के आंदोलन का जल्द समाधान चाहती है। पार्टी को आशंका है कि यदि विलंब होता है तो पार्टी के पंजाब में पांव जमाने की योजना को झटका लग सकता है। उल्टे हरियाणा से भी हाथ धोना पड़ सकता है।

भाजपा से जुड़े लोगों का मानना है कि किसानों और सरकार के बीच जारी गतिरोध जल्द खत्म होगा। मंगलवार को किसान संगठनों के साथ सरकार की बातचीत हुई, लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। तीन दिसंबर को फिर से एक बार सरकार और किसान संगठन बात करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सोमवार को बनारस से दिए गए बयान से साफ है कि सरकार किसानों की चिंताओं को दूर करने के लिए तैयार है, लेकिन कानून वापस नहीं होंगे। किसानों की वास्तविक शिकायतों का समाधान किया जाएगा। उन्हें कुछ पहलुओं पर चिंता है जैसे कि क्या सरकार एमएसपी देना जारी रखेगी। मंडियों को खत्म तो नहीं कर दिया जाएगा आदि।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राजनाथ सिंह और पीयूष गोयल ने मंगलवार दोपहर को बीजेपी चीफ जेपी नड्डा के आवास पर किसान आंदोलन को लेकर बातचीत की। वहीं, इसके अलावा, पार्टी ने वरिष्ठ नेताओं को किसानों के साथ बातचीत के लिए आगे भेजा है।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि भाजपा की किसान-समर्थक छवि धूमिल नहीं हुई है, पार्टी किसानों के लिए किए गए उपायों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा उसके पास कोई रास्ता नहीं है। अपने कार्पोरेट मित्रों को भी सरकार तभी लाभ पहुंचा सकेगी जब सत्ता उसके हाथ में हो और उसकी छवि कार्पोरेट के दलाल के रूप में न स्थापित हो जाए।

भाजपा को सत्ता प्यारी है। इसे हासिल करने के लिए वह किसी हद तक जा सकती है। यह जगजाहिर है। जनादेश नहीं मिलने पर वह विधायक खरीदकर भी सरकार बनाती रही है। उसके पास धन की कोई कमी नहीं है। उसकी मुख्य चिंताओं में पंजाब में उसकी राजनीति भी शामिल है। शिरोमणि अकाली दल के नाता तोड़ने के बाद और विपक्ष के विरोध के बीच भाजपा पंजाब में अपने पैर पसारने की कोशिश कर रही है। उसका मानना है कि ‘एक वोटबैंक है, जो न तो अकाली का है और न ही कांग्रेस का समर्थन करता है; ये गैर पंथक मतदाता भाजपा को समर्थन दे सकते हैं। लेकिन पंजाब में आक्रोश इतना है कि लोगों ने अडाणी और अंबानी तक के व्यावसायिक संस्थानों का बहिष्कार कर दिया है। उनके पेट्रोल पंपो से एक लीटर भी तेल भी नहीं बिक रहा है। शॉपिंग मॉल खाली पड़े हैं। भाजपा ने 2022 के विधानसभाओं और 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी है उसकी कोशिश है कि वह अपने दम पर चुनाव लड़े। कल-बल-छल जैसे भी हो सत्ता पर काबिज रहे। लेकिन अगर ग्रामीण भारत में रहनेवाली 70 प्रतिशत आबादी नाराज हो गई तो उसके सारे सपने चकनाचूर हो जाएंगे।

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